प्रेम

​प्रेम... . प्रेम ! ये शब्द खुद में कितना अधूरा लगता है ना ! मगर असल में इंसान इसके बिना अधूरा है | किसी ना किसी बहाने इस से हर कोई जुड़ा हु...

​प्रेम...

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प्रेम ! ये शब्द खुद में कितना अधूरा लगता है ना ! मगर असल में इंसान इसके बिना अधूरा है | किसी ना किसी बहाने इस से हर कोई जुड़ा हुआ है | कहीं ना कहीं कोई तो होगा जिसकी मुस्कुराहट के लिये घन्टों उसे निहारते होंगे आप | कोई तो होगा जिसकी खुशी के लिये कितनो को मायूस कर देते होंगे आप | कोई तो होगा जिसके ना होने से ज़िंदगी अधूरी सी लगती होगी | भले ही आप खुद को कितना भी मज़बूत बनायें | कितना भी मुस्कुरायें मगर उसके ना होने की मायूसी आपकी आंखों मे होती है | सुना है आंखें कभी झूठ नही बोलतीं | बस आंखों को पढ़ने का हुनर होना चाहिये | 
दौर बदले तरीका बदला मगर एक इंतज़ार है वो नही बदला इंतज़ार में होने वाली बेचैनी का रंग नही बदला | पहले नुक्कड़ पर आशिक अपनी महबूब का इंतज़ार किया करते थे बार बार उस मोड़ की तरफ ताकते रहते थे जहां से उसने आना होता था | कप के कप खाली हो जाते थे चाय की दुकान पर चाय के | कितनी सिगरेटें आपकी बेचैनी की बली चढ़ जाया करती थीं | मगर अब दौर बदल गया है | प्रेम ने पैर पसार लिये हैं कानून के साथ अब प्रेम के भी हाथ पैर दोनो लम्बे हो गये | अब प्रेम एक राज्य से दूसरे में पनपने लगा है | अब नुक्कड़ की जगह फेसबुक पर इंतज़ार होता है | उनके लाल हरे पीले किसी रंग में रंगे प्रोफाईल पिक का मैसेंजर पर टननन से बजना और मैसेज देखते ही खुशी की लहर का पुरे बदन में धमा चौकड़ी मचाना | अहसास नही बदला बस तरीका बदल गया है | अब आंखें नही समाईली हँसती या रोती है | अब का प्रेम मन की तारों के मजबूत होने का उदाहरण सा बन गया है | इस प्रकार का प्रेम प्रेम का एक बहुत ही चर्चित रूप है | बाकी के रूपों में इतनी बेचैनी नही जितनी इस मे है | 
मगर अनन्त से जो प्रेम निस्वार्थ चला आ रहा है वो प्रेम है माँ का | जो इस प्रेम में टूट जाने के बाद हमें आज भी संभाल लेता है | जब रोती हुईं आंखें इनके कंधों पर टिकती हैं तब अहसास होता है कोमल सी दिखने वाली माँ असल में कितनी मजबूत है | एक रूप है बहन का जो अक्सर गलतियों को छुपा कर फिर हमे चिढ़ा कर अपने होने का अहसास कराती है | जो हम से मांगती बहुत कुछ है मगर चाहती बस हमारी खुशी है | 
एक सब का मिला जुला और बड़ा ही विचित्र प्रेम है दोस्ती का | इसकी तुलना ना किसी से हुई ना होगी | ये कई बार आपको सोचने पर मजबूर कर देगी के ये प्रेम है या द्वेश यो अक्सर नाटक करते हैं आपके दुख को ना समझने का | दुख का मज़ाक बनाने का | मगर असल में जो सबसे ज़्यादा आपको समझते हैं वो दोस्त ही हैं | और अनेको रूप हैं प्रेम के | जिसने सबको खुद से किसी ना कियी रूप में बांध कर रखा है , बस महसूस करने की ज़रूरत है | आप भी करें आपको भी अहसास हो जायेगा |

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धीरज झा...

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क़िस्सों का कोना : प्रेम
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