​स्वार्थियों की भीड़ में एक अकेला निस्वार्थी

आज के संडे स्पैशल में कोई कहानी या चिट्ठी पत्तर नहीं आज आपके लिए है एक ऐसे इंसान का परिचय जो लड़ रहा है बेटियों के लिए उनके न्याय के लिए । आप...

आज के संडे स्पैशल में कोई कहानी या चिट्ठी पत्तर नहीं आज आपके लिए है एक ऐसे इंसान का परिचय जो लड़ रहा है बेटियों के लिए उनके न्याय के लिए । आपको उनके बारे में जानना चाहिए। आईए बताता हूँ कौन हैं वो ।
अभी दो दिन पहले दिल्ली के बीजेपी कार्यालय में जाना हुआ । जहाँ ज़िंदगी के एक बड़ा ही दिलचस्प पहलू देखने को मिला । जैसा की आप सब जानते हैं आज कल देश में चुनावी रंग की मात्र ज़्यादा है ऊपर से इन सब में गेरुए रंग की तो कुछ ज़्यादा ही पूछ है । भाजपा अपने प्रत्याशियों के पत्ते खोल नही रही और भाजपा नेता कार्यालय से डोल नही रहे । नेताओं के चेहरे पर वो बैचैनी थी जो ज़माने पहले अधिकांश पुरषों के चेहरे पर तब दिखती थी जब वो पिता बनने वाले होते थे । पत्नी की चिंता कम ये चिंता ज़्यादा होती कि लड़का होगा या लड़की । लड़की हुई तो क्या होगा पहले से परिवार में लड़कियों की संख्या ज़्यादा है इसके ब्याह का खर्च कैसे उठाऊँगा । उसी तरह नेता लोग पार्टी की चिंता छोड़ इस चिंता में थे कि उन्हे टिकट मिलता है या नही । 
मतलब की वहाँ मौजूद हर इंसान वहाँ अपने स्वार्थ के लिए खड़ा था । सच कहूँ तो हम लोग भी अपने स्वार्थ के लिए ही उन सब स्वार्थियों के बीच खड़े थे । बड़ी बेचैनी थी अपने काम को ले कर इतने में मेरी नज़र सामने से आ रहे एक छोटे कद के इंसान पर पड़ी जिसने गले में एक तख्ती टांग रखी थी । तख्ती पर बेटी बचाओ कर के कुछ लिखा था । मैं ये नही कहूँगा उसे देख कर मन पसीज गया या रोना आया । असल में उसे देख कर मैं हंस पड़ा अचानक से ये सोच कर कि क्या तमाशा है यार, लोग दो पैसे के लिए किस तरह खुद का ही मज़ाक बना रहे हैं । इतना सोच कर उस पर हंस कर मैने भी आम लोगों की एक जैसी मानसिकता का उदाहरण दिया और फिर से स्वार्थी बन कर अपना काम करने लगा । 
थोड़ी देर बाद मैने देखा वो इंसान भाजपा कार्यालय के मुख्य द्वार पर चुप चाप खड़ा है और एक पर्चा सबको बांट रहा है । मैने अब सोच लिया कि जा कर देखूँ तो सही वो किस मतलब के लिए वहाँ आया हुआ है । मैं जैसे ही उसके पास गया उस मतलबी इंसान ने मेरे हाथ में एक कागज़ पकड़ा दिया ( उस कागज़ की तस्वीर भी पोस्ट कर रहा हूँ आप भी पढ़ें उस पर लिखा क्या था ) 


मैने भी वो कागज़ ले कर उसे पढ़ा और पढ़ने के बाद ढड़ाम से गिर पड़ा, अपनी ही नज़रों में, ये सोच कर की मैं बिना जाने इस आदमी पर हंसा कैसे मैं कैसे वो बन गया जिसके लिए मैने हमेशा सबको रोका । उस कागज़ पर बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के शिर्शक के साथ सरकार से अपील की गई थी कि बरात्कार के अपराधियों को 180 दिन के अंदर फांसी दी जाए जिस से इन हैवानों के मन में डर बैठे और ऐसे घिनौने अपराध खत्म हों । 

मैने उससे पूछा "क्या मिलता है आपको ये सब कर के ?"

उसका जवाब बस इतना था "तस्सली" और फिर वो मुस्कुरा दिया, जबसे उसे देख रहा था तब से पहली बार मुस्कुराया वो । 
"बहुत अच्छा काम कर रहे हैं आप । इसे करने का मन कैसे बनाया ?" 
"सर सुबह की अखबार उठाइए और पढ़िए तो आपको रोज़ पाँच से दस ऐसी खबरें मिल जाएंगी जिसमें 4 साल की बच्ची से 50 की महिला तक के बलात्कार हुआ होगा । हम अखबार पढ़ते हैं और अगर थोड़ी इंसानियत दिखाते हैं तो थोड़ा अफ़सोस कर के अखबार साईड में रख देते हैं । हम फिक्र करें भी क्यों हमारे साथ ऐसा तो नही हुआ ना हमने तो वो दर्द वो पीड़ा नहीं महसूस की ना । मगर जिन्होंने इसे महसूस किया जिनके परिवार पर ये दुख बीता है क्या वो हमारे एक मिनट के अफ़सोस से अपने साथ हुआ अन्याय भूल पाएंगे ? बस सर यही वो बात थी जिसने मुझे चैन से बैठने नहीं दिया । मैने मन बना लिया की मैं कोशिश करता रहूँगा तब तक जब तक कुछ हासिल नहीं कर लेता । मैं शांतिमय ढंग से बस लोगों में जागरूकता फैलाने की कोशिश करता हूँ । अगर मेरी तरफ देख कर कोई एक इंसान भी इसके लिए आवाज़ उठाता है तो उसे देख कोई एक और उसके आगे कोई एक करते करते एक दिन पूरा देश आवाज़ उठाएगा और हमारी बात सुनी जाएगी । बस यही हमारा काम है और यही हमारा फायदा है ।" इतना कह कर वो मुस्कुराने लगा । उसे देख कर लग रहा था जैसे उसे संतोष मिला हो अपनी बात कह कर । जैसे उसने वो एक आदमी ढूँढ लिया हो जिसकी उसे तलाश है । 
उस वक्त मुझे लगा की यहाँ इतने स्वार्थियों में एक यही ऐसा इंसान है जो निस्वार्थभाव से अपने उस मक़सद को अंजाम देने में लगा हुआ है जिससे उसका कुछ फायदा नही है । मैने उनके साथ एक तस्वीर ली जिसे पोस्ट कर रहा हूँ । इन्हे देखिए और ये दिल्ली की सड़कों पर जहाँ मिलें इनसे बात करिए और भरोसा दिलाइए की हम आपके साथ हैं और अपने स्तर से इस अभियान को आगे बढ़ाते रहेंगे । इतने स्वार्थियों के बीच इस निस्वार्थी रविकांत जी को मेरा सलाम 😊


धीरज झा

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क़िस्सों का कोना : ​स्वार्थियों की भीड़ में एक अकेला निस्वार्थी
​स्वार्थियों की भीड़ में एक अकेला निस्वार्थी
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