क्यों चुप साध रहे बलवाना

​क्यों चुप साध रहे बलवाना  जैसा कि हम सब जानते हैं और कहीं ना कहीं मानते भी हैं कि देश इस समय इस दशक के सबसे बुरे दौर से गुज़र रहा है । गऊ र...

​क्यों चुप साध रहे बलवाना 
जैसा कि हम सब जानते हैं और कहीं ना कहीं मानते भी हैं कि देश इस समय इस दशक के सबसे बुरे दौर से गुज़र रहा है । गऊ रक्षा के लिए नए नए कानून बन रहे हैं वहीं दूसरी तरफ़ इंसानी लहू दिल्ली में बिक रहे पानी के गिलास से भी सस्ता हुआ जा रहा है । नए विकास के नाम पर प्रेमी युग्लों को पकड़ कर बेचारी प्रेमिका के सामने प्रेमी का पिछवाड़ा इस तरह तोड़ा जा रहा है जैसे रूई की धुनाई करने की कला सिखाई जा रही हो । मुंह पर केसरिया कपड़ा बांध कर घंटों रैलियों में घूम कर अबकी बार भाजपा सरकार का नारा लगाने वाला रोमियो अपने ही भाग्य को कोस रहा है कि किस मनहूस घड़ी में ऐसी बेरहम सरकार चुनने का निर्णय लिया जिसने अपने ही भलेंटियरों के प्रेम पर पहरा डाल दिया । खैर ये सब तो आए गए मुद्दे हैं इस पर साहब का बोलना सही भी नहीं है । 
मगर अभी बीते दिनों देश के हर कोने में हर दिन कोई ना कोई ऐसी घटना हो रही है जिससे जनता में सरकार के प्रति आक्रोश बढ़ता चला जा रहा है । अभी कुछ दिन पहले ही कश्मीर उपचुनावों में सैनिकों के साथ स्थानीय लोगों द्वारा इतना बुरा बर्ताव किया गया । वह सैनिक जिन्हें हम देश का गौरव कहते हैं राह चलते कुछ लंपट उनका मज़ाक उड़ा रहे हैं, उनके सर पर मार रहे हैं उन्हें लातों से मार रहे हैं और वो जवान बेबसी भरी मुस्कुराहट बिखेरता हुआ आगे बढ़ा जा रहा है । अगर प्रधानमंत्री जी ने वह विडियो देखा हो तो उन्हें उस जवान के चेहरे पर लोट रही बेबसी साफ़ तौर पर दिखाई दी होगी, जैसे वो उन्हीं से कह रहा हो कि प्रधानमंत्री जी अगर हमारे हाथ ना बंधे होते तो आज यहाँ का नज़ारा कुछ और होता । पिंजरे में बंद शेर अक़सर बच्चों के मनोरंजन का साधन बन जाता करता है । इतनी बड़ी बात पर उन साहब के मुंह से एक भी बोल ना फूटा जिन्हें साहब अपना परिवार मानते रहे जिनसे दीवाली मनाने खास तौर पर जाते रहे । ऐसा क्यों ?
उसके बाद वह किसान जिनकी दुहाई दे दे कर साहब ने जनता का मन और वोट दोनों मोह लिए वो किसान सड़कों पर नंगा लेट कर प्रदर्शन कर रहा है अपना ही मूत्र पीने का दावा कर रहा है, कई इलाकों में सूलियों पर लटक गया फिर भी साहब कुछ नहीं बोले ? समर्थक कह रहे हैं सब किसान नकली है, दिल्ली में नगर निगम का चुनाव होते भाग गए । अरे भक्तजनों मान लिया नकली हैं मैं खुद मान रहा हूँ नकली ही सही मगर क्ता देश के प्रधानमंत्री का दायित्व नहीं बनता कि उनसे पूछा जाए कि "क्यों भाई काहे का हल्ला मचाए हो । क्या तकलीफ़ है तुम्हे ?" तमिलनाडू की जनता में इस मुद्दे को ले कर काफ़ी आक्रोश है, जलूस निकाले जा रहे हैं मगर साहब इस पर भी मौन साधे हुए हैं । 
ये सब तो ठीक है मगर हद तो तब हो गई जब कल सी आर पी एफ़ के 24 जवान सुकमा में नक्सली हमले के दौरान शहीद हो गए । पूरा देश शोक में डूबा है । हर तरफ से सवाल पूछे जा रहे हैं मगर साहब की तरफ से एक भी जवाब नहीं आया । दुःख की इस घड़ी में क्या प्रधानमंत्री एक शोक संदेश भी नहीं दे सकते । क्या देश के वीर जवानों और उनके परिवार का साहब की संवेदना पर भी हक़ नहीं रहा । इन्हीं जवानों की शहादत पर चुनाव से पहले साहब ने कहा था ना कि लव लैटर लिखने से काम नहीं चलेगा मगर अब क्या हो गया ? आपसे तो हमें उमीदें ही बहुत थीं । आपको तो हमने 2024 तक के लिए फिक्स कर दिया था मगर आप तो तीन साल में ही थके से लग रहे हैं । ये भक्तजन भी कितनी बचाव करेंगे आपका, कितने कुतर्क देंगे आपकी खामोशी पर ? तब क्ता होगा जब इनके पास बहस के लिए कुछ भी नहीं बचेगा । 
साहब की इस तरह की चुपी से तो ये भय लगता है कि कहीं इन्हें नज़रबंद तो नहीं कर दिया गया । कहीं बाकी के पार्टी मैंबरों को मोदी की साफ़गोई से डर तो नहीं लगने लगा, हर जगह जा कर बड़े बोल बोलना कहीं अपनों को ही खटक तो नहीं गया । भई राजनीति है कुछ भी संभव है, नज़रबंद कर देना भी । 
बाकि हम तो प्रधानमंत्री जी से यही कहेंगे कि
"क्यों चुप साध रहे बलवाना ?"
हे भक्तों के नाथ, हे सर्जिकल स्ट्राईकर, हे कांग्रेस भक्षक , हे गऊओं के रक्षक आप किस चीर नींद्रा में विलीन हैं कृप्या त्राहि त्राहि पुकार रही प्रजा की सुध लें । देश में इतना कुरखांड मचा है और आप सिंघम से चार्ली चेपलिन हुए जा रहे हैं । मगर अब मौन मत बनों मोहन अब तो समय है सिंह सा दहाड़ने का । ना सच तो कम से कम मन को संतोष दे ऐसा कोई झूठ ही बोल दो महामहीम । अब ना सहा जाए हो बलम जी मुंह से कुछो त कहा हो बलम जी ।
धीरज झा

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क़िस्सों का कोना : क्यों चुप साध रहे बलवाना
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