एतना आजादी आऊरी कहवाँ मीली

" हम नई जाऐब झंडा बेचे " रिंकुआ झोला फेंकते हुये , नाक सिकोड़ के बोला | " काये नए जैबे रे " पिंकुआ ने बाँह झटक के पूछा |...

" हम नई जाऐब झंडा बेचे " रिंकुआ झोला फेंकते हुये , नाक सिकोड़ के बोला |
" काये नए जैबे रे " पिंकुआ ने बाँह झटक के पूछा |
" हमरा से ना बोल होई , ऊ दीन के नाम | "
" कोन दीन के नाम रे | "
" ऊ , ले लो ले लो , गँड़तरन्त दिबस पर झंडा ले लो "
" दुरबुर , गँड़तरन्त ना गनतंतर | "
" हाँ हऊऐ , हमारा से न बोलाई , ससुर नामवो बोले में लाज लगई अ , गँड़ हाहाहाहाहा " रिंकुआ ये शब्द बोल कर खुदसही हँसने लगा |
" चुप एनती न कहल जाला , ई हमार सबके देस के सान के दिन बा , तीरंगा के ऐ दिन सलाम कएल जाला तन मन से | बड़ा भाई पिंकूआ जो खुद ही छोटा था वो अपने और छोटे भाई को समझाते हुये बोला |
" का होएल रहस ऐ दिन, काहे ई ऐतना धूम धाम से मनाएल जाला | " पिंकुआ ने सवाल दाग दिया |
" हमार सब के देस के संबिधान लिखाएल रहस "
" ऊ का हो ला ? "
" रे पदनी संबिधान , मतलब देस के कानून की कोन का करी त ओकरा का सजा होई , कोन कोन काम करनाई देस के खिलाफ बा | "
" अच्छा त भाई ऐगो बात बताब$ , जे कर सब के मतारी बाप न रहल$ ओकरा सब ला कथी लिखाईल बा | मलतब ओकरा सब के पोसे सा सरकार का देई | हमहूँ सब जा के माँगेम | " ना समझी में बोला रिंकुआ के सटीक से सवाल का पिंकुआ के पास कोई जवाब नही  पर वो अपने छोटे भाई से हारता कैसे तो उसने जवाब गढ़ लिया |
" ओ सब ला सरकार तिरंगा बनइलस , आ ओकरा सब के कहलस जा के तिरंगा बेच$ आ पईसा कमा , आ जब गनतंतर दिबस आ सबतंतर दिबस बीत जाई त कुछो आऊरो बेच के कमा | अइसन सब के पढ़े के कोनो जरूरत न पड़ेला , जेना की हमनी सबके कोनो जरूरी बा पढ़े के ( रिंकुआ ने न में सर हिलाया ) बस कमा आ खा , आ जे न कमा सकेला ऊ खुला से भीख माँगे | हमनी सब ला सड़क फीरी बा जहाँ मन सूतू , जहाँ मन जाऊ | ससुर आऊरी तोहरा के का चाही ? ऐतना आजादी आऊरी कहवाँ मीली ? चल अब ऊठ झंडा बेचे चलू | " पिंकुआ ने सब बातें बोल दीं जो जो उसे देश की सरकार ने संविधान में लिखा जो उसे मिल रहा है सब |
" हमरा से ऊ न बोलाई " रिंकुआ अभी भी ज़िद पर अड़ा था |
" ससुर तु न कहिये गनतंतर दिबस , तू कहिये 26 जनबरी ई ऐकर दोसर नाम बा | जेना तोहरा के सब हगना कहेला आ रिंकुओ ओनाहिते ई गनतंतर दिबस के दोसर नाम बा | " इतना कह के पिंकुआ भाग गया
" रूक सरूऊ तोहरा के बतबईत बानी अभीए | काट देम तोहरा के | " रिंकुआ  अपना " हगना " नाम सुन के बौखला कर गालियाँ देता पिंकुआ के पीछे भागा |
ऐसे कितने रिंकुआ पिंकुआ देश के आज़ाद होने से संविधान लिखे जाने तक हर साल उसी हाल में रहते हैं आज़ाद सड़कों पर सोते , भीख माँगते , गलियों में सामान बेचने को साथ सामने की पार्क में बच्चों को खेलता देख वहाँ अपना बच्चपन ढूँढते जो उन्हे कभी मिला ही नही | शायद इनकी आज़ादी संविधान में इसी तरह लिखी गई है | 
खैर हमको क्या ? आप सब को गँड़ ओह माफ करें गणतंत्र दिवस की शुभकामनाऐं | हो सके तो तिरंगा ज़रूर खरीदें दुगने दाम मे भी मिले फिर भी | आपको खुद से अच्छा महसूस करेंगे | :)
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धीरज झा...



धीरज झा

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क़िस्सों का कोना : एतना आजादी आऊरी कहवाँ मीली
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