कनिया काकी

कुछ वक्त से कहानियाँ लिख रहा हूँ मगर उन्हे किसी कारण से फेसबुक पर पोस्ट नही करता । कारण भी बहुत जल्द आप सब के सामने होगा । आज मन किया की एक ...

कुछ वक्त से कहानियाँ लिख रहा हूँ मगर उन्हे किसी कारण से फेसबुक पर पोस्ट नही करता । कारण भी बहुत जल्द आप सब के सामने होगा । आज मन किया की एक कहानी पोस्ट करूँ तो अपनी एक बड़ी।खास कहानी आप सबके सामने रख रहा हूँ । पहले भी ये कहानी पोस्ट कर चुका हूँ काफी लोगों ने सराहा था । जो नए जुड़े हैं वो भी एक बार पढ़ लें ।
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कनिया काकी ( कहानी )

छोटा सा कद था , झुक कर चलती थी | शायद ज़िंदगी का बोझ उस से अब ढोया नही जाता था इस वजह से कमर भी झुक गई थी | सारा दिन चरखे में सूत कातती फिर उस सूत से जनेऊ बनाती | ब्राह्मण पट्टी में किसी के बच्चे का यज्ञोंपवीत आदि संस्कार होता तो जनेऊ बनाने का कॉनट्रेक्ट कनिया काकी को ही मिलता | आज तक मै समझ नही पाया था उस बुढ़िया को कनिया काकी क्यों कहते थे ? सारा दिन गुमसुम बस अपनी ही दुनिया में खोई हुई चरखा चलाती रहती |

मै बच्चपन से ही बाहर रहा | छुट्टियों में ही गांव जाने का मौका मिलता | गांव मुझे बहुत पसन्द आता | आज जितनी समझ तो तब थी नही के कह सकूं वहां की हरीयाली , शांत वातावरण इत्यादि आकर्षित करता था | वहां मन लगने का सबसे बड़ा कारण होता स्कूल से कुछ दिनों के लिए आज़ादी | वहां ना माँ की धमकियों का डर होता ना पापा की डांट का क्योंकी मै जानता था कोई भी गलती करूं बाबा और ताऊ जी बचा ही लेंगे | फिर गांव की नदी से भी बड़ा प्रेम था | डांट खाने को बाद भी चला जाता नदी में नहाने |

कनिया काकी को सब खुश होते तब ही देखते जब मै वहां जाता | मुझे देखते ही वो जितनी तेज चल सकती उतनी तेज चल कर आती और मुझे गले लगा लेती | और तब मुझे सबसे बुरा लगता क्योंकी वो मुझे ज़रा पसंद नही थी | वो मुझे पागलों की तरह चूमती | उन दिनो उसका चरखा चलाना भी बहुत कम हो जाता | ना जाने कहां कहां से ढूंढ कर मेरे लिए देहाती फल लाती जिनका नाम तक हम शहरों में नही सुनते | मै स्वार्थी इंसान जो उस समय बच्चा था सब फल खा लेता और बुढ़िया से जान छुड़ा कर भाग भी जाता | उसके मुंह से मुझे हमेशा बीड़ी की दुर्गन्ध आती | जो मुझे बिल्कुल पसन्द ना थी |

एक दिन मुझे खेलने जाना था पर कनिया काकी लगी अपना प्रेम बरसाने | कभी माथा चूमती , कभी सर सहलाती , कभी मेरे चेहरे को अपने झुर्रीदार हाथों में ले कर निहारती रहती | मैं उसके चंगुल से निकलने को बेचैन था | पर वो मान ही नही रही थी | आखिर में क्रोध पर मेरा नियन्त्रण ना रहा और मैने उनका हाथ झटक दिया | बेचारी गिरते गिरते बची | और मैं वहां से भाग निकला | खेल कर जब आया तो देखा वो एक कोने में बैठी एक दम उदास मानो अब रो देगी , गुमसुम सी चरखा चला रही थी | माँ मुझे देखते गुस्से से लाल हो गई और बांह पकड़ कर कमरे मे ले गई |

गुस्से से लाल हुई बोली " यही सिखाया है तुझे हमने ? बड़ों से ऐसा ही व्यवहार आया जाता है ? क्यों की उनके साथ बद्दतमीज़ी तूने ?"

मैं तो अपने घमन्ड में चूर था | मालूम था माँ मुझे मार सकती नही यहां तो डरूं क्यों ! बस लगा ज़ुबान लड़ाने " तो वो मुझे ऐसे क्यों दुलारती है ? मुझे नही पसन्द वो | दूर रहे मुझ से | आखिर है कौन वो मेरी ? सुमितवा भी तो कह रहा था वो हमारे परिवार की भी नही है | फिर क्यों रखा है उसे घर में ?"

मेरे मुंह से ये सब सुन कर माँ एक दम स्तब्ध थी | वो समझ नही पा रही थी के इतनी सी जान में ऐसी नफरत कैसे जाग गई | उसकी आंखें गीली हो गईं | लगभग रोते हुए बोली " ये वो है जिसकी वजह से तू इतना बड़ा हुआ के माँ से ज़ुबान लड़ा सके | ये वो है जिसने तेरी जान बचाने को लिये अपने इकलौते बेटे को नदी में बहने दिया | जब तू छोटा था तो नदी किनारे चला गया था खुद से ही | हम तुझे सब जगह ढूंढ रहे थे पर तू कहीं नही मिल रहा था | कनिया काकी ने देखा तू नदी में गिर गया है | अपने बच्चे को किनारे पर रख कर नदी में उतर गई तुझे बचाने को | तुझे बचा लिया पर उधर उनका खुद का बच्चा नदी में उतर गया | वो चिल्लाती रही , रोकती रही उसे पर वो अबोध माँ की आवाज़ कहां से सुन पाता समझ पाता | तुझे ले कर उस तक पहुंच पाना संभव नही था और तुझे फिर डूबता छोड़ देने के लिए उनकी आत्मा नही मानी | नतीजा ये हुआ उनका इकलौता बच्चा जिसके सिवा उनका दुनिया में कोई नही था उनकी आंखों के सामने नदी की गोद में समा गया | तुझे किनारे पर लाने के बाद वो नदी में कूदीं पर तब तक देर हो गई थी बच्चा मर चुका था | अपने बच्चे की लाश और तुझे लिए घर पहुंची | अहसान तक ना जताया कभी अपने इतने बड़े बलिदान का | वो उस समय मेरी जान मांगती तो भी मैं दे देती मगर | उस पगली ने बस तुझ पर थोड़ा सा हक मांगा | उसे तुझ में अपना बच्चा दिखता है | वो नही रोक पाती अपने बच्चे पर प्यार लुटाने से खुद को | ये सब किया है उसने तेरे लिए |" इतना कह कर माँ ज़ोर ज़ोर से रोने लगी और मैं माँ से लिपट कर रोने लगा | शायद वो पहली बार था जब मैं जज़्बातों को समझ कर रोया था | इस से पहले तो बच्चपने में रोता था | शायद उस दिन मेरे बड़े होने का पहला दिन था |

मैं उठा और बाहर जा कर कनिया काकी को पीछे से गले लगा कर रोने लगा और कहने लगा " काकी हमरा माफ कर दे |"

कनिया काकी पीछे मुड़ी और मुझे गले से लगा लिया और बोली " ना हमार बेटा रोअत ना देख सकत आनी |"

मैं काफी देर तक उनके सीने से लगा रहा | शायद मै उस दिन मतलबी मगर ईमान्दार इंसान बन गया था | उस दिन के बाद गांव जाने की खुशी के कारणों में कनिया काकी से मिलना उनका दुलार पाना भी एक अहम वजह बन गया | कनिया काकी का प्रेम निस्वार्थ प्रेम का सफल उदाहरण बन गया था मेरे लिए |
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धीरज झा

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क़िस्सों का कोना : कनिया काकी
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