​टार्चर ज़िंदगी से डियर ज़िंदगी तक

मैं फिल्मों का शौकीन हूँ मगर समिक्षा लिखना मुझे नही आता पर हाँ कुछ फिल्में होती हैं जिनके बारे में बिना लिखे रहा नही जाता । कुछ फिल्में जो द...

मैं फिल्मों का शौकीन हूँ मगर समिक्षा लिखना मुझे नही आता पर हाँ कुछ फिल्में होती हैं जिनके बारे में बिना लिखे रहा नही जाता । कुछ फिल्में जो दिल को छू जाती हैं उनके बारे में लिखता हूँ या जिन फिल्मों को देखने के बाद कुछ दिनों तक फिल्मों पर से विश्वास उठ जाता है उन पर लिखने का मन करता है । मगर आज जिस फिल्म के बारे में लिख रहा हूँ वो ऐसी है जैसे कोई छोटी सी हीरे जड़ी अंगूठी को एक बड़े से डब्बे में कई छोटे डब्बों के बीच गिफ्ट रैप कर के रखा हो, हम पैक डब्बों को खोलते खोलते बोर हो जाऐं मगर अंत में उस हीरे की अंगूठी को पा एक बड़ी सी खुशी एक बड़ा सा सुकून मिले । 
'डियर ज़िंदगी' ये फिल्म मैने इसलिए नही देखी क्योंकि इसमें आलिया भट थी और इसलिए तो बिल्कुल नही देखी क्योंकि इसमे शाहरूख खान थे । मैने इसलिए देखी क्योंकि आज छुट्टी होने के कारण कल रात मुझे कोई फिल्म देखनी थी । खैर ये मायने नही रखता मैने क्यों देखी मायने ये रखता है की आपको ये फिल्म देखनी चाहिए या नही । तो अगर आप चटपटी कहानी वाली फिल्म पसंद करते हैं तो ये फिल्म आपके लिए बिल्कुल भी नही है । ये फिल्म है उनके लिए जिन्हे हर वो कहानी अच्छी लगती है जो कुछ समझाती है कुछ सिखाती है और डियर ज़िंदगी भी एक ऐसी ही कहानी है जिसे लगभग इंटरवल तक झेलने के बाद यह वो सब सिखाती है जो आज की जनरेशन से ले कर माँ बाप तक सबको समझना चाहिए । 
फिल्म में आलिया भट्ट का अभिनय तारीफ के काबिल है मगर कहीं कहीं कुछ ज़्यादा ही ईरीटेटिंग सी ओवर एक्टिंग कर डाली है । आलिया का वो रोने के लिए मिर्ची खाने वाला सीन देख कर ऐसा लगा जैसे मेरा ही आईडिया चुराया है क्योंकि ये सनकी काम मैं छः साल पहले कर चुका हूँ और उसके बाद कितनी बार लिखा भी मगर अच्छा लगा देख कर कि मैं अकेला सनकी तो नही हूँ जो मिर्ची खा कर बहाने से रोता है । खैर फिल्म पर लौटते हैं । शाहरुख खान का अभिनय बहुत पसंद आया, खास कर उनकी समझाई गईं बातें । ये वो बातें हैं जो आज के दौर में हर एक को समझ आनी चाहिए । शाहरुख एक डायलाॅग बोलते हैं जिसमें वो कहते हैं जब हम खुल कर रो नही सकते तो खुल कर हंसेंगे कैसे । जब हम अपने माता पिता को अपना गुस्सा नही दिखा सकते तो भला प्यार कैसे दिखाऐंगे ।" इस बात से मैं एक दम सहमत हूँ क्योंकि मैं ऐसे बच्चों में से ही एक हूँ । 
मुझे याद है मैने पापा के सामने माँ के सामने बहुत बार अपना गुस्सा दिखाया है खुद की बात समझाने के लिए रोया हूँ चिल्लाया हूँ मगर माफी माँगने के लिए उनसे लिपटते भी देर नही लगी, उन्हे गले से लगाने के लिए बहाने की ज़रूरत भी नही पड़ी, हर बात खुल कर कह सका और पापा या माँ इस बात को अच्छे से समझते रहे इसीलिए मेरे गुस्से को भी समझा महसूस किया कि ये गुस्सा है क्यों और बाद में उसका समाधान भी ढूँढा । 
इस कहानी का एक हिस्सा खास कर उन माँ बाप के लिए है जो ये तो चाहते हैं कि उनका बच्चा लायक हो मगर उसे लायक बनाने की ज़िम्मेदारी नही ले पाते या यूँ कहें उन्हे समझ ही नही आता की वो करें क्या । बच्चे उलझे हैं की वो अपनी बात माँ बाप को कैसे समझाएं । माँ बाप दुविधा में हैं की बच्चे से अपने मन की कैसे करवाएं । सीधा सा तरीका है एक दूसरे के मन में जो भी शिकायतें हैं कह दो, एक दूसरे को समझो ये परेशानी अपने आप दूर हो जाएगी । 
शुरू का एक घण्टा फिल्म 'टार्चर जिंदगी' थी पर शाहरुख की ऐंट्री के बाद 'डियर ज़िंदगी' हो गई । मेरे हिसाब से फिल्म देखने लायक है समझने लायक है । फिल्म को आलिया या शाहरुख के लिए नही बल्की अपने लिए देखें । अच्छा लगेगा ।
धीरज झा 

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क़िस्सों का कोना : ​टार्चर ज़िंदगी से डियर ज़िंदगी तक
​टार्चर ज़िंदगी से डियर ज़िंदगी तक
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