​नमन उन्हें जिन्हें इतिहास ने अपने गर्भ में छुपा लिया

हम एक गरीब को सौ रुपए या उस से थोडा ज्यादा का कोई सामान देते हैं और उसके बदले उस गरीब के तरह तहर के मुह बनवा कर 20 से ज्यादा सेल्फियाँ ले ले...

हम एक गरीब को सौ रुपए या उस से थोडा ज्यादा का कोई सामान देते हैं और उसके बदले उस गरीब के तरह तहर के मुह बनवा कर 20 से ज्यादा सेल्फियाँ ले लेते हैं । भैया ज़रा वो कम्बल ओढ़ लो जो दिया है, भैया थोडा स्माइल करो न, भैया वो बच्चे को गोद में ले लो । मन ही मन भैया भी कहता है साला 100 की चीज़ दी और 400 की दिहाड़ी लगवा ली । अब इतने पर ही शांति नहीं मिलती इसके बाद सोशल मिडिया पोस्ट भी होता है । एक तरह से अच्छी बात भी है की आपकी देखा देखि सेल्फी के लिए ही सही बाकि भी तो मदद करेंगे । पर हद तब हो जाती है जब कोई खास लाईक कमेन्ट नहीं आता तो मन में होने लगता है बेकार में रुपये भी गए किसी ने तारीफ़ भी नहीं की । 
दूसरी तरफ आज कल चुनाव का घमासान चल रहा है अभी पिछले साल तक जो नेता लोग रजाई से निकलते नहीं थे ठण्ड में आज कल 20 20 रुपये के एक दो फल ले कर गरीबों के पीछे भाग रहे । अरे भैया ले लो न और साथ ही एक सेल्फी खिचवा लो । और फिर जद्दोजहद के बाद खिचवाई उस तस्वीर को अपने एफ बी वाल पर लशान से लगा कर केप्शन में लिखा होता है ग़रीबों का दुःख दर्द बांटते हुए हमारे देशभक्त नेता फलाना फलाना जी । अभी पिछले दिनों एक फोटो देखी थी जिसमे एक नेता जो शायद दान वीर कर्ण के बुआ के लड़के के साले थे अपनी उदारता दिखाते हुए एक मरीज को एक निम्बू की साईज़ का संतरा भेंट कर रहे थे । 
भाई ये है आज की देश भक्ति, मैं ये नहीं कहता की सब दिखावा करते हैं मैं बस जो सच में दिखावा मात्र करते हैं उन्हें बताना चाहता हूँ की असल देशभक्ति क्या होती है । काकोरी कांड याद है या भूल गए । नहीं याद होगा न अच्छा मैं बताता हूँ, कोई शर्म की बात नहीं हमें कोई भी बात कभी न कभी पहली बार ही पता लगती है किसी को थोडा पहले तो किसी को बाद में । काकोरी कांड वो घटना है जिसने बर्तानिया सरकार को इस बात का अहसास करा दिया था कि अब उनके दिन लड़ चुके हैं अब ज्यादा दिनों तक वो इस देश को नहीं लूट सकते क्योंकि विद्रोह की दबी आवाज़ अब उनके कानों के परदे फाड़ रही थी । जो हाथ बंधे थे वो अब उनके गले तक आ पहुंचे थे । काकोरी में सरकार का खजाना लूट कर भारतीय स्वाधीनता संग्राम के क्रांतिकारियों ने सबको ये बता दिया था कि उनका उदेश्य सिर्फ और सिर्फ अंगेजी हुकूमत को जड़ से उखड फेंकना है । इसमें रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्लाह, ठाकुर रोशनसिंह सहित 19 अन्य क्रान्तिकारियों ने भाग लिया था । 
इनमे से एक लड़का जो दुबला पतला सा हल्की सी दाढ़ी रखे उम्र तकरीबन 24 साल भी शामिल था । जो दुर्भाग्यवश पकड़ा गया अपने कुछ अन्य साथियों के साथ और फिर उस पर इलज़ाम लगा शासन के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ने एवं खजाना लूटने का । इसी इल्ज़ाम के तहत लखनऊ की विशेष अदालत ने छह अप्रैल 1927 को निर्णय सुनाया, जिसके अन्तर्गत रामप्रसाद बिस्मिल, रोशन सिंह तथा अशफाक उल्लाह और उस लड़के को मृत्यु दंड की सज़ा सुना दी गई । शेष तीनों को 19 दिसम्बर को फाँसी दी गयी; लेकिन भयवश अंग्रेजी शासन ने उस लड़के को गोंडा कारागार में 17 दिसम्बर, 1927 को ही फाँसी दे दी.
अजीब लड़का था मरते मरते भी मुस्कुरा रहा था । फाँसी पर चढ़ने के पूर्व उस लड़के ने नित्य की भाँति स्नान किया, गीता पाठ और व्यायाम किया। उसके बाद अपना वस्त्र धारण कर मजिस्ट्रेट से कहा, 'मैं समझता हूँ, मुझे देर नहीं हुई।' फिर मजिस्ट्रेट के साथ फाँसी घर की बढ़ने लगे। मजिस्ट्रेट यह सब देखकर आवाक था। उसने कहा, 'महाशय आपको यदि आपत्ति न हो, तो एक बात पूछूँ? मैं 45 मिनटों से आप जो कुछ कर रहे थे, देख रहा था। आपने स्नान किया, स्वाभाविक था, गीता पाठ किया, वह भी स्वाभविक था, क्योंकि आप अगली घटना को सहन करने की प्रेरणा ग्रहण करना चाहते होंगे, लेकिन मेरी समझ में यह नहीं आया कि आपने व्यायाम क्यों किया?'
लड़के ने अत्यन्त शान्ति से कहा, 'आप जानते हैं कि मैं हिन्दू हूं और इसके नाते मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि मैं मरने नहीं जा रहा हूँ, बल्कि मैं अपनी मातृभूमि की स्वतन्त्रता के लिए पुनः जन्म लेने जा रहा हूँ और उसके लिए अगले जीवन में बलिष्ठ शरीर चाहिए। इसीलिए मैंने आज भी, फाँसी के पूर्व भी व्यायाम किया। मजिस्ट्रेट इस महान क्रान्तिकारी की वीरता देख आश्चर्यचकित रह गया।' उसके बाद फंदे को चूम कर भारत माता की जय और वन्देमातरम के नारे लगाने लगा । 
जानते हैं वो लड़का कौन था ? आप में से बहुत से लोग नहीं जानते होंगे कि वो कौन था क्योंकि उसकी मौत पर राजनीति अहि हुई थी वो शोर मचा कर नहीं बल्कि शांति से चुप चाप मारा था । ना उसने अपनी देशभक्ति का प्रमाण लोगों के सामने अपना गुणगान कर के प्रस्तुत किया था । मगर हमें जानना चाहिए की हमारी इस आजाद साँस के लिए किसने अपने प्राणों तक को कुर्बान कर दिया । वो लड़का था राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी जिसे इतिहास ने अपनी कोख में छुपा कर रख लिया है जिसे भविष्य ने और हमने अपनी यादों और श्रद्धांजली में जगह नहीं दी क्योंकि वो चुपचाप देश और हमारे लिए फाँसी पर झूल गया । 
राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी के बलिदान दिवस पर नमन है उस वीर शहीद को उस सच्चे देश भक्त को उस भारत माँ के सपूत को । 
जय हिंद जय भारत 
धीरज झा

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क़िस्सों का कोना : ​नमन उन्हें जिन्हें इतिहास ने अपने गर्भ में छुपा लिया
​नमन उन्हें जिन्हें इतिहास ने अपने गर्भ में छुपा लिया
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