​एक किसान की हम सब को एक चिट्ठी....

 (पढ़ें मत महसूस करें) शहरी माहौल में पले बढ़े आज की युवा पीढ़ी जिसे किस्से पसंद हैं कहानियाँ पसंद हैं आशिकी से भरी कविताएं पसंद हैं उन सभी ...

 (पढ़ें मत महसूस करें)
शहरी माहौल में पले बढ़े आज की युवा पीढ़ी जिसे किस्से पसंद हैं कहानियाँ पसंद हैं आशिकी से भरी कविताएं पसंद हैं उन सभी से विनम्र प्रार्थना है कि ज़रा मेरी बात भी सुन लें आपके व्यस्त समय में से बस कुछ मिनट ही बर्बाद करूँगा, मगर शायद आपकी इस एक मिनट की बर्बादी से हमें और हमारे हाल को थोड़ी सी सहानुभूति ज़रूर मिल जाएगी ।
अब आप सोच रहे होंगे इतनी दुखियारी आवाज़ में बोलने वाला ये बन्दा है कौन तो जनाब जान जाईए "मैं हूँ आप ही के विकासशील देश का अविकसित इंसान । जिसे आप किसान कह कर बुलाते हैं । कई महानुभाव तो हमें अन्नदाता भी कहते हैं । मगर आज तक समझ नही पाया कि भला मैं कैसा अन्नदाता हुआ जिसे खुद अपनी मजबूरियों से हार कर गले में फंदा लगा लेना पड़ता है । हम जैसे दाता कहाँ से मिलेंगे जो सबके लिए अन्न उपजा कर खुद अपनी मामुली ज़रूरतें तक पूरी नही कर पा रहे । खज़ाने के ढेर पर बैठ कर रूपए रूपए को मोहताज होना कैसा लगता है जानते हो आप । कभी महसूस किया है उस किसान के उस आखरी दर्द को जिसे वो सह ना पाया और आत्महत्या कर ली । नही ना, तुम कर भी नही सकते क्योंकि तुम्हारे पास और भी बहुत से मुद्दे हैं । पर आज आपको थोड़ा सा महसूस ज़रूर करवाऊँगा ।
आप माॅल घूमने जाते हैं फिल्म देखने में कम से कम हज़ार लगा देते हैं । इधर जब हमारे बच्चे सिनेमा का नाम लेते हैं ना तो उन्हे ये कह कर फुसला देते हैं कि ये आवारा बच्चों का काम है तुम आवारा नही हो । जानते हैं क्यों क्योंकि हमें डर होता है इसे सिनेमा की लत लग गई तो हफ्ते में 20 रूपए खर्च देगा विडियो हाॅल में जा कर । हमारा अनाज ब्लैक में बेच कर शाहूकार महल पर महल पीटते जा रहे होते हैं और हमसे हमारी ना जाने कब गिर जाने वाली छत की मरम्मत नही होती । बेटी की धूमधाम से शादी और बेटे की पढ़ाई का अरमान अनाज के घटने के बाद भी सही वक्त पर ना मिलने के दर्द के नीचे दब जाता है । अनाज की रकम नही आती ज़रूरत के लिए कर्ज़ा लेते हैं जब तक रकम आती है ब्याज़ का मुँह बड़ा हो गया होता है । क्या करें कहाँ से जोड़ें पैसें अपने अरमानों के लिए । ज़मीन बेच देंगे बेटी की शादी और बेटे की पढ़ाई के लिए, गलत भी क्या है इसमें जब समाज और सियासत को दर्द ना महसूस हो उनकी आँखें ही ना देख पाएं हमें तब  बेबस माएं बिक जाया करती हैं साहब अपने बच्चों के लिए ये धरती माँ भी बिक जाएगी । 
हमारा ही उपजाया अनाज हमें ही भीख के रूप में मिलता है वो भी कभी मिलता है कभी नही । तंग हाली झेल कर पसीना बहा कर पानी की किल्लत झेल कर अनाज हम उपजाते हैं और हमारा ही ये हाल । ज़मीनदार किसान हो या आम सा किसान अपने स्तर पर हाल सब का एक जैसा ही है । फर्क यही है की हमारे पास इस फसल की आमदन के सिवा जीने का कोई आसरा नही अगर होता तो अपने बीवी बच्चों को बिलखता छोड़ कर फंदा ना लगाते । जीना कौन नही चाहता साहब बस हालात कई बार ऐसे हो जाते हैं की कोई और रास्ता ही नही दिखता सिवाए सब कुछ से मुक्त हो जाने के । 
ये चिट्ठी लिख कर ये सब आपको इसलिए बता रहा हूँ क्योंकि आप आज हो आपके हाथ में ताकत है आप जिसका पक्ष ले लो उसका उद्धार कर देते हो । मैं जानता हूँ आपके पास लड़ने के लिए और भी बेहतर मुद्दे हैं मगर हम किसानों के लिए बस थोड़ा सा लड़ लो बस हमारी ज़रूरत भर की चीज़ों के लिए हमारी भूख हमारे बच्चों की शिक्षा हमारी धरती माँ के लिए बस थोड़ा सा लड़ लो ।
धन्यवाद

आप सभी का अभागा अन्नदाता 

धीरज झा

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क़िस्सों का कोना : ​एक किसान की हम सब को एक चिट्ठी....
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