वो अब था नहीं मगर खुश था

​#वो_अब_था_नहीं_मगर_खुश_था (कहानी) वो महीना ना जाने कौन सा रहा होगा । शायद साल का अंत था, हाँ वो अंत ही तो था । सब कुछ अंत पर ही तो था उस मह...

​#वो_अब_था_नहीं_मगर_खुश_था (कहानी)
वो महीना ना जाने कौन सा रहा होगा । शायद साल का अंत था, हाँ वो अंत ही तो था । सब कुछ अंत पर ही तो था उस महीने में । साल अंत पर था, सवाल अंत पर था, घायल हो चुके प्रेम का हाल अंत पर था, ना जाने क्या क्या अंत पर था, तो मैं कह सकता हूँ कि हाँ साल का भी अंत था वो । “सीट नं”, नहीं भाई सीट नं 48 नहीं थी वो, बताया ना ये अंत था और सीट नं 48 तो शुरुआत थी एक मोहब्बत की जो अमर हो गई, जिसने हकीकत की ज़मीं भले ही ना देखी हो मगर कल्पना के असमान में उसकी उड़ान हमेशा बनी रहेगी, भले ही किसी रद्दी की दुकान में ही क्यों न सही । हाँ तो ये थी सीट नं 65 जिस पर दिक्षा बैठी हुई थी । सीट पर अपने दोनों पैर पीछे की तरफ मोड़े हुए दिक्षा ने आगे की तरफ़ अपने बाजूओं को खिड़की से टिका कर अपने सर को बाजुओं पर अड़ाते हुए अपनी गोल गोल आँखों को सामने ओस से भीगी हुई खिड़की के कांच पर टिका रखा था ।
उसके लिए वो ओस से भीगी हुई खिड़की नहीं बल्कि सिनेमा का पर्दा था जिस पर उसके जीवन की अनगिनत झलकियाँ एक के बाद एक प्रदर्शित हो रही थीं । वो इस यादों की खिड़की से पार बाहर की दुनिया देखना चाह रही थी । वो उसकी घुट रही आँखों को बाहरी दृश्य दिखा कर नई ज़िंदगी देना चाह रही थी मगर एक तो खिड़की पर पड़ी ओस की बूंदें उसे बाहरी दुनिया के नज़ारे को देखेने से रोक रही थीं तो दूसरा उसके आँखों के आंसू उसे कुछ देखने नहीं दे रहे थे तभी पीछे से कबीर की आवाज़ आई  “क्या हुआ ? कहाँ गुम हो ?” दिक्षा थोड़ा सा चौंकी मगर फिर कबीर की तरफ़ देखते ही गनहरी कनिया ( अपने घर से विदा हो रही दुल्हन) की तरह रोने लगी । उसका मन कर रहा था कि कबीर को गले से लगा ले मगर वो उसे गले से लगा नहीं पाई बस रोती रही । 
कबीर बताया करता था कि जब जब बच्चपन्न में वो गाँव से छुटियाँ काट कर वापिस पंजाब आता था तो ट्रेन में उन सब पलों को जो उसने वहां बाबा, ताऊ, भैया, बहनों और गाँव के बाकि दोस्तों संग बिताये होते थे को याद कर कर के खूब रोया करता था । उसके सामने सबका चेहरा आता था, उन सबकी बातें याद आती थीं और वो सबसे ऊपर वाली सीट पर लेटा हुआ रोता रहता था । दिक्षा भी बिलकुल कबीर तरह ही रो रही थी और कबीर बदतमीजों की तरह मुस्कुराए जा रहा था । 
“यार तुमसे तब ही पूछा था कि ऐसा हुआ तो आओगी की नहीं तुमने तब ही मना कर दिया होता की नहीं आउंगी, मगर तब तो तुम चुप चाप हो जाती थी या मुझे चुप करा देती थी । और वैसे भी पहली बार ससुराल जा रही हो मुस्कुराती हुई जाओ । तुम्हारे इंतजार में सब बैठे हैं । पहली बार माँ और भाइयों से मिलोगी कम से कम चेहरे पर कुछ मुस्कराहट तो लाओ । मैंने कहा था माँ से कि माँ दिक्षा बहुत सुन्दर है मगर यहाँ तो दिक्षा ने रो रो कर अपने चेहरे को भरते वाले बैंगन की तरह सुजा रखा है । वैसे भी कौन सा अकेली जा रही हो मैं और मम्मी हैं तो तुम्हारे साथ ।” दिक्षा अब भी बस रो रही थी बिलख बिलख कर, उसका मन कर रहा था कबीर को गले लगा कर हमेशा की तरह कह दे कि प्लीज़ ऐसा मत बोलो तुम्हे मेरी कसम मगर दिक्षा जैसे बेबस सी हो गई थी जैसे किसी ने रोक रखा हो ये कह कर कि अब तुम कबीर को गले नहीं लगा सकती ।
सामने की सीट पर कंबल में लेटी हुई दिक्षा की मम्मी अपराध बोध से दिक्षा को देखे जा रही थी उनकी हिम्मत नहीं हो रही थी की बेटी को कहे कि बेटा चुप हो जा सब ठीक हो जाएगा । कैसे कहती वो कुछ कहने का हक़ उसी दिन खो दिया था जब सब जानते हुए भी चुप रही थीं । मगर माँ हैं ना तब भी बेटी का भला ही सोचा था आज भी उसके भले के लिए ही सोच रही है । 
जालंधर आगया था यहीं तो उतरना था दिक्षा को । दिक्षा को फ़ोन आया और दिक्षा ने बस “हूँ” कह कर फोन काट दिया । पांच मिनट में गाड़ी जलन्धर स्टेशन के प्लेटफार्म नं एक पर खड़ी थी । ट्रेन समय की तरह ही है । लोग चढ़ते हैं, उतरते हैं मगर इसे फर्क नहीं पड़ता, ये बस चलती रहती है । 
अपना मुरझा कर सूख चुके गुलाब सा चेहरा लिए अपनी मम्मी के साथ दिक्षा स्टेशन पर उतरी । कबीर उन दोनों के पीछे पीछे चलते हुए बोल पड़ा “देखो यही वो स्टेशन है जहाँ उतरते ही मैं चैन की लम्बी साँस लेता हूँ, मगर आज साँस नहीं आ रही ना जाने घुटा सा लग रहा है आज जबकि मैं तो तुम्हारे साथ पहली बार आया हूँ मुझे इतनी ख़ुशी है फिर भी मैं घुट क्यूँ रहा हूँ ।” दिक्षा एक बार फिर से फफक कर रो पड़ी । सामने आँसुओं के समंदर पर हिम्मत की बांध बनाए कबीर का छोटा भाई अनुराग खड़ा था । अनुराग ने दिक्षा और उसकी मम्मी का सर झुका कर नमस्ते किया और  सबका सामान ले कर बहार गाड़ी की और चल पड़ा । 
जालंधर से घर तक के रस्ते में किसी की हिम्मत नहीं हुई बोलने की । बस कबीर ही बोले जा रहा था और जितना वो बोल रहा था दिक्षा उतना ही रो रही थी । आखिर घर आ ही गया, कबीर का अपना और दिक्षा के दिन रात देखे सपनों का घर । दिक्षा को उसका उठाया हर कदम इतना भारी लग रहा था कि मानों सर पर सौ किलो से ज्यादा भर लदा हो । आखिर दिक्षा उस दहलीज़ तक पहुँच ही गई थी जहाँ तक कबीर ने ले जाने का उसे वदा किया था । 
“क्यों, ले आया न तुम्हें अपने घर तक । कहा था न मैंने कि ये वादा है मेरा मैं तुम्हे हर हल में यहाँ तक ला कर ही रहूँगा । देखो सब आस पड़ोस वाले भी आए हैं तुम्हें देखने ” इस बार दिक्षा कबीर की बात पर नहीं बल्कि सामने ज़मीन पर बैठी कबीर की माँ को देख कर रो पड़ी । माँ कि आँखें सूखी हुई थीं । सूखती भी कैसे ना अब और कुछ इन आँखों में बचा भी कहाँ था अब तो आंसू भी यह कह कर हार गए थे कि कितना कुर्बान हों हम तेरे दुखों के लिए लिए । आज हम ख़त्म हो रहे हैं मगर शायद तेरे दुःख कभी ख़तम ना होंगे, अभी दो साल पहले तो कबीर के पिता जी छोड़ गए थे इन सबको और आज ये दिन.....। 
दिक्षा ने जाते ही माँ को गले से लगा लिया और जोर जोर से रोने लगी इतना जोर से जैसे सालों का रोना रोक रखा हो, जैसे बच्चा चिल्लाता है वैसे । दिक्षा चिल्ला चिल्ला कर कहने लगी “माँ ये सब मेरी वजह से हुआ है आप मुझे जो चाहे सजा दीजिए । हमारा कबीर हमें मेरी वजह से छोड़ गया ।" हर परिस्थिति का डट कर सामना करने वाले कबीर का दिल इतना कमज़ोर कर दिया था प्रेम में पड़ने वाली बाधाओं ने कि ह्रदय आघात सह नहीं पाया था वो और दिक्षा इसके लिए खुद को दोषी मानती थी ।
माँ ने प्यार से दिक्षा के सर पर हाथ फेरा और कहने लगी “ ना बेटा वो चला गया तो कौन सा तुम अपने आप में बाकी है । मुझे उसका भी हाल पता था और तेरा भी पता है । कम से कम तू तो खुद को ठीक रख शायद इसी बहाने तुझमे कबीर भी जिंदा.......।” इसके बाद माँ के बोलने की हिम्मत नहीं हुई बस सामने पड़ी थी उस जवान लाश को एकटक निहारने लगी जो कि कबीर की थी । वो कबीर जो दिक्षा के साथ था अभी तक वो तो कबीर की याद थी जिसे दिक्षा चाह कर भी गले नहीं लगा सकती थी, चुप नहीं करा सकती थी वो अभी भी अपने ही लाश के सिहाने बैठा मुस्कुरा रहा था । 
दिक्षा की मम्मी एक कोने में खड़ी दो भावों के मिले जुले आंसू बहा रही थीं । एक जो पश्चाताप के थे उस बात का पश्चाताप जो उन्होंने समय रहते नहीं समझा और दूसरा कबीर के जाने के लिए बह रहे आंसू । कबीर के शरीर के पास बैठी उसकी आत्मा मुस्कुरा रही थी, मुस्कुराती भी कैसे ना उसका सपना पूरा हुआ था, दिक्षा को अपने घर ले आने का सपना । आज दिक्षा जो घरवालों की इज्ज़त ख़राब होने के डर से हमेशा चुप रही, हर झूठे संस्कार को नियति मान कर अपनाती रही आज वही दिक्षा सारी लोक लज्जा त्याग कर कबीर की देह पर सर  रख कर वहीँ पड़ी रही । सबने बहुत समझाने की कोशिश की ये कह कर कि अब संस्कार का टाइम हो गया है शव ले जाना पड़ेगा मगर वो वहां से हट ही नहीं रही थी । 
दिक्षा अपनी सांसों को रोक भी तो नहीं सकती थी क्योंकि आधा कबीर तो उसी में जिंदा था । आधे को तो वो खो चुकी थी अब खुद को मार कर बाकी के आधे कबीर का वजूद कैसे ख़त्म करती । आज सब समझ गए थे कि प्रेम कितना गहरा था । मगर अफ़सोस प्रेम बहुत अलसी है अपनी कदर बहुत धीरे धीरे किसी को समझा पता है और जब लोग समझते हैं तब तक देर हो जाती है । मगर मैने कहा था ना कि ये अंत था और अंत में ये सुखद था कि कबीर मुस्कुरा रहा था बच्चों की तरह क्योंकि अब उसे दर्द महसूस नहीं होता था अब वो अपनी दिक्षा के संग हमेशा रह सकता था । खुद को खत्म नहीं किया था उसने बस किसी के बिना चाह कर भी जी नहीं पाया था । 
आज समाज के साथ चल रही जंग में प्रेम ने अपना एक और सच्चा सिपाही खो दिया था । पवित्र अग्नि ने उस देह को बड़े प्रेम के साथ गले लगाया जो देह बस किसी एक के लिए बनी थी, जिसका प्रेम बंटा नहीं था जिसने प्रेम के हर नियम का पालन किया था ।     
धीरज झा

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क़िस्सों का कोना : वो अब था नहीं मगर खुश था
वो अब था नहीं मगर खुश था
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