​#इन_दिनों_को_आम_दिनों_जैसा_ही_रहने_दो

​#इन_दिनों_को_आम_दिनों_जैसा_ही_रहने_दो सुमित की नींद के बोझ से दबी पलकें धीरे धीरे खुलीं और घड़ी को देखते ही पलकों पर पसरा नींद का बोझ हड़बड़ाह...

​#इन_दिनों_को_आम_दिनों_जैसा_ही_रहने_दो
सुमित की नींद के बोझ से दबी पलकें धीरे धीरे खुलीं और घड़ी को देखते ही पलकों पर पसरा नींद का बोझ हड़बड़ाहट में बदल गया । 
"बाप रे साढ़े नौ हो गए, यार मुझे सवा दस तक ऑफिस पहुंचना था । जाना तुम्हे कहा था यार जल्दी जगा देना । आज लेट हुआ तो बाॅस बहुत सुनाएगा ।" उठ कर बाथरूम की तरफ़ जाते जाते सुमित ने अपनी नाराज़गी सौम्या के सामने ज़ाहिर की । मगर सौम्या इन सब से अंजान चेहरे पर बेचैनी लिए करवट बदले जा रही थी । 
"कमाल है अभी तक नहीं उठी तुम ? और ना ही तुम पर मेरी बात का कोई असर है ।" सौम्या को अभी तक सोया देख सुमित की नाराज़गी और बढ़ गई । 
"आई एम साॅरी सुमित । रात से ही पेट दर्द हो रहा है सारी रात सो नहीं पाई । अभी कुछ देर पहले ही जा कर आँख लगी थी इसीलिए तुम्हें जगा भी ना पाई ।" सौम्या ने उठने की कोशिश करते हुए हड़बड़ी में तैयार हो रहे सुमित से कहा । 
"पीरियडस शुरू हैं क्या ?" 
"हाँ ।" 
"हम्म्म्म्म । चलो तुम आराम करो मैं नाशता बाहर ही कर लूंगा ।" वैसे सुमित सौम्या से बहुत प्यार करता था, उसका बहुत ख़याल भी रखता मगर इन दिनों जब सौम्या को उसकी ज़रूरत होती तो वह रूखा सा हो जाता । जैसे उसे ये पसंद ही ना हो । इधर सौम्या भी अपनी चिड़चिड़ाहट को दबाने के लिए चुप चाप ही रहती । इन दिनों सौम्या के व्यवहार का बदल जाना ही सुमित को और रूखा बना देता था । खैर एक साल में दोनों को इन गीले दिनों के रूखेपन की आदत हो गई थी ।
सौम्या सारा दिन दर्द को झेलती हुई अपने काम काज में लगी रही । देखते देखते दिन ने जाने लिए दरवाज़ा खोला तो घर में शाम ने प्रवेश कर लिया । मगर आज शाम चहक नही रही थी । हर दिन से अलग खामोश सी थी । ढलते सूरज को उसने चूमा भी नहीं । शाम के साथ साथ सुमित भी ऑफिस से घर लौट आया । आम दिनों के मुकाबले सुमित का चेहरा बहुत लटका हुआ था । उसके चेहरे के इस कोने से उस कोने तक पीलापन पसरा हुआ था । 
सुमित को पानी का गिलास देते हुए सौम्या ने माथे को सहला कर पूछा "क्या बात है ? आज ज़्यादा थके लग रहे हो, ऑफिस में काम ज़्यादा था क्या ?" सुमित की आँखें नम सी हो गई थीं जैसे शर्मिंदा सा हो । 
सौम्या के बार बार पूछने पर सुमित ने कहा "जाना, आज जैसी शर्मिंदगी कभी नहीं झेली । घर से निकलते ही पेट दर्द शुरू हो गया और ऑफिस जाते जाते लूज़मोश्न शुरू हो गया । इतना ज़्यादा कि कंट्रोल से बाहर था बार बार वाॅशरूम भी नहीं जा सकता था । ऊपर से आज दो मीटिंग्स थीं । आज इतना गंदा लग रहा है कि पूछो मत ।"  
सौम्या अब अपना दर्द भूल चुकी थी उसकी आँखों में अब सुमित के लिए चिंता थी । उसने जल्दी से कपञे बदले और सुमित के बार बार मना करने पर भी उसे डाॅक्टर के पास ले गई । डाॅक्टर की दवाओं से रात तक सुमित को कुछ राहत मिली । 
दवा खा कर सुमित लेटने चला गया । थोड़ी देर में सौम्या भी पैड चेंज कर के वाॅशरूम से आ कर उसकी बगल में लेट गई । सुमित ने धीरे से सौम्या का हाथ अपने हाथों में लिया और बोला "आई एम साॅरी जाना । मैंने आज जो झेला है उससे बहुत बुरा तुम हर महीने हफ्ता भर झेलती हो मगर मैने कभी इस दर्द को महसूस करने की कोशिश तक नहीं की । सच कहूँ तो हमेशा से ही मुझे ऐसी चीज़ों से घिन आती रही है । मैं समझ ही नहीं पाता था कि यह औरतों कि ज़िंदगी का एक हिस्सा है । शायद इसका कारण यह भी हो सकता है कि किसी से इसके बारे में खुल कर बात ही नहीं हुई या कभी हर महीने होने वाले इस दर्द को समझना ही नहीं चाहा । मगर आज जब मैने खुद ऐसा ही कुछ सहा तब जा कर अंदाज़ा हुआ कि यह कितना कष्टदायक होता है ।" इतना कहते हुए सुमित का गला भर गया । 
सौम्या ने सुमित को गले लगाते हुए कहा "जानते हो बाबू, यह सात दिन जिसमें हमें इतनी तकलीफ़ सहनी पड़ती है ना यह हमारा गर्व है । हमें गर्व होता है इस बात का कि हम में वो गुण है जो जीवन का आधार कहलाता है हमें गर्व है कि हम औरत हैं । हमें इन दिनों से कोई शिकायत नहीं । शिकायत है तो बस अलग कर दिए जाने से । हमें इसके लिए ना किसी की हमदर्दी चाहिए ना किसी तरह का अपमान । हम बस इन दिनों नाॅर्मल बिहेव चाहते हैं । जैसा व्यवहार हमारे साथ हर दिन होता है वैसा ही इन दिनों भी हो । जैसे सब को रोज़ पौटी आता है सुसू आता है वैसे ही हर महीने हमें पीरियडस आते हैं । मगर हम किसी को उसके पौटी और सुसू जाने की वजह से अलग कतार में तो खड़ा नहीं करते ना । हमें बस इतना चाहिए कि लोग इन दिनों को आम दिनों की तरह ही रहने दें । हमारे चेहरे के दर्द को भांपते हुए हमारे दाग ना ढूंढे जाएं, हमारी चाल को देखकर लोगों की नज़र कपड़ों के पार ना जाएं, हमारे साथ ऐसा व्यवहार ना किया जाए कि जैसे छूत का रोग लगा हो हमें । बस इतना ही तो चाहते हैं हम ।"
सुमित चुप था एक दम चुप जैसे सारे शब्द आँसू बन गए हों । पश्चाताप से भरे आँसूँ । उसने सौम्या के इर्द गिर्द फैली बाहों को ऐसे कस लिया जैसे कह रहा हो कि हाँ जाना मैं समझ गया । आज से ये दिन आम दिनों की तरह ही होंगे बस तुम्हारे लिए मेरा ख़याल आम दिनों से थोड़ा ज़्यादा बढ़ जाया करेगा ।
धीरज झा

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