ज़ालिम त्योहार...

. " रे मनोहरा ! बिहान हो गईल आ तू ससुर अभीओ ले सुतल हऊ | आई तिला सकराँत बा जौले ले नहैबे न तौले ले अन्न के एगो दाना मुँह में न सटी | &q...

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" रे मनोहरा ! बिहान हो गईल आ तू ससुर अभीओ ले सुतल हऊ | आई तिला सकराँत बा जौले ले नहैबे न तौले ले अन्न के एगो दाना मुँह में न सटी | " रामपदारथ अपना बेटबा पर खिसिया रहा है | दतुअन रगड़ते आ कुल्ला गुलगुलाके हुये गरिया रहा है सुईठा को |
" ससुर भर दिन टनडेली करब$ आ भर दुपहरिया ले सुतब$ , हमरा घर में ई न चली | एनतिये करे के बा त भाग जा घर छोड़ के | तोहर जईसन कपूत से निपुतरे ठीक बानी हम | " रामपदारथ आज थमने का नाम नही ले रहे और मनोहरा जैसे कान में रूई ठूँस के सोया है | सिरहना को पजियाये हुये हर कुँवारे की तरह ठंड मना रहा है बाप के कहर से अंजान बेखर |
मनोहरा की माँ समझा रही है रामपदारथ को " काहे भोरे भोरे तेओहार के दिन लईका के गरियबईत बानी | अभी बेरे कोन भईल बा ? सूते दी न ओकरा के | " कहते हैं ना पूत कपूत हो जाता है पर माता कुमाता कभी नही होती | माँ को तो अपने ललना ललनी की गल्तियाँ भी नही दिखतीं वो गल्तियाँ माँ रे लिये महज़ बच्चपना होता है |
" तू त चुपे रह$ , तोहरे चलते बिगड़ल बा ई | आठ बज गईल आ तू पूछईतारू की अभी बेरे का भईल बा | दुनू मतारी बेटा के घर से बेगा देम , भेर फिरईत बऊआईत रहिया रने रने | " इतना कह के रामपादारथ मनोहरा के एक लात हन देते हैं आ बेचारा दुबर पातर मनोहरा धड़ाम से खटिया से निचा गिरता है , गिरते ही हड़बड़ा के कहता है " न हो भईजी अब न आँख मारेम कोनो लईकी के , एमकी बेरी छोड़ दू | " इतना कह के रोने लगता है फिर सामने देखता है तो यमदूत जैसा मुँह बनाये ओकर बाबू खड़ा है |
" देख देख सरऊ सपनो में लईकी सब खातिर लाते खात है | " रामपदारथ जब तक एक लात मारने खातिर आगे बढ़ता है तब तक मनोहरा की अम्मा अपने लाल को अपने आँचल में छुपा लेती है | " खबरदार जे हमरा लईका के हाथो लगयेला त , बूझ लिह$ | " अम्मा शेरनी बन गई है और मनोहरा दुबका पड़ा है अपने बाप के आतंक से सहमा हुआ | रामपदारथ माँ बेटा को गरियाते हुये बहरा चला जाता है | अम्मा अपने लाल (जो असल में तबा के पेनी जेतना काला है ) को चुप कराती है और कहती है | " चुप होजो हमर लाल | जाई अब नहा ली जा के | तोहरा ला चुड़ा के लाई आ दही धयेले बानी | जल्दी से नहा के आई | "
बेचारा मनोहरा चला जाता है नहाने सोचते हुये , साला ई अच्छा तिला सकराँत हुआ हमारा भोरे भोरे लात खा लिये | पर लाई खाने के बाद मनोहरा भी लात का ग़म भूल गया | बड़ा ज़ालिम त्योहार है ये भी नहाने के नाम पर कितने मासूमो का आज शोषण हो गया होगा | खैर उम्मीद करता हूँ आप सब भी मेरी तरह मन मर के नाहा ही लिए होंगे । अब त्यौहार का मज़ा लीजिए, धुप से सेकिए, लाई खाईए, पतंग उड़ाइए, खुश रहिए खुशियाँ फैलाइए बस आज नाहा लीजिए चाहे पूरा महिना मत नहाईए । आ सभी को मकरसंक्रांति, तिलासक्रांत या खिचड़ी जो भी कह लीजिए की हार्दिक शुभकामनाएं ।

पोस्ट भले पुराना है नहाने को ले कर भावनाएं आज भी ऐसी ही हैं...
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धीरज झा...

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क़िस्सों का कोना : ज़ालिम त्योहार...
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