सेल्फ संतुष्टि

​सेल्फ संतुष्टि ( कहानी )  " क्या बात क्या है हाँ ? आखिर तुम्हे हुआ क्या है ? तुम पहले ऐसे नही थे । ये अचानक इन दिनो इतनी घुटन क्यों ? ...

​सेल्फ संतुष्टि ( कहानी ) 
" क्या बात क्या है हाँ ? आखिर तुम्हे हुआ क्या है ? तुम पहले ऐसे नही थे । ये अचानक इन दिनो इतनी घुटन क्यों ? क्यों इतने उलझे रहते हो ? कोई बात है क्या जो बुरी लगी या मुझसे कोई गलती हुई ? राजवीर कुछ तो बोलो ? " आसमाँ ने आज कुछ दिनों से अपने मन में भरे सारे ग़ुबार को निकाल कर राजवीर के सामने रख दिया । और भला वो करती भी क्या । राजवीर जैसा लड़का जिसने अपने घर समाज से लड़ कर आसमाँ को अपनाया था । उस पर जान छिड़कता था । 
कहता था " अब मेरी खुशी और ग़म बस इस बात पर टिकी रहती है की तुम खुश हो या मायूस । " तीन साल से दोनो साथ हैं , बहुत जल्द आसमाँ की पी एच डी कम्पलीट होने वाली थी और दोनो शादी करने वाले थे । बड़ा पाक प्यार था दोनों के बीच । दो मज़हबों से होकर गुज़रा था ये प्यार बहुत कठिनाईयाँ आईं पर राजवीर डटा रहा । आसमाँ की तरफ से कोई विरोध करने वाला इसलिए नही था क्योंकी वो अनाथ थी । अपनी मेहनत लगन से उसने सरकारी खर्चे पर पढ़ाई की और फिर राजवीर से मिली । नाम भले सुनने में खतरनाक सा लगता है मगर राजवीर बहुत सुलझा हुआ इंसान था । यही सुलझापन्न आसमाँ को राजवीर की तरफ खींच लाया था । बड़े घर का लड़का था राजवीर , कुबेर ने अपने धन द्वार में से अथाह सम्पत्ति उसके पिता को दे दी थी । कई एक कंपनियाँ थीं उसके नाम पर हीं पर राजवीर को कभी।कोई मतलब नही रहा इन सब चीज़ों से । वो उब चुका था इस बनावटी दुनिया से , उसे पसंद था छोटा घर जहाँ सुकून हो , एक परिवार जहाँ प्यार हो पर ये सब उसे नसीब कहाँ था । इसीलिए शुरू से हाॅस्टल में रहा आम लड़कों के साथ । 
पिता चाहते थे वो उनका बिजनेस संभाले पर राजवीर कुछ अलग करना चाहता था । वही अलग करने की चाह उसे ना जाने कहाँ कहाँ सफर कराती रही । उसके बाद आसमाँ आई उसकी ज़िंदगी में तब जा कर राजवीर को लगा के ज़िंदगी सच में बहुत कीमती होती है बस कोई उसकी कीमत समझाने वाला हो । पर इस कीमती ज़िंदगी के लिए उसे कीमत चुकानी पड़ी की उसके पिता ने उससे नाता तोड़ लिया । माँ बच्चपन में गुज़र गई थीं और पिता तो बस एक नाम ही थे बाकी कभी माथे पर हाथों से सहला कर पूछा भी नही की बेटा परेशान क्यों हो । इसीलिए शायद उनके रिश्ता तोड़ने से भी राजवीर को खासा फर्क नही पड़ा था । भाई से फोन कर के उनके बारे में पूछ लिया करता । इसी तरह अब राजवीर खुश था आसमाँ के साथ मगर अभी कुछ दिनों से वो एकदम बदल गया था और ये बात आसमाँ को परेशान करती थी । हालाँकी राजवीर ने आसमाँ से कुछ नही कहा ना उसके साथ अलग व्यवहार किया मगर जब प्यार रूहों का हो ना तो दबी हुई मायूसी भी सामने वाले को साफ दिख जाती है । और आसमाँ उसकी मायूसी को बहुत अंदर तक महसूस कर पा रही थी । आज आसमाँ ने राजवीर से पूछ ही लिया । 
राजवीर कुछ बोल नही पाया बस आँखों से निकलने वाले आँसुओं को बचाने की नाकाम कोशिश करता रहा पर आँसू बद्तमीज़ होते हैं बात कहाँ मानते हैं निकल आए । उसकी आँखों से आँसू बहता देख आसमाँ के हाथ पैर काँप गए । बहुत चाहती थी वो राजवीर को उसकी उदासी तोड़ती थी उसे । उसने जल्दी से राजवीर का चेहरा अपने मुलायम से हाथों में लिया और अपने सीने के बीच उसका सर लगा लिया और बोली " हे वीर , क्या हुआ बच्चे ? क्यों इतना परेशान हो ? बता भी नही रहे कुछ । अच्छा सुनो रो मत मैं हूँ ना कोई बात बुरी लगी तो कहो मैं वैसा फिर नही करूँगी । पर ऐसे रो मत । " 
" नही आसमाँ तुम्हारी कोई गलती नही और तुम से गलती हो भी नही सकती  । ज़माने के हिसाब से शायद मैं गलत हूँ । आज के ज़माने में मुझ जैसा इमोशनल इंसान होना गलत है । जिसे ना चाहते हुए भी किसी का दर्द महसूस हो जाता हो । " इससे आगे राजवीर चाह कर भी नही बोल पाया । 
" अरे अरे रोते नही बच्चों की तरह । सुनों खबरदार जो मेरे शोना को गलत कहा तो मारूँगी । और ये भी सुनो की तुम गलत नही हो तुम प्योर हो बिना मिलावट के जो है सो सब सामने । एक दम सुलझे हुए और यही तो सबसे अच्छा लगता है मुझे तुम में । अच्छा अब बताओ हुआ क्या ? क्यों ये सब सोच रहे हो ? " 
" पता नही तुम्हे कैसा लगे पर मैं और किसे बताऊँ ये सब  , एक तुम ही तो हो मेरी । कल मैं साईट विज़िट के लिए शहर से बाहर वाले उन जंगलों के पास गया था । साथ में टीम मेंबर्स भी थे । सुबह खाने का मन नही हुआ तो मैने ये सोच कर की वहाँ और लोग होंगे मेड से कह कर थोड़ा ज़्यादा खाना पैक करवा कर गाड़ी में रख लिया  अब जब दो बजे तो सबको भूख लगी और सब परेशान की इतनी दूर सुनसान में खाना कहाँ से आएगा और काम ख़त्म किए बिना जा नही सकते तब मैने सबसे कहा की मैं सबके  लिए खाना लाया हूँ सब बहुत खुश हुए । बहीं कार के बोनट पर पेपर बिछा कर सारे टिफिन खोले । पर शायद खाना नसीब में नही था क्योंकी तभी ज़ोर से हवा चली और सारी धूल खाने में । अब भले ही भूख लगी थी पर भूख इतनी बड़ी भी नही थी की धूल फाँकी जा सके । इसलिए हमने सारा खाना फेंक दिया साईड में । और ये सोच कर काम में लग गए की जल्दी काम खत्म कर लें ताकी जल्दी घर पहुँच कर खाना खा सकें । काम में व्यस्त मेरी आँखों ने अच्नक से वो देखा जिसने मेरी आत्मा पर भी कई जख्म कर दिए । पहले वहाँ एक बच्चा आया और फिर उसके पीछे दस बारह और आगए । देखते ही देखते जिस खाने में धूल पड़ी थी और अब मिट्टी सन चुकी थी वो खाना उन्होने कुछ मिनटों में खत्म कर दिया । कुछ ने जेबें दो चार रोटियाँ रख लीं । शायद उनकी भूख गंदगी से बड़ी थी इसी लिए जीत गई । मैं उन्हे देखता रहा वो मुझे मुस्कुरा कर देखते रहे । मैने कल खुद को बहुत गिरा हुआ महसूस किया जाना । ऐसा लगा जैसे बच्चपन से मैं इनके हिस्से की भूख को अपने ऐश ओ आराम पर खर्च कर रहा था । जैसे इनकी इस हालत का असल ज़िम्मदार मैं ही हूँ । हमारे पास इतना है की दिन रात दोनो हाथों से उड़ाऐं तो भी सात पुश्यतों तक ना खत्म हो शायद और ये एक एक दाने को मोहताज हैं । " इतना कह कर राजवीर बुरी तरह रोने लगा । 
आसमाँ ने अपने आँसुओं को रोकते हुए उसके सर पर हाथ सहला कर कहा " तुम कहते हो मैं क्या सोचूँगी मैं सोचूँगी नही वीर क्योंकी मैने ऐसा ना सही पर इसी तरह का खुद जिया है मुझे पता है ज़रूरतें जो जिने के लिए सबसे ज़रूरी हैं उन्हे मारना कैसा लगता है । मगर इसमें तुम गलत नही हो । अल्लाह ने सबको उनके कर्मों के हिसाब से रोज़ी दी है । हो सकता है उन मासूमों के और मुझ जैसों के पिछले कर्म ही ऐसे हों । " 
" ये सब अपनी गलतियों को छुपाने के लिए भगवान पर मढ़ा गया झूठा दोष है आसमाँ । उनके कर्म बुरे होंगे माना मगर हम तो अच्छे कर्म वाले थे ना हम तो उनकी मदद कर सकते थे । मैने सोच लिया है , मैं पहले पापा की जायदाद में से कुछ नही चाहता पर अब मुझे मेरा हिस्सा चाहिए जो मेरे नाम है उसे मैं अपने तरीके से ख़र्च करूँगा और एक जगह नही पूरे देश में घूम घूम कर । और मेरी परेशानी ये है की उसके लिए मुझे तुम से अलग होपा होगा । " ना चाहते हुए भी राजवीर वो बोल गया जो आसमाँ कभी सपने में भी नही सुनना चाहती थी । 
" तुम ये क्या कह रहे हो । ये सोच अच्छी है पर क्या इसके लिए हमारे प्यार को कुर्बान करना क्या सही है । नही वीर ऐसा मत करो बहुत मुश्किल से इतना बेजान जीने के बाद ज़िंदगी मिली है मुझ से मेरी ज़िंदगी मत छीनो । " आसमाँ एक दम से गिड़गिड़ाने सी लगी ।
" नही जाना ऐसा मत कहो । मैं भी तुम्हारे बिना नही रह सकता मगर मेरे लिए यही अब ज़िंदगी का एक मात्र लक्ष्य है । तुम्हे बहुत कुछ करना है और मैने अगर षादी करली फिर घर परिवार बच्चों का मोह आजाएगा मैं वो बिल्कुल नही कर पाऊँगा जो मुझे करना है । मैं दान देकर खुद को महान समझ के ऐश नही कर सकता , मुझे अब घूम कर अपने हिसाब से सब करना है , हो सकता है अब सारी ज़िंदगी यूँ ही सफर में ही कट जाए । अपना ख़याल रखना मैं जापे से पहले तुम से मिलूँगा । " इतना कह कर राजवीर मन को पत्थर बना कर आसमाँ के रूम से चल पड़ा । कुछ अच्छा करने के लिए बड़ी कुर्बानियाँ देनी होती हैं बुरा करने वालों के लिए ये सब बेकार  है । उन्हे बस खुद से मतलब होता है और खुद से मतलब रखने वाला इंसान भला क्या जानेगा कुर्बानी की महानता । आसमाँ रोती रही पर राजवीर ना रूका । 
अगली सुबह 
रात भर कहाँ सो पाया था राजवीर । रात भाई को फोन कर के कह दिया केउझे अपनी प्रापर्टी के पेपर्स चाहिए । वक्त आगया है की मैं अपने हिस्से को अपने हिसाब से खर्च करूँ । भाई ने यही बात पिता से कही पिता ने जवाब दिया वो मेरी पसन्द से चले ना चले पर है तो मेरा खून और मेरी दौलत तुम सब के लिए ही तो है । उसे जो चाहिए दे दो और एक बात कहना की उसके बाप ने ये पैसे दिन रात की मेहनत और रिश्तों को गंवा कर कमाए हैं किसी अच्छी जगह खर्च करे जिससे मुझे कुछ सुकून तो मिले । अब राजवीर आज़ाद था अपने मन की करने के लिए पर उसका मन बार बार आसमाँ की तरफ हे बेचैन हो जा रहा था पर उसने ठान लिया था की वो खुद को कमज़ोर नही पड़ने देगा । सारी रात आसमाँ के ख़यालों में कटी सुबह सात के वक्त ज़रा सी आँख लगी । शाम को उसे निकलना था अपनी मंज़िल की तरफ । तभी दरवाज़े की घन्टी बजी । सारी रात की अधूरी नींद उसकी आँखों से झाँक रही थी । उठ कर दरवाज़ा खोला तो हैरान रह गया सामने आसमाँ खड़ी थी बड़ा सा बैग लिए । 
" ये क्या है ? " 

" मतलब अब इतना अंजान कर दोगे के सभी सवाल जवाब दरवाज़े पर ही करोगे ना ? " 

" ओह साॅरी अन्दर आओ ना । " आसमाँ राजवीर को घूरती हुई सामान लेकर अन्दर आगई और सोफे पर बैठ गई 

" कहीं जा रही हो क्या ? " 

" हाँ । "

" पर कहाँ और वो भी यूँ अचानक से ? " 

" जब तुम्हारा को वास्ता ही नही मुझ से फिर क्यों बताऊँ ? " मन के दुख को बनावटी गुस्से का रूप देते हुए आसमाँ बोली ।

" अरे ऐसा मत कहो । तुमसे वास्ता तोड़ना ज़िदगी छोड़ने जैसा है । " 

" अच्छा बातें ना बनाओ ये बताओ निकलना कब है ? " 

" कहाँ निकलना है ? हे आसमाँ सुनों तुम ई आ रही मेरे साथ तुम्हे अभी अपनी थीसिस कम्पलीट करनी है बहुत कुछ करना है तुम्हे । मेरे लिए म..... । बाकी बार राज़वीर के मुँह में रह गई जब आसमाँ ने अपने होंठों की छुअन  उसके होंठों को महसूस कराई । 
" इसके बिना रह पाओगे ? अपना ख़याल रख पाओगे ? और जब ख़याल नही रख पाओगे तो फिर इतना बड़ा काम कैसे करोगे ? तुमने अपना फैसला सुना दिया और चल दिए , पूछा भी नही की मुझे क्या चाहिए । मुझे बस तुम चाहिए वीर बस तुम चाहे जहाँ रखो जैसे रखो । शादी नही करेंगे बच्चे नही होंगे । बस तुम्हारे साथ रहने दो । तुम्हे हँसता लेखना है रोने पर लाल हो जाने वाली नाक देखनी है तुम्हे बच्चों जैसे बेफिक्र सोता देखना है । कुछ नही चाहिए वीर बस तुम चिए हमेशा के लिए । " आसमाँ राजवीर से लिपट कर रोने लगी । राजवीरुस्कुरा पड़ा ये सोच कर की वो भी तो यही चाहता था बस उसकी मर्ज़ी जाने बिना उस पर थोप नही सकता था । 
दोनों ने उसी शाम एक अंजान सफर की शुरूआत की और फिर सफर चलता रहा । महीनों साल सालों तक इस बीच कई बेघर बच्चों को घर मिला भूखों को ताउम्र की भूख से निजात मिली । इसी बीच दोनों ने शादी कर ली और दो बच्चे गोद लिए । एक दिन पिता की बिगड़ी तबीयत की ख़बर मिली तो फौरन घर के लिए निकल पड़ा राजवीर आसमाँ को साथ लेकर । पहुँचा तो सामने पिता जी थे बेटे को देखते आँखें छलक गईं । हाथ जोड़ बोले " मिलने की इच्छा कब से थी मगर शर्मिंदगी से इतना भरा हुआ था की कभी हिम्मत नही हुई । तू ने अपने पैसों का उपयोग बहुत बेहतरीन किया पर मेरे नाम से संस्थाऐं क्यों खुलवाईं ? मैं इस लायक नही था । मैं तो तुझे एक बाप का प्यार तक ना दे पाया । फिर भी तू ने अपने अच्छे बेटे होने का फर्ज़ निभाया । " 
" पापा आप कभी।से इंसान बुरे नही रहे बस आपने वक्त को इतनी अहमीयत दे दी के हमारे लिए वक्त निकाल ही ना पाए । मगर आपने वो किया जिसकी वजह से मैं आपको कब का माफ़ कर चुका हूँ आपने एक बच्चे से उसके बाप का प्यार छीना मगर उसके बदले कमाई दौलत से कितने बच्चों को घर मिल गया । अब आप ठीक हो जाईए और फिर अपने हाथों से ये शुभ काम करिए । " 
" अब ठीक होने की उम्मीद नही बची बेटा । बस तुम सब खुश रहो और खुशियाँ बाँटो ।" पिता ने आसमाँ और राजवीर को आशीर्वाद दिया । कुछ दिनों बाद ही वो सबको छोड़ गए । उनका क्रिया कर्म कर के राजवीर और आसमाँ फिर से अपने सफर पर निकल गए । 
चालिस साल बीत गए ऐसे ही । राजवीर अब संतुष्ट था । अब उसके पास पहाड़ों में अपना घर था जहाँ ज़िंदगी का आखरी पड़ाव वो आसमाँ के साथ बिता रहा था । 
एक दिन सामने हरे घास पर पड़ रही बारिश की हल्की बूँदों को देखते हुए आसमाँ के कंधे पर सर रखे राजवीर ने अचानक से पूछा " तुम खुश हो ना । ज़्यादा कुछ दे नही।पाया तुम्हे इस वजह से शर्मिंदा भी हूँ । " 
" तुम्हे शर्मिंदा नही गर्व होना चाहिए खुद पर । और तुमने मुझे वो सब दिया जो हम आम।तरह से ज़िंदगी जी कर कभी नही पा सकते थे । तुमने मुझे मेरे जैसे लाखों की मदद करने का मौका दिया अपने अहम सपनों के बीच से होते हुए ढेर सारा प्यार दिया । इस से ज़्यादा कुछ हो ही नही सकता । " ये कहते हुए आसमाँ ने राजवीर को कमर से होते हुए बूढ़ी बाहों में भर लिया । 
दोनो खुश थे और इनके साथ खुश थे वो लाखों बच्चे जिनको नसीब से छीन कर राजवीर ने खुशियाँ बाँटी थीं ।
कहानी को कहानी की तरह पढ़िएगा मगर साथ में ढूँढिएगा आप में भी कोई राजवीर छुपा हुआ मिल जाए तो लाखों ना सही एक आधे बच्चे की ज़िंदगी तो सुधर जाए ।  
धीरज झा 

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