​एक चिट्ठी डायरेक्टर बाबू के नाम

अमाननीय डायरेक्टर साहब कैसे हैं आप ? वैसे इतनी कुटाई और छीछालेदर के बाद तो आपका ठीक होना जायज़ नही है, हाँ अगर आप बेशर्मी दिखाएं तो बात अलग ...

अमाननीय डायरेक्टर साहब
कैसे हैं आप ? वैसे इतनी कुटाई और छीछालेदर के बाद तो आपका ठीक होना जायज़ नही है, हाँ अगर आप बेशर्मी दिखाएं तो बात अलग है । हमारा गुलटेमा भी ऐसा ही है चार लात कोई मार देता है उसे वो थोड़ा भाऊँ भाऊँ करता है और फिर से मस्त हो जाता है । कहते हैं ना ठंड और बेईज्जती जितनी ज़्यादा फिल करो उतनी ज़्यादा लगती है । आपका और गुलटेनमा का अच्छा है बेईज्जती फीले मत करो । 
अच्छा सुने हैं आप अपना बीच का नाम अपनी माता जी के नाम पर रखे हैं ? बहुत खुशी हुई ये जान कर सच में कि आप अपनी माता जी का कितना सम्मान करते हैं । मगर क्या आपने कभी ये नही सोचा की इतना ही सम्मान आपको इतिहास की उन विरांगनाओं का भी करना चाहिए जिन्होने भारत की आन बान शान के लिए हंसते हंसते अपने प्राण गंवा दिए । नहीं वो आपसे नहीं होगा आप उनका सम्मान कर भी नहीं सकते क्योंकि व्यापारी हैं ना आप, लोगों की संवेदनाओं के खरीद बेच का व्यापार करते हैं । अगर आप सम्मान अपमान को साथ ले कर चलेंगे तो आपका धंधा ही चौपट हो जाएगा । भले ही बदले में लोग आपको लतियाते रहें मगर आप अपने धंधे के असूलों पर अड़े रहना । जैसे लाख लात खाने के बाद गुलटेनमा मुंह मारना नहीं छोड़ता वैसे ही आप भी अपना कमीनापन्न मत छोड़ना । 
वैसे भी ये कौन सा पहली बार है । ये बात अलग है जम कर लात इस बार खाए वरना आपका तो हमेशा का धंधा है । एक महान सेनापति जो भारत इतिहास का इकलौता ऐसा योद्धा था जिसने एक भी पराजय का मुंह नहीं देखा था जिसने दिल्ली का तख्त तक जीत लिया था । मगर तुमन क्या किया अपना धंधा चलाने के लिए उसकी कामयाबियों को साईड करते हुए उन्हें प्रेम रोग से विचलित हो कर मरते हुए दिखाया । नुक्कड़ वाले छिछोरे लौंडे बन कर इतिहास को एक परेशान लड़की समझ कर झेड़ना बंद कर दो क्योंकि लड़की सेंडल उतार कर मारेगी मगर इतिहास से छेड़ छाड़ के बदले तलवार भी चल सकती है । इंसानियत के नाते कह रहा हूँ संभल जाओ वरना अंजाम और बुरा हो सकता है । 
तुम्हे प्रेम ही दिखाने का शौख है तो उस विरांगणा का देश प्रेम दिखाते उसका अपने असतित्व के प्रति प्रेम दिखाते उसका अपने असल प्रेम के प्रति प्रेम दिखाते । ऐसा प्रेम क्यों दिखाने की सोची जिसकी गवाही इतिहास तुम्हें कभी नहीं दे सकता । उस वेदना उस पीड़ा को महसूस कर के देखो जो उस वीरांगणा ने खुद को अग्नि को समर्पित करने के वक्त महसूस की होगी । सबको उन औरतों में से मत समझो जो कहती हैं सीता आज के ज़माने में होती तो तलाक ले लेती । तुम इन महान आत्माओं को नहीं समझ पाओगे क्योंकि तुम्हें बस अपना धंधा चलाना है । तुमने उन्हें झूठी प्रेम कहानियों में ही सबके सामने परोसोगे क्योंकि तुम जानते हो ज़्यादातर लोग यही पसंद करेंगे तो अगर ज़्यादातर लोगों से फायदा होता है तो कुछ एक से लात खा लेने में क्या बुराई है ना । 
मौका है संभल जाओ वरना यहाँ के लोग बड़े सनकी हैं कब किस वजह से माथा ठनक जाए किसे पता । और रही बात तुम्हारे पीछे ऊंगली कर के तुम्हे आगे बढ़ने की सीख देने वालों की तो सुनो वो गुलटेनमा जो है ना वो भी जब लात खाता है तो पीछे से कुछ पिल्ले भौंक कर उसे चढ़ाते हैं कि भाई आगे बढ़ मगर जैसे ही उसे दुबारा लात पड़ती है बाकि के पिल्ले अपनी जान बचा के निकल लेते हैं । तो इन पीछे से चढ़ाने वालों पर ज़्यादा भरोसा मत करना । बाकि तो जैसा है वैसा हईए है । कुछ गलत लिखा हो तो दिल पर ज़रूर लेना तुम्हे बुरा लगे इसी लिए ये चिट्ठी लिखी है । 
तुम्हारा अशुभचिंतक 
धीरज झा

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क़िस्सों का कोना : ​एक चिट्ठी डायरेक्टर बाबू के नाम
​एक चिट्ठी डायरेक्टर बाबू के नाम
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