उसने सुना "आप सब को मजबूर दिवस मुबारक हो" (मजबूर की कहानी )

​उसने सुना "आप सब को मजबूर दिवस मुबारक हो"  (मजबूर की कहानी ) मलिकचंद की सारी कोठियों और कारखानों पर रंगाई का काम चल रहा था । वैसे...

​उसने सुना "आप सब को मजबूर दिवस मुबारक हो" 

(मजबूर की कहानी )
मलिकचंद की सारी कोठियों और कारखानों पर रंगाई का काम चल रहा था । वैसे तो इसी दिवाली पर हर जगह नया रंग करवाया गया था मगर वो रंग विदेश से लौटे उनके बेटे को खास पसंद नहीं आए । अब मध्यम वर्गीय परिवार की बात होती तो बाप दो तफाड़े जड़ कर कहता "ससुरा काम धंधा करता नहीं, सारा दिन आवारागर्दी में बिताएगा और रंग रोगन इनको अपनी पसंद का चाहिए । तीन साल से दोबारा रंग कराने का सोचते सोचते इस साल रंगा सके हैं घर को और ये लाट साहेब कहते हैं इन्हें पसंद नहीं आया । हम मुखिआ हैं घर के जो कहेंगे करना पड़ेगा नहीं मंजूर तो खिसको यहाँ से ।" 
मगर ये कोई मध्यवर्गीय आदमी नहीं बल्कि एम एल ए और कपड़ा व्यापारी मलिकचंद हैं जिनका लौंडा सारी उम्र ना कमाए तो भी मजे से बैठ कर खाएगा फिर भला काहे की चिंता । बेटे को नहीं पसंद तो रंग बदलवा दो । ससुर ऐतना पईसा जमा किए हैं कहीं तो लगना चाहिए । काम जल्दी ख़त्म करना है इसीलिए सारे मजदूर लगे हुए थे काम में । एक तो सूरज बाबा का बरसता क्रोध ऊपर से लंगड़ू ठेकेदार का जल्दी काम खत्म करने का हर पल बढ़ता दबाव । मजदूर बेचारे परेशान एकदम, मगर परेशान हो कर भी क्या बिगाड़ लेंगे भला । किसी हाल में  काम तो करना ही है, जो परिवार वाले हैं उन्हें रात की रोटी के लिए, जो लौंडा शौंडा हैं उन्हें दारू और बोटी के लिए, किसी को घर पैसे भेजने के लिए, किसी को उधारी चुकाने के लिए । 
मगर इन सब में 'पूरन' का हाल सबसे बुरा है उसे रोटी, बोटी, पैसे घर भेजने, उधारी चुकाने, से भी ज़्यादा चिंता अपनी बीवी की है । चार दिन से बेचारी का बदन इतना तप रहा है जैसे घर का बुझा चुल्हा उसके अंदर ही जल रहा हो । रोज़ की देहाड़ी से तो दवा बड़ी मुश्किल से आती है बाकि जो कुछ पैसे बचते हैं उसमें पूरन एक दूध का पैकेट और ब्रेड खरीद लेता है, बेलग़ाम भूख को काबू करने के लिए । ये भूख भी बड़ी ज़ालिम है साहब किसी की जेब का हाल देख कर इसका मन नहीं पिघलता, ये तो मृत्यु से बड़ा सत्य है मृत्यु कब आएगी पता नहीं, मगर ये कमबख़्त तो दीन में कम से कम एक बार तो आ ही जाएगी । 
"ऐ पूरनमा जल्दी जल्दी हाथ चलाओ नहीं तो पईसा काट लेंगे फिर चिल्लाते रहना बाप बाप चिल्लाते । साले हरामखोर, बस मुफत का रोटी तोड़ना जानते हैं ।" पसीने की गिरती बूंदों से धरती की प्यास बुझा रहे पूरन को पंखे में बैठे लंगड़ू ठेकेदार ने बेवजह टोका । बिना कुछ सोचे पूरन का हाथ दुगनी तेजी से चलने लगा। उसे सामने पीले रंग की पुट्टी में अपनी बीवी की पीली पड़ती जा रहीं आँखें ही दिख रही थीं जिसने उसकी आँखों को लाल कर दिया था । 
पूरन ने सोचा था कि आज वो लंगड़ू ठेकेदार से देहाड़ी के अलावा कुछ पैसे और उधार मांगेगा और आज राशन वाले का पिछला उधार चुका कर कुछ राशन ले लेगा और फिर दो दिन से हलशे के लिए ज़िद्द कर रही अपनी बेटी को हलवा बना कर खिलाएगा । साथ ही साथ बीवी के लिए अन्र का रस ले जाएगा । उसने किसी से सुना था कि अनार के रस से खून बढ़ता है और ताक़त आती है । यही सब सोच कर काम ख़त्म होने के बाद लंगड़ू से कहा "लंगड़ू भाई मेरी बीवी बहुत बिमार है उसकी दवा के बाद हाथ में कुछ बचता नहीं चार दिन से घर का चुल्हा नहीं जला । आज कुछ रुपए उधार दे दो मैं लौटा दूंगा ।" 
लंगड़ू दिल का उतना भी बुरा नहीं था मगर हाँ पैसे के मामले में वो बहुत बुरा था फिर भी उसने पचास रुपए पूरन को यह कर दे दिए कि "पूरन मैं तेरा दुःख समझता हूं मगर हमारा भी हाथ साला खाली है सेठ पईसा नहीं दे रहा है टाईम से । ऊपर से कहता है कि 'चुनाव सर पर हैं सारा लेनदेन चुनाव के बाद होगा । मजदूर थोड़े दिन दिहाड़ी नहीं लेंगे तो मर नहीं जाएंगे । कहो उनसे दम धरें ।' मैं इतना कर सकता हूं कि अपनी जेब से तुमको पचास रुपए दे देता हूं ।" पूरन ने मन ही मन सोचा उसकी बीवी बहादुर है एक दिन और कमजोरी झेल लेगी मगर बिटिया एक दिन और दूध ब्रेड खा कर भूख को बहला नहीं पाएगी इसीलिए उसने दवाई से बचे पैसों में पचास रुपए मिला कर राशन लेने का मन बना लिया ।
मेरा बस चले तो देश का वित्त मंत्री किसी गरीब को बना दूं । आर्थिक तंगी को झेल कर एक एक पैसा सही जगह पर लगाने का बखूबी हुनर होता है इनमें । यकीन मानिए ऐसा होते ही बाकि कुछ हो ना हो मगर देश का एक बड़ा।हिस्सा भूख से चल रही जंग में ज़रूर विजय प्राप्त कर लेगा । 
अपने भारी कदमों को घसीटता हुआ पूरन अपने घर की तरफ बढ़ रहा था । त्रास्दि के दौर में इंसान को उसकी बदहाल हालत से ज़्यादा औरों की खुशहाल हालत कष्ट पहुंचाती है । पूरन को अभी अच्छी साड़ियों में सजी औरतों को देख कर बीवी के लिए दुख हो रहा था अअछे कपड़ों में चहकता खेलते कूदते बच्चे उसे अपनी भूख से बिलखती बेटी का ख़याल आ रहा था । पूरन इतना दुःखी हो चुका था कि उसे बाहर का कुछ सुनाई या दिकाई नहीं दे रहा था सिवाए अपने घर की तरफ रास्ते के । उसके घर के कुछ कदम पहले खाली पड़े मैदान में काफ़ी भीड़ थी जिसमें ज़्यादातर लोग बड़ी गाड़ियों वाले थे । मगर ये भीड़ कैसी थी ये प्रोगराम क्या था इससे पूरन को कोई मतलब नहीं था । पूरन बस आगे बढ़ता जा रहा था । 
रास्ते में दिखी भीड़ को तो तो उसने नज़र अंदाज़ कर दिया था मगर अपने  घर के बाहर लगी भीड़ को नज़र अंदाज़ ना कर पाया । घर पर खड़ी भीड़ शांत थी एक दम शांत । पूरन कुछ समझ नहीं पाया मगर फिर भी उसके भारी पैरों और थके हुए शरीर में तेजी सी आ गई । वो भागता हुआ घर की तरफ बढ़ा । उसे देखते ही भीड़ ने बिना कहे ही रास्ता दे दिया जैसे सबको उसका ही इंतज़ार हो । 
वहाँ पहुंच कर उसने देखा उसकी बीवी जिसे वो मजबूत समझता था वो हार गई थी । मौत से ज़्यादा देर लड़ नहीं पाई । जिस गरीबी की आग से उसका बदन तप रहा था शायद उस आग ने उसे अंदर तक झुलसा दिया था । जिसका दर्द वो सह नहीं पाई । ग़रीब मजबूत होता है मगर परिस्थियां हद कर देती हैं । कोई कितना भी बड़ा वीर हो भला कब तक लड़ सकता है वो भी तब जब ग़रीबी भूख बिमारी जैसे दुशमन चारों तरफ से एक साथ हमला कर रहे हों । 
पूरन जब तक खुद को संभालता तब तक उसके कानों में लाऊडस्पीकर की आवाज़ पड़ी "मेरे प्यारे भाईयों हम मज़दूर के हक़ के लिए वर्षों से लड़ते आ रहे हैं । हर मज़दूर भाई हमारा अपना है उसकी मदद को हम हमेशा तैयार हैं । इस बार के चुनाव में हमें वोट दे कर जिताएं, हम वादा करते हैं कि यहाँ कोई मज़दूर भाई भूखा नहीं सोएगा । आज मज़दूर दिवस के खास मौके पर मैं मलिकचंद अपनी और अपनी पार्टी की तरफ से आप सभी मजदूर भाईयों को बहुत बहुत बधाई देता हूं । आप सब को मजदूर दिवस मुबारक हो ।" 
यह आवाज़ शायद उसी जगह से आ रही थी जहाँ बड़ी गाड़ियों से आए लोग जमा थे । ना जाने पूरन ने ये क्यों सुना जैसे कहा जा रहा हो सभी मजबूर भाईयों को मजबूर दिवस मुबारक हो । इन सब बातों से अंजान पूरन की बेटी ने पिता के हाथ से झोला ले लिया और उसमे से ब्रेड का पैकेट फाड़ कर खाने लगी । शायद उसके लिए सब बातों से बड़ी उसकी भूख थी । 

धीरज झा

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क़िस्सों का कोना : उसने सुना "आप सब को मजबूर दिवस मुबारक हो" (मजबूर की कहानी )
उसने सुना "आप सब को मजबूर दिवस मुबारक हो" (मजबूर की कहानी )
क़िस्सों का कोना
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