काकी की ममता

काकी की ममता.. . प्रेम और मोह का कोई एक रंग नही हो सकता | ये बंटा हुआ है इंद्रधनुष के रंगों की तरह | मोह से जब प्रेम जन्म लेता है तो इसका रू...

काकी की ममता..
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प्रेम और मोह का कोई एक रंग नही हो सकता | ये बंटा हुआ है इंद्रधनुष के रंगों की तरह | मोह से जब प्रेम जन्म लेता है तो इसका रूप इतना सलोना हो जाता है की ज़ुबान वाले बेजुबानों का मर्म बिना कहे ही जान लेते हैं |
ममता बस अपने बच्चों तक ही सीमित नही है , ममता तो किसी के लियो भी हो सकती है फिर भला कोई बोज़ुबान क्यों ना हो |
" अम्मा , बच्छा को बेच देते हैं , तुम से होता नही इसका देख रेख और हम सब के पास वक्त ही कहाँ जो देख भील कर सकें , बेचारा बेकार में भूख से बिलखेगी | और एक ही है जोड़ा भी नही किसी काम नही आयेगा |"
" ना रे बाबू , हम न रह पायेंगे मुन्नवाँ के बिना | इसको भोर पहर जब तक ना देख लें दिन सुरू ही नही होता , रात जब तक पुचकार ना ले नींद ही न आती | कैसे रहेंगे इसके बिना , हम कर लेंगो इसका देख भाल पर बेचेंगे नही | और इसको इस लिये नही पोसे को ई किसी काम आये , हमको नही लेना काम इस से कोनो " बड़ा लगाव था काकी को इस बच्छवा से | जिस उम्र में लोग अपनी देख भाल का जिम्मा औरों पर छोड़ देते हैं उस उम्र में वो बच्छवा की भी देख भाल करती थी | पर अब उसकी उम्र इस बात की हामी नही भर रही थी की वो इतना काम करे | गिर जाती थी , हाँफने लगती , दम चढ़ जाता था | हार कर तैयार हो गई बच्छवा बेचने के लिये | पर शर्त रख दी की " हम भी साथ चलेंगे बेचने के लिये , ऐसे ही किसी के हाथ नही दे देंगे | " बेटे मान गये और चल दिये रीगा मवेशी मेला में बच्छवा को बेचने | बुढ़िया नें मुनवा को बड़े प्यार से सजाया जैसे बेटी विदा कर रही हो और मन में दुख भी बेटी विदा करने से कम नही था |
बज़ी देर तक घूमे मेला में पर कोई ग्राहक ना मिला , सब जोड़ा ढूँढ रहे थे और ये अकेला था | शाम होने लगी सब स्टेश्न को लौटने लगे ये सोच कर की अब ना बिकेगा | पर स्टेशन पर ही एक व्यपारी मिल गया जिसके पास इस बच्छे का जोड़ा था | वो समझ ग़ा की इन्हे ये बेचना है | बात चीत हुई सौदा पक्का हो गया |
काकी की आँखें डबडबा उठीं उसका मन ऐसे तडप रहा था जैसे लड़ाई मे जा रहे जवान की माँ का रोता है पर हाये रे किस्मत ना जवान की माँ कुछ कर सकती है ना काकी कर पा रही थी | गाड़ी आने वाली थी , काकी व्यापारी के पास गई और रोनी सूरत के साथ बोली " बऊआ जी , बड़े प्यार से पालो हैं एकरा रे , जरा ध्यान दिजियेगा , थोड़ा मरखाह है लेकिन कुछ दिन में बूझ जायेगा तो नही कुछ कहेगा | " व्यापारी मन ही मन हँस रहा था काकी के जानवर के प्रति पागलपन को देख कर उसके लिये वो प्रेम पागलपन ही था तब भी हाँ में सर हिलाया व्यापारी ने " हाँ अम्मा बेटा के तरह रखेंगे | फिकिर नही करो | " बुढ़िया अपने मुन्नवा की डोरी उस व्यापारी के हाथ में देख कर अन्दर ही अन्दर टूटे.जा रही थी | इतने में व्यापारी ने सुरती की डिबिया निकाली और मलने लगा | ज़्यादा चूना डाल लिया सुरती में और दो बार ही मलने के बाद खईनी को निचला होंठ मे दबा लिया | काकी ये सब देख रही थी और जैसे ही व्यापारी ने ऐसा किया काकी ने झट से बच्छवा की डोरी व्यापारी के हाथ से छिन ली और गरज कर बोली " रे , रमपवितरा इसका पईसा वापिस करो हमको नही बेचना बच्छवा | "
" का हुआ माँ , एक दम से ये सब काहे | " सब पूछने लगे , व्यापारी भी हक्का बक्का था की ये क्या हुआ |
काकी व्यापारी को देखते हुये बोली " अरे होगा का , ई इंसान खईनी में ऐतना चूना डाला और रगड़ा भी नही अच्छे से और होंठ में दबा लिया | अरे जिस इंसान को अपने नुक्सान का नही पता जो अपनी देखभाल सही से नही कर सकता ऊ इस बेजुबान को का समझेगा उसके लिये इसकी पीड़ा का मतलब रखेगी | इसके लिये ये बस जानवर है भार ढोने वाला | हमको नही बेचना तो नही बेचना | " काकी ज़िद पर अड़ी रही लाख मनाओन के बाद भी नही मानी | हार को बोटो ने व्यापारी को पैसे वापिस कर दिये और काकी के साथ बच्छवा को फिर घर ले आया | काकी की ममता उस बेज़ुबान के लिये अपने बच्चे की तरह ही थी | उसके बाद काकी खुद से ही देखभाल करने लगी बच्छवा की |
बेज़ुबानों की भी ज़ुबानें माँऐं समझती हैं...
क्योंकी जब उसकी कोख से आप पैदा हुये तो आप भी बेज़ुबान ही थे...
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धीरज झा...

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क़िस्सों का कोना : काकी की ममता
काकी की ममता
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