कुछ तो करो

​कुछ तो करो  जन्माष्टमी का पर्व बाल कृष्ण के जन्मदिवस का ये दिन लोग बड़े ही हर्ष से मनाते हैं । मंदिर भवन सब जगमगा रहे होते हैं मेले लगे होते...

​कुछ तो करो 
जन्माष्टमी का पर्व बाल कृष्ण के जन्मदिवस का ये दिन लोग बड़े ही हर्ष से मनाते हैं । मंदिर भवन सब जगमगा रहे होते हैं मेले लगे होते हैं । मतलब पूरी तरह हे खुशियाँ बंट रही होती हैं । हर गाँव शहर में मनाया जाता है । 
शुभम भी अमेरिका से अपने गाँव आया था खास अपने गाँव का मेला देखने । उसके गाँव में कृष्ण मंदिर था जो बहुत पुराना था और सालों से वहाँ पर जन्माष्टमी के अवसर पर भव्य मेला लगता था । गाँव क्या आस पास के गाँव और शहरों से लोग मेला और मन्दिर की शोभा देखने आते थे इस दिन । शुभम भी सालों बाद बड़ी मुश्किल से टाईम निकाल कर अपने छोटे परिवार के साथ अपने बड़े परिवार से मिलने आया था । शुभम की पत्नी वसुंधरा अमेरिका में गरीब बच्चों के लिए एक संस्था चलाती है । वह भी आई थी शुभम के साथ । वसुंधरा अमेरिका में ही पली बढ़ी । इंडिया बहुत कम ना के बराबर ही आना हुआ । इसलिए यहाँ के रिती रिवाज़ों से अंजान थी । मगर उसे अच्छा लग रहा था गाँव में । बच्चों के प्रति बहुत दया थी उसके मन में । यहाँ की गरीबी और शिक्षा से दूर हो रहे बच्चों को देख बुत दुखी हुई वो । 
आज जन्माष्मी थी , सारा परिवार मन्दिर गया मेला देखने । मंदिर की शोभा देखते बन रही थी । मानों सूर्य ने अपना ताप अलग कर अपनी सारी रौशनी उड़ेल दी हो नन्दलाल के मन्दिर पर । सब मेला देख रहे थे मगर वासु चुप चाप थी जैसे मायूस हो । शुभम जान गया की वो किसी बात से परेशान है । उसने पूछ लिया " व्हट हैपन वासू ? 

वासू ने झूठा मुस्कुरा कर टालते हुए कहा " नथिंग डियर । "

" ओह कॅम ऑन ! बताओ भी अब क्या हुआ ? तुम जानती हो मैं तुम्हारा मूड पहचान लेता हूँ । "
शुभम के ज़ोर देने पर वासू एक दम से चिढ़ कर बोली " मुझे गुस्सा आता है यहाँ के लोगों पर । इस मन्दिर की सजावट पर लाखों रुपए लगा दिए और गरीब वहाँ गरीबी से मर रहे हैं । इस देश का विकास इसी लिए रुका है । "
शुभम मुस्कुराया और बोला " बस इतनी सी बात है चलो पहले कुछ खा लेते हैं फिर बात करते हैं । सुबह से कुछ खाया नही तुमने । वो सामने ठेले पर कचौरियाँ खिलाता हूँ । " इतना कह कर शुभम वासु को लेकर ठेले की तरफ बढ़ने लगा ।
इतने में वासु तुनक कर बोली " याक्क्क  मुझे नही खाना उस गंदे ठेले पर । कितशे गंदे कपड़े हैं उस ठेले वाले के । और लगता है प्लेटें जैसे सालों से धोई ही नही । " शुभम कुछ नही बोला बस मुस्कुराया और आगे बढ़ गया वासु के साथ । आगे एक बच्चा भीख माँगता हुआ वासु के पास आया । वासु ने अपनी उदारता दिखाते हुए बच्चे को दस रुपए दिए । 
ये देख कर शुभम ने कहा " वासु ये तो बहुत कम था । वो भीख माँग रहा था , हम इतने पैसे कमाते हैं हमे उसे और उस जैसे और बच्चों की पूरी पढ़ाई का जिम्मा उठाना चाहिए । "
" तुम पागल हो क्या शुभम ! हम ऐसा करेंगे तो फिर हमारे बच्चे कैसे पढ़ेंगे ? " 

" अच्छा कम से कम पाँच सौ रुपए तो उसे देती । हम अमेरिका से आए हैं । " 

" अरे शुभम अमेरिका से आए हैं तो क्या सारे पैसे ऐसे ही लुटा दें ? दस रुपए बहुत हैं उसके लिए । अब चलो घर चलते हैं । " शुभम फिर मुस्कुराया और बोला " ठीक है ठीक है चलते हैं । पर आज एट लिस्ट इतना तो करें की घर पैदल या ऑटो में चलते हैं और गाड़ी के पेट्रौल का पैसा बचाते हैं और उस पैसे से किसी गरीब की मदद करते हैं । "
अब तो वासु पूरी तरह झुँझला गई और बोली " आज तुम्हे हो क्या गया है । तुम्हे जो करना है करो मैं जा रही हूँ मुझ से पैदल या ऑटो में नही जाया जाएगा । " 
अब शुभम के चेहरे पर गंभीर मुस्कान थी शुभम ने वासु को रोकते हुए कहा " हमारा देश इसलिए गरीब नही वासु की मन्दिर में एक दिन आस्था के नाम पर उसकी सजावट कर के लाखों करोड़ों लोगों को खुशी दी जाती है बल्की हमारा देश इसलिए गरीब है क्योंकी यहाँ हर किसी को कोसना आता है गलतियाँ निकालनी आती हैं मगर गलतियाँ सुधारना किसी को पसन्द नही पड़ता । भगवान पर चढ़ रहे एक कप दूध से मज़ार पर चढ़ाई चादर से चर्च में जल रही कैंडल को देखते ही सबको गरीबी , भूख से मर रहे लोग , ठंड में ठिठुर रहे बदन सबको याद आ जाते हैं मगर कोई अपनी सहूलतें मार कर उनकी मदद नही कर सकता । जिसे ऐसे ख़याल आते हैं क्या उसने कभी।अपने हिस्से से एक रोटी भी किसी गरीब को दी है ? अपने घर से एक कंबल किसी को दिया ? नही । क्योंकी ऐसा करना नही आता किसी को बस कोसना आता है । 
वो ठेले वाला गरीब था उसके पास से अगर खाती तो उसे कुछ पैसे मिल जाते उसके हित की सोचती।तो उसे कहती की भईया आप अगर थोड़ी सफाई रखें तो आपका काम और चलेगा । तुम चाहती तो कम से कम उस एक भीख माँगने वाले बच्चे की पढ़ाई के लिए कुछ कर सकती थी । तुम एक दिन बिना गाड़ी के नही चलना चाहती अपने आराम को नही मारना चाहती और मन्दिर की शोभा जिससे कितनो की आस्था जुड़ी है उसे कोस रही हो । वासु , दूसरों से चंदा ले कर संस्था चलाना बड़ी बात नही बड़ी बात है अपने हिस्से से यथासंभव मदद करना । " 
वासु को लग गया की वो कितनी गलत है । उसने मुस्कुरा कर कहा " चलो शुभम एक बार और भगवान दर्शन कर आऐं । " और अमेरिका वापिस जाने से पहले उसने गाँव के हर घर में घूम कर बच्चों को स्कूल भेजने के लिए निवेदन किया और ये कहा की इनकी किताब और फीस मैं भेजा करूँगी और उसने ऐसा किया । जाने से पहले उसने दस दिन का लंगर भी लगवाया जिससे कई लोगों का पेट भरा । मायने ये नही आपने कितने पैसों से मदद की मायने ये रखता है कम से कम आपने मदद तो की , कमियाँ तो नही निकालीं । 
आप सब को कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाऐं । कृष्णा आपके जीवन को सुखी बनाऐं 
धीरज झा 

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