#बात_ललका_गुलाब_की

​ आखिर आज "ललका गुलाब" (शाॅट फिल्म) आखर यूट्यूब चैनल पर रिजीज़ हो ही गई । फिल्म कैसी है ये इसके बारे में बाद में बात की जाएगी उससे...


आखिर आज "ललका गुलाब" (शाॅट फिल्म) आखर यूट्यूब चैनल पर रिजीज़ हो ही गई । फिल्म कैसी है ये इसके बारे में बाद में बात की जाएगी उससे पहले कुछ अपनी बात कर लूं । मेरे बाबा पिछले साल इन्हीं दिनों में हमें छोड़ कर चले गए । उनके जाने से पहले चार महीने तक उन्होंने क्या भोगा या उनके बदलते स्वभाव के कारण हम सब पर क्या बीती इन सब बातों के लिए तो अलग से एक उपन्यास लिखा जाएगा । अभी बस एक छोटा सा किस्सा शेयर कर रहा हूं जो इस फिल्म को देखते हुए दिल से दिमाग और दिमाग से दिल में लोट रहा था । 
मेरे बाबा स्व. श्री देवनारायण झा हमेशा से नियमों के बड़े पक्के रहे । जब से मैं कुछ समझने की उम्र में आया तब से उन्हें एक ही समय पर उठते एक ही समय पर चाय पीते एक ही समय पर नहाते पूजा करते और खाना खाते देखा । मौसम भले बदलते रहते मगर उनके नियम कभी नहीं बदले उन दिनों को छोड़ कर जब कभी वो ज़्यादा बिमार हो जाया करते । हाँ खैईनी खाने के लिए उनका कोई नियम नहीं था जब मन करता तब खाते कई बार  आधा नींद लेने के बाद रात एक बजे भी खाते । खैर वो कब खईनी खाते थे कब नहीं इससे हमें कोई मतलब नसीं होना चाहिए वैसे भी उनको इसके लिए टोका टोकी पसंद नहीं थी ।
मैं जो किस्सा बताने जा रहा हूं जो मुझे ललका गुलाब देखने के बाद याद आया वह तब का है जब बाबा पर बढ़ती उम्र का असर धीरे धीरे चढ़ने लगा था । तब मैं पटना में था । अचानक से चाचा जी का फोन आया की घर आ जाओ बाबा बीमार हैं मिलना चाहते हैं । हालत नाज़ुक सी ही लग रही है । मैंने खबर सुनते ही गाँव का रुख कर लिया वहाँ पहुंचा तो देखा बाबा आराम से बैठे हैं और मुझे देखते ही कहने लगे "आ गईला बाबू, अब हम जाई छिओ, भगवान आएल रहलन सपना में, आ हमारा से कहलन कि आई रात में तोहरा के ले जबओ।" मतलब उनके दिमाग में ये बैठ गया था कि आज भगवान मुझे अपने साथ ले जाएंगे और मैं सबको छोड़ चला जाऊंगा । अपने सारे कपड़े समेट लिए उन्होंने । जो नए थे उन्हें घर पर दे कर कह दिया कि इन्हें संभाल कर रख देना मैं अगर अगले जनम भूला भटका आऊं तो मुझे दे देना । दोनो बूआ लोग को भी बुला लिया गया । हल्की ठंड पड़ रही थी उस मौसम में भी शाम को नहा कर पलथी मार कर हाथ में गीता ले कर बैठ गए और लगे किस्से कहानियां सुना कर "नारायण नारायण" करने । मतलब माहौल कुछ ऐसा हो गया था कि मुझे कुछ समय के लिए लगने लगा कि बाबा सही कह रहे हैं उन्हें शायद पता लग गया हो । 
खैर ऐसा कुछ हुआ नहीं शायद मृत्यु ने अपना मन बदल लिया हो । बाबा ने बारह एक बजे तक इंतज़ार किया मगर फिर थक कर सो गए । अगली सुबह उन्होंने इस बारे में कोई बात नहीं की । हमने भी इस बात को दोहराना या इस पर मज़ाक में कुछ कहना सही नहीं समझा । उसके बाद से बाबा की तबीयत धीरे धीरे बिगड़ने लगी और दो साल बाद वो चले गए । आज ललका गुलाब में उस बाबा को देखा तो कुछ ऐसा ही याद आगया । 
भोजपुरी फिल्में मुझे कभी से पसंद नही रहीं एक आध पुरानी वाली जो हैं उन्हें छोड़ कर । बुरा ना मानिएगा मगर आज के समय में भोजपुरी सिनेमा एक तरह की गाली बन गया है । किसी का मज़ाक उड़ाना हो तो खट से कह देते हैं भोजपुरी फिल्म के हीरो जैसा लग रहा है । आज भोजपुरी फिल्म मतलब अश्लीलता, फूहड़ गाने, कान फाड़ देने वाला सी ग्रेड संगीत, एक बेकार सी स्टोरी, एक ओवरऐक्टिंग करने वाला हीरो और एक कम कपड़ों वाली हिरोईन । यूपी बिहार का जलूस निकालने में सबसे बड़ा हाथ है इन्हीं फिल्मों का । 
ये मैं नहीं कहता ये लोग कहते हैं । अगर आप भी ऐसा कहते हैं तो फिर एक बार "ललका गुलाब" देखिए । 15 मिनट की ये फिल्म भोजपुरी फिल्मों के लिए जो खराब छवि आपके मन में हमेशा से बनी है उसे मिटा देगी और साथ में आप देखेंगे भोजपुरी सिनेमा के नए साफ़ सुथरे दौर का आरंभ । Amit Mishr सर की यह फिल्म भोजपुरी सिनेमा को लेकर आपका नज़रिया बदल देगी । फिल्म के शुरुआत में बजने वाला निरगुण को सुनना अपनी आत्मा की छुअन को महसूस करने जैसा है । हर किरदार की अदाकारी आज के भोजपुरी सिनेमा के किसी भी सूपरस्टार कहे जाने वाले हीरो से लाख गुने बेहतर । थोड़े में कहूं तो भोजपुरी सिनेमा के हित में बदलाव लाने की यह शानदार शुरुआत है । 
इस बेहतरीन शाॅट फिल्म के लिए अमित सर, ललका गुलाब के सभी कलाकारों, आखर की पूरी टीम, फिल्म के लेखक और भोजपुरी से लगाव रखने वाले सभी दोस्तों को बहुत बहुत बधाई और शुभकाभनाएं । 
आप सब यू ट्यूब पर यह फिल्म ज़रूर देखें इसे लाईक करें और डाऊनलोड ना कर के यूट्यूब पर अपने दोस्तों को देखने के लिए कहें । निराश नहीं होंगे विश्वास कीजिए । और आखिर में एक बात यह फिल्म वो हर इंसान को देखनी चाहिए जिसे अपनी मातृभाषा से प्यार है भले ही वो भोजपुरी समझता हो या ना हो । 
अश्लीलता के बोझ तले दबते आज के भोजपुरी सिनेमा के लिए संजीवनी है यह फिल्म इसलिए अपना पूरा सहयोग करें ।
धीरज झा

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