और फिर मनीशंकर भाग गया

​संडे स्पैशल  और फिर मनीशंकर भाग गया (एक कहानी युवाओं की) यह है गजाधर का कच्चा मकान जिसकी खपड़ैल है । पहले जब गजाधर दो वक्त की रोटी बड़ी मुश्क...

​संडे स्पैशल 
और फिर मनीशंकर भाग गया (एक कहानी युवाओं की)
यह है गजाधर का कच्चा मकान जिसकी खपड़ैल है । पहले जब गजाधर दो वक्त की रोटी बड़ी मुश्किल से जुगाड़ पाता था तब इसके मकान की छत फूस की थी मगर जब गजाधर के छः बच्चों में सबसे बड़ा हरिभजन जिसकी उम्र इस चईत में पूरे सोलह की हो गई है जब से कमाने अंबाला गया उसके एक दो बरस बाद गजाधर ने फूस की छत बदलवा कर खपड़ैल छत डलवा ली । हरिभजन ने एक जिम्मेदार बेटे की तरह कहा है कि किसी तरह दो तीन बरसातें काट ले फिर वह एक लिंटर की छत वाला कमरा बनवा देगा और कुछ वर्षों में वह इसी तरह तीन चार कमरों का एक मकान तैयार करवा देगा । नई जवानी का जोश बड़ा घातक होता है किस तरफ कि रुख लेले कोई पता नहीं । आने वाले कल की नींव इस नई जवानी के जोश पर ही खड़ी होती है, अब इसका रुख सही दिशा में हो तो आने वाला कल महल की तरह जगमगाता है और रुख कहीं गलत दिशा की तरफ हुआ तो फिर आने वाला कल अंधेरे से घिरा ही मानिए । खैर हमको ना गजाधर से कुछ लेना देना है ना उसके बेटे हरिभजन से । अपने हाल को ये खुद समझें हम रुख करते हैं अपनी कहानी का । 
तो गजाधर के घर को गाँव का आखरी मकान माना जा सकता है क्योंकि उसके  आगे एक आधा खलिहान मिल जाएगा जहाँ एक मड़ई होगी एक आधा लोग होंगे और माल जाल होगा बाकि अब मकान नसीं दिखेगा यहाँ से । गजाधर जिसका इस कहानी से कोई लेना देना नहीं उसके घर से कोई पाँच सौ कदम गिन के एक तालाब है जिसका पानी इस साल हुई कम बारिश के कारण कुपोषित और कमज़ोर सा हो गया है, वो उछाल वो शितलता वो मिठास और वो सुंदरता अब रही नहीं इस तालाब में । कम शब्दों में कहें तो बस आखरी सांसे ले रहा है तालाब क्योंकि सरकार ने इसे भरने का ऑर्डर पास किया है कहते हैं मेन सड़क निकलेगी यहाँ से जो नेपाल तक जाएगी । खैर हमको इस सूखते तालाब हे भी कुछ लेना देना नहीं है वैसे भी हमारे घर अब चंपाकल गड़ा हुआ है । 
तालाब के ठीक सामने गाँव के इतिहास की कहानी सुनाता बरगद का वो बूढ़ा पेड़ जो इस उम्र में भी हवा की लहरों के साथ नैन मटका करता हुआ मदमस्त खड़ा है उसके ठीक नीचे बैठी है हमारी कहानी । श्यामा पंडित का इकलौता लड़का मनीशंकर जो पूरे गाँव में सबसे ज़्यादा पढ़ा है । अभी चार साल पहिले पंद्रहवीं पास की है लड़के ने । अम्मा कुछ साल पहले गुज़र गई अब घर में वो उसके पिता और बेल की तरह बढ़ती जा रहीं दो बहने हैं ।  अभी गाँव के एक सेठ के यहाँ हिसाब किताब देखने का काम करता है । दरमाहा भी ठीकठाक है थोड़ा बहुत कुछ ऊपर से बना ही लेता है । कुछ महीनों में मनीशंकर की शादी होने वाली है । रिश्ता पक्का हो चुका है लड़की सुशील सज्जन और गुणी है लड़की का रूप भी मनी शंकर के मन को भा गया है । मतलब मिलाजुला कर ज़िंदगी की गाड़ी जो भले ही धीमी हो मगर पटरी पर चल रही है । 
पर सवाल ये है कि जब सब सही है तो मनीशंकर यहाँ तलाब के पास बूढ़े बरगद के नीचे क्यों बैठा है ? अरे वो क्यों बैठा है भला आपको कैसे पता होगा कहानीकार तो मैं हूं मैं बताऊंगा तभी आपको पता लगेगा । हाँ तो वो इसलिए यहाँ बैठा है क्योंकि वो युवा है और पढ़ा लिखा भी । और आप तो जानते ही हैं कि इंसान अनपढ़ हो तो बैल समान होता है, समय और परिस्थितियाँ उसे जिधर मन उधर जोत दे वो बस काम करता है बिना सोचे 

 जैसे कि गजाधर का बेटा हरिभजन जो चौदह की उम्र में अपने गाँव घर और परिवार से दूर कमाने चला गया बिना कुछ सोचे । मगर दूसरी तरफ जो युवा पढ़ा लिखा है वो अपनी समझदारी में ही उलझ जाता है । मनीशंकर का मन पढ़ाई पूरी करने के बाद से ही विचलित है । उसका मन बार बार उसको उकसाता है कि वो सब छोड़ छाड़ कर वहाँ चला जाए जहाँ उसे कोई ना जानता हो । जहाँ उसे कोई बुरा भला कहने वाला ना हो । यह बात उसने अपने पिता से पहले भी कही है मगर एक तो इकलौते बेटे को वैसे ही कोई पिता अपनी आंखों से ओझल नहीं करना चाहता दूसरा श्यामा पंडित थोड़े सनकी किस्म के थे भी । जब जब मनीशंकर ने बाहर जाने का जिक्र किया पिता ने या तो चार गालियों भरे श्लोक सुना दिए या फिर रोने लगे । पिता को ऐसे देख मनीशंकर फिर कभी उनसे बाहर जाने की चर्चा ही नहीं की । 
मगर जो एक बार मन में आगया उसे जब तक पूरा ना करें मन शांत हो कहाँ पाता है । मनीशंकर का मन भी शांत नहीं रहता था । वो किसी से अपनी व्यथा कह भी नहीं सकता था बस मन ही मन घुटता रहता । अब तो उसकी शादी भी होने वाली थी सब कुछ ठीक ठाक था फिर ना जाने यह बेचैनी क्यों थी उसे । शायद वो अपनी ज़िमेदारियों से डर रहा था । भले ही वो इस बात को ना माने मगर असल वजह यही थी । 
मनीशंकर वास्तविक दुनिया से मीलों दूर अपनी बेचैन सी दुनिया में खोया हुआ था कि इतने में साईकिल की घंटी का शोर कानों में पड़ा जिसने उसे उसकी दुनिया से एकाएक ही वास्तविक दुनिया में ढड़ाम से ला पटका । सामने देखा तो घना अंधेरा था । शाम से रात कब हो गई मनीशंकर जान ही नहीं पाया । घंटी बजाने वाला कौन है यह जानने के लिए मनीशंकर ने जब सामने वाले को ज़रा गौर से देखने की कोशिश की तो अंधेरे में चमकती दो बड़ी आँखें देख कर समझ गया कि यह यम के छोटे भाई अर्थात उसके पिता जी हैं । अपनी आदत अनुसार चार गालियां सुनाते हुए वह मनीशंकर को घर ले गए । मनीशंकर ने अनमने मन से खाना खाया और जा कर अपने कमरे में लेट गया और लेटे लेटे इधर उधर का सोचते हुए उसे नींद आगई ।
रात के तीसरे पहर में जब पड़ोस के कुत्ते झबरू ने रोज़ की तरह रोना शुरू किया तब अचानक से मनीशंकर की आँख खुली । मन ऐसे बेचैन हो रहा था जैसे यहाँ एक पल भी और रहा तो उसकी सांस रुक जाएगी । वह बेचैनी में एकाएक उठा और एक झोले में अपने कुछ कपड़े डाल कर चुपके से घर का केवाड़ खोल कर निकर पड़ा । गाँव से निकलते ही उसे ऐसा लगा कि जैसे उसने वर्षों एक बंद में गुज़ारने के बाद आज खुली हवा में कदम रखा हो, जैसे किसी लोहे को दिन भर आग में तपाने के बाद उसे ठन्डे पानी में डुबोया गया हो । यही सुकून तो वो ढूंढ रहा था । आह ये आज़ादी कितनी सुखद थी । अब वो किसी ऐसी जगह जाने वाला था जहाँ उसे कोई जानने वाला ना हो । 
कुछ समय भटकने के बाद वो एक ऐसी जगह पहुंच गया जहाँ एक नदी थी जो पतली सी धार के रूप में बलखाती हुई बहती चली जा रही थी । उसे के किनारे छोटी सी एक मड़ई थी जिसकी छत मंदिर से गुंबद जैसी थी वहाँ आसमान हमेशा इस तरह गुलाबी रहता था कई बार बादलों से घिरी शाम में सूरज ढलने के सम हो जाया करता है । थके शरीर को एक पल में अपनी सहलाहट से आराम पहुंचा देने वाली हवा निरंतर बहती रहती थी वहाँ । यहाँ के दृश्य को एक शब्द में कहा जाए तो 'स्वर्ग' कह सकते हैं । यही वो जगह थी जिसकी कल्पना मनीशंकर हमेशा करता था । कुछ वक्त तक मनीशंकर बहुत खुश रहा मगर फिर अचानक धीरे धीरे उसका मन यहाँ से भी उबने लगा । उसके मन मस्तिष्क में उसके पिता जी और दोनों बहनों के ख़याल घूमने लगे । देखते देखते पाँच साल ऐसे बीत गए थे जैसे वह सपना देख रहा हो । उसका मन व्याकुल होने लगा । इतना व्याकुल कि उसने वापिस घर लौटने का फैसला कर लिया ।
जब वह घर पहुंचा तो उसने देखा कि उसका घर खंडहर समान हो गया है । घर में घुसते ही उसने देखा की उसके पिता का मृतक शरीर वहाँ पड़ा हुआ है जो अब पिंजर का रूप ले चुका था । शायद उसके मुखाग्नि ना देने की वजह से उसके पिता के देह को जलाया नहीं गया था । उसकी बहने जिनका कुछ वर्षों में विवाह हो जाना चाहिए था वह दूसरों के घरों में नौकरानी के रूप में काम कर के अपना पेट पाल रही थीं । उसे किसी ने बताया कि उसके पिता उसके अचानक से चले जाने के वियोग को सहन ना कर पाए और इसी शोक में चल बसे । यह सब सुन और देख कर मनीशंकर पागलों की तरह रोने लगा । वो खुद को कोसने लगा । उसका खुद को कोसना जायज भी था । वह अपने ऐसे सपने के लिए अपनी ज़िम्मेदारियों से मुंह मोड़ कर भागा था जिसके बारे में वह जानता भी नहीं था । उसे आभास होने लगा कि उसका इस तरह से भागने का उदेश्य अपने सपने को पूरा करना नहीं बल्कि अपनी ज़िम्मेदारियों से डर कर भाग जाना था, जिसे मनीशंकर समझ ही नहीं पाया । 
मनीशंकर पागलों की तरह चिल्लाने लगा "पिता जी मुझसे गलती हो गई पिता जी आप लौट आईए पिता जी मैं आपसे और अपनी ज़िम्मेदारियों से दूर भाग करकभी नहीं जाऊंगा ।" मनीशंकर पसीने से तर बतर यही सब बड़बड़ा रहा था इतने में उसने सर पर एक जानी पहचानी सहलाहट महसूस की । मनीशंकर ने फट से आँखें खोल दी, देखा तो पिता जी सिरहाने बैठे थे और बहने पंखा डोला रही थी । आँख खोलते मनीशंकर ने यह जान कर चैन की सांस ली कि यह सब एक भयावह सपना था । उसने उठ कर सिरहाने बैठे पिता के पैर पकड़ लिए और बोला "पिता जी मैं जान गया हूं मेरी दुनिया मेरा परिवार ही है और इस परिवार के सभी दायित्व का निर्वाह ही मेरा सबसे बड़ा कर्म है जिनका निर्वाह मैं हमेशा अपनी निष्ठा और खुश मन से करूंगा ।" 
श्यामा पंडित ने एक अनुभवी मुस्कान ऐसे बिखेरी जैसे सारा माजरा वो बिना सुने ही समझ गए हों और वो वास्तव में समझ गए थे क्योंकि वह पिता थे और पिता वर्षों पहले एक बेटे होने का अनुभव प्राप्त कर चुका होता है । 
इस घटना के बाद से मनीशंकर के ज़िंदगी जीने का नज़रिया एक दम से बदल गया । वह अपना हर काम खुशी खुशी करने लगा, परिवार को समय देने लगा । कुछ दिनों में उसकी शादी हो गई और वह खुशी खुशी परिवार के साथ जीवन बिताने लगा । अब वो अपने दायित्वों के निर्वाह से बिल्कुल नहीं डरता था और ना ही कहीं भाग जाने के बारे में सोचता था । कुल मिला कर वह अपनी उलझनों से बाहर निकल चुका था । 
धीरज झा

COMMENTS

Name

अन्य रचनाएँ,1,अलविदा,5,इश्क़ वाली कहानियां,14,कल्पनाएं,1,कविता,112,कहानियों का कोना,30,कहानी,121,किश्तों वाली कहानियाँ,5,किस्से गाँव के,14,ख़ास लोग,2,खुशियाँ,39,ख़्वाहिशें,2,गज़ल,31,चलते फिरते बस यूं ही,2,चिट्ठियाँ,22,जय जवान,11,तड़प मेरी तुम्हारे लिए,72,दु:ख,16,दुख,45,नमन,3,पापा के लिये,26,पुराने किस्से,3,प्रतिभा की दुनिया,2,फिल्म समीक्षा,3,बस यूं ही,27,बातें काम कीं,59,माँ,18,युवाओं की बात,1,रात के किस्से,6,लघु कहानी,8,लेख,149,वैश्विक,1,व्यंग,35,शायरी,30,सिनेमा,1,सिर्फ तुम्हारे लिये,63,हास्य कथा,1,
ltr
item
क़िस्सों का कोना : और फिर मनीशंकर भाग गया
और फिर मनीशंकर भाग गया
क़िस्सों का कोना
http://www.qissonkakona.com/2017/04/blog-post_30.html
http://www.qissonkakona.com/
http://www.qissonkakona.com/
http://www.qissonkakona.com/2017/04/blog-post_30.html
true
3081115015472439889
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS CONTENT IS PREMIUM Please share to unlock Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy