​सपनों वाली शादी (बूढ़ी सी प्रेम कहानी)

​सपनों वाली शादी (बूढ़ी सी प्रेम कहानी) "ये स्टेज पर लाल रंग के फूल लगाओ यार, हमारे बुढ़ऊ को उनकी हमारी बुढ़िया के लिए लाल रंग के फूल ह...

​सपनों वाली शादी (बूढ़ी सी प्रेम कहानी)
"ये स्टेज पर लाल रंग के फूल लगाओ यार, हमारे बुढ़ऊ को उनकी हमारी बुढ़िया के लिए लाल रंग के फूल ही पसंद हैं ।" काम की व्यस्तता के बीच परिधांश ने माहौल को थोड़ा मज़ाकिया रंग देने के लिए ये बात कही । सब ये सुन कर खिलखिला पड़े । परिधांश दिनकर बाबू का बेटा है और जिसे ये जनाब बुढ़ा बुढ़िया बता रहे हैं वो हैं इनके माता पिता । ना ना ये कुसंस्कारी नही है ये तो बस इसके प्यार का तरीका है । सबसे छोटा है ना इसी लिए लाडला है । लो जी परिधांश की बड़ी बहन परिधी भी आगई । परसों एक दम से सबको फोन कर के बुला लिया गया । सभी रिश्तेदारों और बेटी को । परिधांश को चार दिन पहले बुला लिया था शेखर बाबू ने । परिधी को देखते परिधांश उसकी तरफ दौड़ा और गले लगा लिया । 
"ये सब क्या है भाई ? अचानक से बुला लिया पापा ने, कुछ बताया भी नही कि आखिर बात क्या है । ऊपर से साज सजावट । तेरी शादी ना हुई होती तो सोचती कि शायद चुपके से तेरी शादी का प्रोगराम बन गया मगर वो तो पहले ही हो चुकि है । " सारी शिकायतें परिधी ने भाई से लिपटे हुए ही कर दी । दोनों में बच्चपन से बड़ा प्यार था । आज साल बाद मिले हैं कैसे ना बाहर आए साल भर का प्यार बाहर । 
" शादी ही है दिदू । मगर किसकी ये सरप्राईज़ है । अच्छा वो छोड़ो ये बताओ जीजू कहाँ हैं और अंश ?" 
"अंश को तो तेरे बेटे ने पीछे ही किडनैप कर लिया बोला बुआ आप जाओ मैं और अंश बाद में आऐंगे और तेरे जीजू आ नही पाए । वो आजाते तो घर का काम कौन करता । " दोनों खूब ज़ोर से हंसने लगे 
" बेचारे जीजू । खैर चलो तुम्हे शादी वाले जोड़े से मिलवाता हूँ । " 
घर के अंदर 
साठ पैंसठ साल का एक जवान बूढ़ा जो पलंग कि पुश्त से सर टिकाए अपने पुराने दिनों कि गलियों में आवारा गर्दी कर रहा है । पूरा कमरा मानों एक लाईब्रेरी हो । कमरे को देख कर समझना मुश्किल है कि कमरे में लाईब्रेरी है या लाईब्रेरी में कमरा । और मज़े का बात ये है 90% किताबें एक ही लेखिका कीं " प्रज्ञा शर्मा " । पता नही ये बन्दा इस लेखिका का इतना बड़ा फैन क्यों है । खैर हमको क्या लेना । चलिए दूसरे कमरे की तरफ । अरे वाह यहाँ भी एक लाईब्रेरी ! मगर यहाँ सब किताबें "दिनकर शर्मा कीं" । ओह तो अब समझ आया प्रज्ञा शर्मा ! वेट वेट शायद वो हैं प्रज्ञा शर्मा । उस बुढ़ऊ से तीन साल छोटी बेहद जवान बुढ़िया । मैंने भले ही बुढ़ा बुढ़िया कह दिया पर आप मत कहिएगा क्योंकि इन दोनों को एक दूसरे के लिए ये शब्द सुनना बिल्कुल पसंद नही । इनका मानना है कि इंसान शरीर से नही मन से बूढ़ा होता है और इनका मन तब तक बूढ़ा नही होगा जब तक इन दोनों में से कोई एक सामने वाले को अलविदा ना कह दे ।  

मतलब बूढ़ा और बुढ़िया दोनों एक दूसरे के तगड़े फैन हैं । 
" ओ मेरी माँ कहाँ है तू । बेटी आई है तुम्हारी कुछ देर पति को साईड कर के अपनी औलादों अपने जिगर के टुकड़ों से भी मिल ले ।" परिधी घर में घुसते ही अपनी सबसे अच्छी सहेली यानी माँ को खोजने लगी । 
" आगया मेरा बच्चा । तुम दोनो तो जिगर के टुकड़े नही पूरे का पूरा जिगर हो । " प्रज्ञा जी ने दोनों को अपने सीने लगाया । 
" अच्छा तो फिर पापा क्या हैं ? " अपनी आदत से मजबूर परिधांश ने एक बेसर पैर का सवाल दाग दिया ।
" पगले वो तो मेरा शरीर और आत्मा हैं जहाँ मेरा जिगर रहता है । " 
" सच में लेखकों से बातों में कोई नही जीत सकता ।" घर में ठहाके गूँजने लगे । दिनकर बाबू भी अपने कोप भवन से बाहर आगए और बेटी को गले लगा लिया ।"
"और माँ ये बुढ़ापे में जवानी कहाँ से सूझ गई आप दोनों को इस उम्र में फिर से शादी ?" परिधी ने अपनी माँ से मज़ाक करते हुए कहा । 
" बताऐंगे बेटी ये।भी बताऐंगे बस थोड़ा सब्र करो ।" ये जवाब देते हुए दिनकर बाबू कुछ गंभीर से दिखे । परिधि भी।झेंप गई उसे अहसास हुआ कि उसके मज़ाक का तरीका गलत था । 
" पापा सारे मेहमान आ चुके हैं आप अभी तक तैयार भी नही हुए ? जल्दी तैयार हो जाइए आप दोनों मैं तब तक मेहमानों को देखता हूँ । दीदू आप जल्दी से दोनों को स्टेज पर ले आना । "
परिधी माँ को तैयार करने लगी इधर दिनकर बाबू भी।तैयार हो गए । दिनकर बाबू ने नीले रंग की शेरवानी पहनी थी जिसमें वो अपनी उम्र से काफी छोटे लग रहे थे मतलब शेरवानी जंच रही थी उन पर और जंचे भी कैसे ना नीला रंग प्रज्ञा जी का पसंदीदा जो था । उधर प्रज्ञा जी भी इस उम्र में कहर ढा रही थीं । दिनकर बाबू के पसंद की हल्के गुलाबी रंग की साड़ी पहने हुए प्रज्ञा जी बहुत सुंदर लग रही थीं । उनके स्टेज पर आते ही सबने उनका तालियों से स्वागत किया और अपनी जगह पर बैठ गए । पूरा पंडाल भरा था दिनकर जी के जानने वाले उनका और प्रज्ञा जी का परिवार रिश्तेदार सब आए थे । सब खामोश थे क्योंकि सब इंतज़ार कर रहे थे दिनकर जी के कुछ बोलने का क्योंकि ये जानने कि सबको बड़ि।उत्सुक्ता थी कि आखिर इस उम्र में ये दोनों फिर से इतनी धूमधाम से शादी क्यों करने जा रहे हैं । 
दिनकर जी ने माईक पकड़ा और बोलना शुरू किया 
मैं आप सब महमानों का स्वागत करता हूँ जो इतने कम समय में भी समय निकाल कर मेरी इतनी बड़ी।खुशी में शामिल हुए । मैं जानता हूँ आप सबके मन में ये सवाल घूम रहा है कि आखिर ऐसा क्यों वो भी इतनी धूमधाम से । लाज़मी है आपका ऐसा सवाल सोचना । इस उम्र में तो लोग तीर्थयात्रा पर जाते हैं पूजा पाठ या हवन यज्ञ का अनुष्ठान कराते हैं फिर मैने ये शादी का फैसला क्यों किया । आपको इसका जवाब दू उससे पहले आप सबसे कुछ बातें सांझी करना चाहूँगा । 
तकरीबन 40 42 साल पहले हम दोनों ने समाज और परिवार से लड़ कर एक दूसरे का हाथ थामा । उससे पहले मैने प्रज्ञा जी का हर सपना उनके मुँह से सुना था और जहाँ तक हर संभव कोशिश भी की उस सपने को पूरा करने की । हमने शादी कर ली सबसे लड़ कर ये जानते हुए कि ये ज़िम्मेदारी इतनी आसान नही होगी । मगर उस वक्त डरते तो शायद इस उम्र तक पहुँचते ही ना । ना ये रह सकती थीं मेरे बिना और ना मैं इनके बिना । लेखन क्षेत्र से जुड़ा था और हिंदी की क्या दशा है शुरू से आप सब जानते हैं । शादी के बाद गुज़ारे लायक हो जाता था । मगर हम बहुत खुश थे क्योकि हम साथ थे । 
मैने शादी से पहले भी कई बार इनसे कहा था " सोच लीजिए आप मेरे हाल से वाकिफ़ हैं । मैं आपको बस एक आम सी ज़िंदगी दे सकता हूँ वो ऐश आराम नही जो आपको आपके पिता जी के यहाँ षुरू से मिला है । " 

हर बार इनका एक ही जवाब होता । "आप लाऐंगे हम उसे ही पका कर मिल बांट कर खा लेंगे । आप जो देंगे उसे ही पहन लेंगे और आप जहाँ रहेंगे वहाँ आपकी बाहों में रह लेंगे ।" सुनने में फिल्मी सा लगता है पर ये मत भूलिए फिल्में भी हकीकत की हमशक्ल ही हैं । प्रज्ञा अपनी बात पर कायम रहीं हमने शादी कर ली उन्होने कभी कुछ नही माँगा । वो हर बार बस हिम्मत बढ़ाती और कहतीं आपकी जगह यहाँ नही आपको बहुत आगे जाना है और आपके साथ हम भी बढ़ेंगे । " मैं और वो एक सफल लेखक बन पाए इसका श्रेय उसी के विश्वास को जाता है । 
वक्त खुशी से बीतता रहा मगर उसका एक सपना चुपके से टूट गया था जिसके टुकड़ों कि चुभन तब तब देखने को मिलती जब जब हम किसी कि शादी में जाते । उसे पसंद था दुल्हन की तरह सजना उसका सपना था मैं बारात ले कर आऊँ । मगर हालात ने ये होने नही दिया । तब मैने इन्हे एक दिन कहा "मैं जानता हूँ प्रज्ञा जी आपका सपना था कि हमारी शादी धूम धाम से हो । मगर हालात को ये मंज़ूर नही था पर एक वादा करता हूँ मैं किस्मत से ये दिन वापिस छीन कर लाऊँगा और हमारी शादी बड़ी धूम धाम से होगी । मैं अपनी कमाई का कुछ हिस्सा जोड़ूँगा उस आखरी पड़ाव तक क्योंकि मुझे अपने बच्चों के भरोसे नही रहना कौन जानें उनकी सोच कैसी।हो । इसीलिए मैं उतने पैसे इकट्ठे करूँगा और हमारी शादी कराऊँगा धूम धाम से ।" 
तब प्रज्ञा जी मुस्कुराई थीं । मैं नही जानता उस वक्त उन्होने क्या सोचा होगा । मगर मैने उस दिन बस यही सोचा मुझे ये करना है । भगवान हमारा साथ दिया दिन अच्छे आ गए मगर तब बच्चों कि ज़िम्मेदारियों कि प्रथमिक्ता थी मन में । सोचा कि जब सब ज़िम्मेदारियों से मुक्त हो जाऐंगे तब करेंगे ये सपना पूरा । इसी लिए भगवान से रोज़ प्रार्थना करता था कि हमारा सपना पूरा होने तक हमें ज़िंदा रखें और उन्होने प्रार्थना मंज़ूर की । उनका दिल से आभार । उम्मीद है अब आप सबको पता लग गया होगा कि मैने ये सनकियों वाला काम क्यों किया ।"  पंडाल में मौजूद हर आँख नम थी और चेहरे मुस्कुरा रहे थे । 

परिधि ने पापा को गले लगा लिया और कहा " ऑई एम साॅरी पा" दिनकर जी ने भी माथा चूमते हुए कहा " कोई बात नही बच्चे।" 
प्रज्ञा जी बस नम आँखों से मुस्कुरा रही थीं और हाथ से इशारा कर रही थीं कि उनसे कुछ बोला नही जाएगा । साथ ही फ्लाइंग किस के साथ इशारा किया कि वो उनसे बहुत प्यार करती हैं । इधर से दिनकर बाबू ने गले लगा कर कान में कहा "मैं भी बहुत ज़्यादा प्यार करता हूँ आपसे । शुक्रिया मेरी ज़िंदगी में आने का और इसे खूबसूरत बनाने का । "
प्रज्ञा जी बड़ी मुश्किल से अपनी रूलाई रोक कर बोल पाईं " तुम पागल हो बहुत कड़े वाले।"
दिनकर जी ने लम्बी साँस ले कर कहा " हाँ तुम्हारे प्यार में ।" 
धीरज झा 

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