​नायक नहीं खलनायक हूँ मैं

यूं तो किसी "काका" की बात मानें तो ये दुनिया ही एक रंगमंच है और हम सब इस पर अपना अभिनय दिखाने वाली कठपुतलियाँ । बहुत हद तक बात सही...

यूं तो किसी "काका" की बात मानें तो ये दुनिया ही एक रंगमंच है और हम सब इस पर अपना अभिनय दिखाने वाली कठपुतलियाँ । बहुत हद तक बात सही भी है हम सब आँ अभिनय ही तो कर रहे हैं । मगर ये अभिनय मिलावटी है क्योंकि कहीं कहीं यह सच्चा भी है और असली अभिनय तो वो है जो बस अभिनय हो । आप हों कुछ और, और दिखाएं कुछ और । 
और ऐसा अभिनय आपको सिनेमा छोड़ कर और कहाँ मिलेगा । सिनेमा में सकारात्मक अभिनय के सभी कायल हो जाते हैं । किसी भी नई सिनेमा के बारे में जानने के लिए सबसे पहला सवाल होता है "हीरो कौन है ?" । पर एक तीखा सच यह भी है कि बिना नकारात्मक अभिनय के सकारात्मक अभिनेता का कोई वजूद नहीं । कोई भी अभिनेता हीरो तभी माना जाएगा जब वो खलनायक को मारेगा । बिना खलनायक फिल्म कैसी ? भले ही खलनायक कैसा भी हो मगर खलनायक होना ज़रूरी है । 
सिनेमा जगत की तरफ बढ़ने वाला हर कदम अपने दिमाग में यही ले कर आगे बढ़ता है कि उसे नायक बनना है । असफलताएं ज़रूरतें संघर्ष इत्यादि किसी को हास्य कलाकार किसी को साईड हीरो या किसी को खलनायक बना दे यह बात अलग है । 
आईए आपको मिलवाते हैं कुछ ऐसे अभिनेताओं से जिन्होंने अनेकों तरह के अभिनय किये मगर ख्याति पाई तो बस खलनायक के रूप में ही, या फिर अपनी लगन और मेहनत से नायक बन भी गये तो उनके द्वारा निभाया गया खलनायक का अभिनय सबको याद रहा । 
1. सूचि खलनायकों की हो और प्राण का नाम ना आए ऐसा संभव ही नहीं । जी हाँ वही "प्राण किशन सिकंद" जिनका 50 से 80 के दशक में खलनायकी में एकछत्र राज रहा । इनके नकारात्मक अभिनय का इतना ख़ौफ़ मचा रहा कि लोगों ने अपने बच्चों का नाम प्राण रखना ही बंद कर दिया । मगर क्या आप जानते हैं कि इसी प्राण ने अपने अभिनय जीवन की शुरुआत में बतौर नायक तकरीबन 22 फिल्में क थीं । 1940 में बनी यमला जाट फिल्म से अपने अभिनय जीवन की शुरुआत करने वाले प्राण ने 1942 से 46 तक "खानदान" सहित 22 फिल्मों में बतौर नायक काम किया । मगर उनकी किस्मत में सकारात्मक नहीं बल्कि नकारात्मक भूमिकाओं से अपना नाम बनाना लिखा था, इसीलिए 1948 में ज़िद्दी फिल्म में खलनायक की सफल भूमिका अदा करने के बाद उन्होंने फैसला किया कि वह अब नकारात्मक भूमिकाएं ही करेंगे । और आज उसी फैसले के कारण सारा देश इन्हें प्राण के नाम से जानता है । 
2. जब 50 50 कोस तक कोई बच्चा रोता है तो माँ कहती है सो जा नहीं तो गब्बर आ जाएगा । "गब्बर सिंह" एक ऐसा किरदार जिसने उन दिनों लोगों के दिल ओ दिमाग में भय पैदा कर दिया था । डाकुओं की क्रूर छवि को अमज़द साहब ने अपने अभिनय से दर्शकों के सामने रखा और फिल्म जगत के इतिहास में अपना अमिट नाम लिख लिया । मगर क्या आप जानते हैं अमज़द खान ने अपने अभिनय की शुरूआत "पत्थर के सनम" (जिसका किन्हीं कारणों से निर्माण ना हो सका ) और "हिंदुस्तान की कसम" से बतौर नायक की थी मगर फिल्म ना चलने की वजह से अमज़द साहब इन फिल्मों से नाम ना कमा सके । 
3. सारा शहर क्या बल्कि यूं कहिए पूरा देश इन्हें लाॅयन के नाम से जानता है । "हामिद अली खान" उर्फ "अजीत" जिनका नाम उन दिग्गज खलनायकों में आता है जो हिंदी सिनेमा के स्तंभ माने जाते हैं । मगर आपको बता दें कि मोना डार्लिंग के दिवाने लाॅयन ने अपने जीवन के शुरुआती दौर में खुद को एक नायक साबित करने के लिए अमरनाथ के निर्देशन में बनी फिल्म "बेकसूर" में बतौर नायक काम किया मगर नायक के रूप में वो छाप दर्शकों के दिलों पर ना छोड़ पाए । 
4. इनकी अजीब सी हँसी और डाॅयलोग्स के कारण 'प्रेम' प्रेम चोपड़ा का नाम तो सबने सुना ही होगा । प्राण साहब का नकारात्मक अभिनय से मुँह मोड़ना प्रेम साहब के लिए एक सुनहरा अवसर साबित हुआ और इस अवसर को बिना किसी गलती के इन्होंने इस तरह से इस्तेमाल किया कि एक समय में इनकी खलनायकी के बिना कोई भी फिल्म अधूरी लगती थी । मगर आपको बता दें कि चोपड़ा साहब फिल्म जगत में एक कामयाब नायक बनने का लक्ष्य ले कर उतरे थे ।  के. आसिफ इन्हें हीरो बनाना चाहते थे । उन्होंने इस बात का वायदा किया था मगर उनकी तबीयत  दुरुस्त नहीं रहती थी और प्रेम अब और इंतजार नहीं कर सकते थे । इसलिए इन्होंने निगेटिव किरदार निभाने शुरू कर दिए । प्रेम चोपड़ा ने जब भी हीरो के या पॉजिटिव रोल किए, फिल्में बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरीं । 
5.  इनकी बोली गोली की तरह निकलती थी और सामने वाले के दिल को चीर कर रख देती थी । यही कारण था कि फिल्म जगत में ये शाॅटगन के नाम से मशहूर हुए । शत्रुघ्न सिन्हा के पिता चाहते थे कि उनके छोटके बबुआ उनकी तरह डाॅक्टर बनें मगर अपने पिता की इच्छा को दरकिनार करते हुए सिन्हा साहब ने फिल्म जगत में अपना नाम कमाने की ठान ली थी । फिल्म में नायक बनने की इच्छा लिए ये दर दर भटके मगर होंठों से गाल तक फैला कटने के निशान ने उन्हों हर बार यही जवाब सुनवाया कि वह नायक की भूमिका में दर्शकों को नहीं लुभा पाएंगे । अपनी मेहनत को बेकार ना करते हुए सिन्हा साहब ने अपने सपनों से समझौता किया तथा बतौर खलनायक अपने फिल्मी कैरियर की शुरुआत कर दी । मगर अपनी रौबदार आवाज़ और संवाद के कारण सिन्हा साहब ने खलनायक के रूप में ऐसी पहचान बना ली कि लोग इनकी किसी भी फिल्म में नायक से ज़्यादा शत्रु बाबू के खलनायक अवतार को देखना पसंद करते थे । 1971 में इनके नायक बनने का सपना भी पूरा हुआ जब फिल्म कालीचरण आई और इन्होंने नायक की भूमिका में भी लोगों का मन मोह लिया । काला पत्थर में इनके द्वारा निभाया गया 'छेनू' का किरदार अमिताभ जी और शशि जी से ज़्यादा याद किया जाता है । "बता देना छेनू आया था" के साथ तालियों और सीटियों से गूंज उठा हाॅल आज भी उनके नकारात्मक अदाकारी की बेजोड़ सफलता में से एक माना जाता है । 
6. एक फिल्म के दौरान फिल्म के हीरो ने फिल्म के खलनायक से कहा था "यार इतने स्मार्ट हो, हीरो के लिए ट्राई क्यों नहीं करते ?" फिल्म थी मेरा गाँव मेरा देश, हीरो थे धरेंद्र और खलनायक जिनसे उन्होंने ये बात कही वह थे विनोद खन्ना । पिता से ज़िद्द कर के दो साल की मोहलत ले कर हीरो बनने के लक्ष्य के साथ फिल्म जगत में पैर रखने वाले विनोद खन्ना के दो साल समाप्त होने को थे और हीरो का कोई रोल उनके आस पास भी नहीं था । अपनी मजबूरियों के कारण लक्ष्य से समझौता करते हुए खन्ना साहब ने लगातार आठ फिल्मों में खलनायक की भूमिका निभाई और खलनायकी के शानदार अभिनय ने ही उन्हें नायक बना दिया । 
यह है मायानगरी की माया जो किसी के सपनों के हिसाब से नहीं बल्कि अपने मन के हिसाब से चलती है । कब किसे क्या बना दे कोई पता नहीं । किस्मत का पलटना यहाँ अनिश्चित है कोई वक्त तय नहीं कि कब कहाँ और कितनी देर में यह पलट जाए । 
हमारे लिए इन अभिनेताओं का संघर्ष ही मनोरंजन है । इन सभी कलाकारों को जो अपने हर अवतार से हमें हँसाते, रुलाते, डराते और रोमांचित करते रहे हैं के संघर्ष और मेहनत को हमारा सलाम । 
धीरज झा

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​नायक नहीं खलनायक हूँ मैं
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