​भीड़ के अलग अलग चेहरे (संडे इस्पेसल)

"का जगेसर बाबू, किधर का तईयारी खींचे हैं महराज, आप तो अईसे सरसराते हुए भाग रहे हैं जईसे भोरे भोरे लोग सब मैदान फिरने जाता है । कऊनो खास...

"का जगेसर बाबू, किधर का तईयारी खींचे हैं महराज, आप तो अईसे सरसराते हुए भाग रहे हैं जईसे भोरे भोरे लोग सब मैदान फिरने जाता है । कऊनो खास बात का ?"
"दुर महराज, जतरा पहर टोकना जरूरी था का ? एतना मुस्किल से हमरा सपना पूरा होने जा रहा है अऊर आप हैं कि बिचे में टोक दिए । हमारा काम नहीं बना तो रात को खूब गरिएंगे आपको ।"
"अरे काम का है ई तो बताईए ।" 
"अरे सुने नहीं है का ? मोटर साईकिल पर बहुत बड़ा छूट मिल रहा है । केतना जमाना से सोच रहे थे कि बाबू जी का ई मोपेड बेच के नया दो चकवा लेंगे । आज जा के सपना पूरा होने वाला है । चलिए जाने दिजिए नहीं तो देर हो जाएगा । " 
"अरे महराज, सब सो रूम में खचाखच भीड़ है पिसा जाईएगा ।"
"आ दुर मरदे, हमको भीड़ खा जाएगा का अऊर दूसरा बात ई ऑफर के लिए तो हम साला दू महीना भीड़ में कुचाने को तैयार हैं ।"
"ठीक है महराज जईसा आपका मरजी । भगवान आपका मनोकामना पूरा करे ।" जगेसर बाबू अपने पिता जी की फटफटिया पर निकल लिए नया मोटर साईकिल लेने । 
सो रूम पहुंचे तो देखा कि भीड़ का तो समासूध नहीं है । हर कोई अकाल के कौआ की तरह मुंह बाए खड़ा है अपने नंबर के लिए । ई नजारा देख के लग रहा था जईसे आधा शहर बाप जनम कहिओ मोटर साईकिल आंखी देखा ही नहीं । जैसे सबको लग रहा हो अरे साला ई का अजूबा आ गया जो बिना पाईडिल मारे जलता है । माने कि पूरा रेलम पेल चल रहा था एक दम । जगेसर बाबू भी भीड़ से पिल गए । ऊ तो सोच के ही आए थे कि आज चाहे जो हो जाए मगर हम साला नया दू चकबा लेईए के जाएंगे । 
रात को जगेसर बाबू ढनमनाते हुए चले आ रहे थे कि रास्ते में सबेरे वाले पप्पन भईया मिल गए । जगेसर बाबू का ई हालत देख पप्पन भईया ने आश्चर्य से पूछा "अरे जगेसर बाबू आप तो नया दु चकबा लेने गए थे फिर ई गति कहाँ से करा आए । ऊपर से ई ठेहुना भी छिलाया है ।"
"अरे पप्पन का बताएं, साला भीड़ तो हमको कूच दिया । पहिले सो रूम में भीड़ से भिड़े और फिर ठेका पर ।"
"तो का मोटर साईकिल बुक हो गया ?" 
"अरे नहीं महराज, अच्छा चीज में टाईम लगता है । आज एतना भीड़ था कि पुछिए मत । उसी में गिर गए तो साला ठेहुनो फूट गया । अब थक गए थे तो सोचा थोड़ा मदिरा पान करें मगर ठेका पर भी भीड़ का समासूध नहीं था । मगर दारू तो हम किसी तरह लड़ झगड़ के ले ही लिए ।"
"अरे रे क्या हालत कर दिया है भीड़ आपका । अच्छा जगेसर बाबू इतना भीड़ था तो टी बी बला सब भी आया हो गा । आपका ठेहुना छिला गया औरों का भी नुक्सान हुआ होगा फिर कोनो टी बी वाला नहीं पूछा आपसे ई सब के बारे में । " 
" पगला गए हैं का सो रूम आ ठेका पर टी बी बला का करने आएगा जी ?" 
"काहे नहीं आएगा महराज, ए टी  एम के सामने तो आ जाता था । कोनो चक्कर खा के भी गिरता था तो उसका पूरा खबर सुनाता था फिर इहां पर काहे नहीं आया ? भीड़ तो ससुरा भीड़ है ना । अऊर हाँ तब आप भी तो भीड़ को केतना गरिआए थे, सरकार को केतना कोसे थे । मखर आज तो एतना कुटाने के बाद भी आपके माथा पर तनिको क्रोध नहीं है, ई काहे जगेसर बाबू ।"
"अरे ऊ तो नोट बंदी था ना इसलिए ।" 
"अच्छा मने देस का भला हो तो बवाल होगा गरिआया जाएगा अऊर एक ठो लालच बला ऑफर आगया तो उसमें ठेहुना फूटा भीड़ से रगड़ाए काम ना बना फिर भी कोनो बात नहीं । दारू के लिए लाईन लगे लड़े भिड़े तो वो अच्छा है बस बुरा था तो नोटबंदी ।"
"दुर महराज आप फालतू बात करते हैं जाने दिजिए हमको थक गए हैं ।"
"हाँ हाँ महराज जाइए ना हम कहाँ रोक रहे हैं । मगर एक बात कह दें आप जईसा लोक सब के चलते देस पिछड़ा है । लालच है ना जो वो देस की जनता के मन से जब तक नहीं जाएगा देस का भला संभब नहीं है महराज ।"
"आप अपना नेतागिरी अपने पासे रखिए जाने दिजिए हमको ।" पप्पन भईया मुस्कुराते हुए एक साईड हो गए । ये मुस्कुराहट सिर्फ जगेसर बाबू के लिए नहीं बल्की देश के उन सब लोगों के लिए थी जो भीड़ के चेहरे में भी भेदभाव कर लेते हैं । यहाँ दारू की लाईन, ऑफरों के लिए लगी लाईन जीयो के लिए लगी लाईन ये सब सही है गलत है तो नोटबंदी के दौर में ए टी एम के बाहर लगी लाईन । बुरी है को सरकार द्वारा लागू किसी योजना के लिए लगाई गई लाईन । 
धीरज झा

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क़िस्सों का कोना : ​भीड़ के अलग अलग चेहरे (संडे इस्पेसल)
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