आइए दिवाली मनाएं

  पटना से पंजाब आ रहा था दिवाली में । एक तो टिकट दो दिन पहले की मिली थी, जिसके हिसाब से मुझे दिवाली की एक रात पहले घर पहुँच जाना था । मगर गा...






 



पटना से पंजाब आ रहा था दिवाली में । एक तो टिकट दो दिन पहले की मिली थी, जिसके हिसाब से मुझे दिवाली की एक रात पहले घर पहुँच जाना था । मगर गाड़ी हमारी का नाम था शहीद जो अच्छों अच्छों को शहीद कर देती है । जैसे उस दिन मुझे और मेरे दिवाली प्लस घर जाने के उत्साह को किया था । गाड़ी 21 घन्टे लेट थी, मुझे अपने शहर पहुँचते पहुँचते रात के दस बज गए । सब दिवाली मना रहे थे और मैं अभी शहर पहुँचा था अपने । अब रिक्शा कहाँ से मिले, आज दिवाली की रात थी मेरे 30 रुपए के लिए भला वहाँ कौन आज के दिन भी इंतज़ार करता । फोन बंद पड़ गया था इसलिए घर फोन नही कर सकता था । जाया तो पैदल भी जा सकता था मगर सामान ज़्यादा होने के कारण पैदल जाने में थोड़ी दिक्कत महसूस हो रही थी । फिर भी कोई रास्ता ना नज़र आता देख मैं पैदल ही निकल पड़ा ।



 



 



पर दस कदम ही चला था कि पीछे से किसी ने आवाज़ दी "ओ बाऊ जी किधर जाना है ?" मैने पीछे मुड़ कर देखा एक रिक्शे वाला था । मैने उसे घर का पता बताया और बैठ गया । मैने बैठते ही उससे कहा "क्यों भाई, आज दिवाली है और तुम काम में लगे हुए हो ?” रिक्शे वाला बस मुस्कुराया इस से ज्यादा उसने कुछ कहा नहीं । फिर थोड़ी इधर उधर की बातें करने के बाद उसने बताया की वो बिहार से है उसके बेटे को लीवर प्राब्लम है उसके लिए ही वो पैसे जमा कर रहा है दिन रात मेहनत कर के । यहाँ वो अकेला है और ऊपर से तंग है तो ऐसे में दिवाली क्या मनाये, वो कहने लगा की अब बहुत से पैसे जमा कर के गाँव जायेगा और वहीँ अपने परिवार संग दिवाली मनायेगा । उस वक़्त मैं क्या महसूस कर रहा था ये मुझे आपको बताने की शायद ज़रूरत नहीं क्योंकि अगर आप इन्सान हैं तो आपने महसूस कर लिया होगा ।



 



 



मेरा घर आगया था मैंने उसे किराये के इलावा 100 रुपये और एक मिठाई का डिब्बा दिया, अब उसकी आँखों में भी दिवाली थी । ऐसे बहुत से लोग हमारे आसपास दिवाली के दिन भी आँखों में अँधेरा लिए घूमते हैं । कुछ ज्यादा नहीं करना बस सी ख़ुशी भरी भूंक ही मारनी है उनकी दिवाली के बुझ चुके दीये में फिर से रौशनी आजायेगी ।



 



 



भई खुशियों का त्यौहार । तो खुशियों पर हर एक का हक होना चाहिए । उनका भी जिनको शायद भगवान ने इसका हक़ नहीं दिया । बाज़ार में फेरी वाले रिक्शेवाले घर से दूर रह रहे मजदूर आस पड़ोस में घुमने वाले बचे घरों में काम करने वाले इत्यादि इन सब को हक़ है खुश होने का अगर ये खुश नहीं तो कहीं न कहीं इनकी ख़ुशी हमने ही दबा राखी है । तो आइये दिवाली में खुश हों और खुशियाँ बांटें, कुछ ख़ुशी के दीप इनके घर भी जलाएं ।



 



 



आप सब को धनतेरस और दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएं



 



 



 



धीरज झा



 



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क़िस्सों का कोना : आइए दिवाली मनाएं
आइए दिवाली मनाएं
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