रंगीला बाबू

​#रंगीला_बाबू  संडे का फंडे पोस्ट, फादर्स डे वाला  चुनाव के कुछ महीनों बाद अपनी गलती पर अफ़सोस में डूबी हुई जनता की तरह उस दिवार से टिकी हुई...

​#रंगीला_बाबू 
संडे का फंडे पोस्ट, फादर्स डे वाला 
चुनाव के कुछ महीनों बाद अपनी गलती पर अफ़सोस में डूबी हुई जनता की तरह उस दिवार से टिकी हुई साढ़े तीन पैरों वाली कुर्सी पर बैठे हुए वो इंसान रंगनाथ उर्फ रंगीला बाबू हैं । ना जी ना मिजाज़ से तो ये इंसान इतना शर्मिला है कि अपने सोहागरात जैसे हसीन और उमंग भरे लक्ष्य को भी एक महीने सतरह दिन में प्राप्त कर पाया था वो भी तब जब धर्मपत्नी जी ने डरते हुए ये पूछा कि "ऐ जी आप दूसरे पक्ष वाले पुरुस तो नहीं हैं ?" इतना सुनने के बाद रंगीला जी को ये लगा कि अगर अब नहीं कुछ किया तो उनकी मर्दानगी पर दाग लग जाएगा । 
वो तो माँजी हमेशा रंग बिरंगे कपड़े पहना देती थीं तो सबने नाम ही रंगीला रख दिया । अब स्कूल में नाम लिखवाने का टेम आया तो रंगीला को सुधार कर रंगनाथ बना दिया गया । शादी से पहले तो रंगनाथ की ज़िंदगी में एक आध रंग थे मगर शादी के बाद वो इतने बदरंग हो गये कि ब्लैक एन्ड व्हाईट टी वी भी इनसे ज़्यादा रंगीन लगने लगा । मतलब कि रंगनाथ जी के जीवन और शरीर से रंग ऐसे उड़े कि सर से ले कर इधर उधर के सारे बाल काले और सफेद के फेर से बचने के लिए अपने आप ही झड़ गए । शरीर का रंग ऐसा हो गया जिसे किस रंग से बुलाएं समझ ही नहीं आता । 
ना जी ना विवाह को भला कैसे बुरा कह सकता हूँ मैं ! वो तो मैं बता रहा था कि रंगनाथ जी इतने परेशान ही रहने लगे कि ज़िंदगी के सारे रंग उड़ गये । अच्छा कैसी परेशानी ? 
तो देखिए ऐसी परेशानी 
"क्या ! इस महीने तनख्वाह नहीं मिलेगी । अरे मुंशी जी ऐसा जुलुम ना करें ।"
"अरे रंगीला बाबू, ई जुलुम कोनो हमारे बस में है जो जब मन हुआ कर देंगे ? ई तो मालिक का फरमान है और ई कौन सा आपके अकेले के साथ हुआ है । सबका अईसा ही है ।"
"अरे नहीं नहीं महराज ऐसा जुलुम नहीं होना चाहिए । हम तो मालिक के बफादार हैं, मान भी जाएंगे मगर ससुर ई घर का खर्चा सब हमारा बफादार नहीं है ना कईसे मानेगा ?"
"अब ऐतना तो हम जानते नहीं । बाकि दिक्कत है तो दूसरा नौकरी तलास लीजिए । हमरे बाप का इसमें का जाएगा । एतना भुखमरी है कि आपषे दो पईसा कमे में कोनो दूसरा झट से मिल जाएगा मालिक को फिर आप मुंह ताकिएगा गुटुर गुटुर ।" नौकरी छूटने के ख़याल से ही रंगनाथ जी का होश छूटने लगा । ज़रा संभल कर फैसला लिए कि चलो कोनो बात नहीं अगला महीना तक हाथ टाईट कर के खर्चा करेंगे । 
यही सब झमेला के कारण रंगनाथ बाबू साढ़े तीन टांग वाली कुर्सी पर मुंह मसुआ कर बईठे हैं । 
"बाबू जी । बाबू जी । बाबू जी ।" रंगीला बाबू के कान दिमाग आँख नाक सब बंद था । जब खुला तो अपने बेटवा का सूरत उसका आवाज़ सब तीन तीन नज़र आया । जैसे डी जे पर गाना के बीच बीच में नहीं कहता "इटस प्रेजेंट बाय, गोलू बाबू गोलू बाबू गोलू बाबू ।" से म टू सेम अईसा ही । मन तो किया रंगीला बाबू का कि एक चमाट खींच कर दे ई उदंड लईका को मगर औरत और बच्चा पर हाथ उठाना इनके असूल में नहीं था आ सेयनका पर मार खाने के डर से कभी उठाये नहीं । 
हिम्मत नहीं था कि कुछ बोलें तो इशारा में मुंडी हिला कर बोले कि बोलो कि क्या बोलते हो ।
"ईस्कूल का फिस मांगा है चनईला माहटर साहेब । बोला नहीं लाया तऽ जुतिआएंगे कस के । ऊ बहुत मारते हैं हम नहीं जाएंगे बिना फीस के इस्कूल ।" रंगीला बाबू चाहते थे कि बेटे को समझाएं कि माहटर साहेब को चनईला नहीं बोलते । मगर फिर नहीं बोले क्योंकि हिम्मत ही नहीं हुई । वैसे चनईले वो खुद भी थे इसलिए थोड़ा बुरा खुद के लिए भी लगा था । 
"हम्म्म्म्म, ठीक है देखते हैं । अब जा कर पढ़ो ।" बच्चों को अपने से दूर भगाने का सबसे सस्ता और सरल उपाये है कि पढ़ने का बोल दो और फिर देखो कि गलती से भी बच्चा आपके पास फटक जाए तो कहना । पर रंगीला बाबू भगाए नहीं थे बस उनका हिम्मत नहीं था जादा बात करने का । 
कुछ देर बाद 
"ऐ जी, सुनते हैं ।" रंगीला बाबू का मन हुआ कि कह दें नहीं सुनते काहे कि गलती से परम आदरणीया सुश्री  ढिंचेक पूजा जी को सुनने के बाद हम बहरे हो गए हैं । मगर वो बोल नहीं पाये, काहे कि उनके पास हिम्मत नहीं था । तो इशारे में बस हूं बोल कर समझाए कि देवी बोलिए आपको सुनने के लिए ही तो बैठे हैं । 
"छब्बीस को हमारी छोटकी के सबसे छोटका का मुंड़न है । हमको खरीदारी करना है कुछ पईसा (जो कुछ नहीं बहुत कुछ से भी बहुत ज़्यादा हो) दीजिए । इस बार तो हम पहुंना को बताईए देंगे की पीडब्लूडी में है तो हमारे ठेंगे से । हमारे कलरफुल बाबू (भारतीय नारी अपने पति का असल नाम नहीं लेतीं ) भी कोनो पीडब्लूडी बाले से कम नहीं ।" मन तो हुआ कि कह दें कि तुम्हारे पूछने बताने के चक्कर में तीन साल से एक जोड़ी कच्छा ही घिसा रहे हैं । साला फुल अंडरवियर घिसते घिसते फ्रेंच कट जंघिया हो गया है । मगर नहीं बोले काहे कि हिम्मत और पत्नी को जवाब देने का आदत जो नहीं था रंगीला बाबू के पास । 
ना मन होने पर भी मैडम कि बात पर हाँ में सर हिलाना तो हमें हमारे मन के अंदर छुपे मोहन ने ही सिखाया है तो भला हम इसे कैसे टाल सकते हैं । इसलिए रंगीला बाबू भी सर पर ढेढ़ मन बोझ लिए हाँ में सर हिला दिए । 
कुछ और देर बाद 
"ऐ बेटवा, आँख से तनिको नऽ लौकाता हो । ऐगो चसमा बनवा दऽ नऽ ।" सबकी डिमांड के बाद माता जी भी अपनी इच्छा का पेटारा खोल लाईं । 
"माई पिछले महीना तऽ दिअईले रहली तोहरा के चसमा । ऊ का भईल ?" 
"ओकर फरेम ना सोहाएल हमारा के । हम तूड़ देहली ओकरा के लोढ़ा से । ऊ परसदवा के माई ले आईल बा अपना बेटा इहवां से ऐगो बड़ा सुंदर चसमां, ऊहे चसमा लेम हम तऽ ।" रंगीला बाबू तो जल कर कोयला और राख के बाद भी कुछ होता हो तो वही हो गये । 
"माई चसमा तऽ चसमें होखेला नू । फरेम से अई बुढ़ाड़ी में तोहरा के का करे के बा ।" बुढ़ाड़ी शब्द माँजी के दिल को गहराईयों तक भेद गया । और उसी गहराई से फूटा माँ के आँखों का सैलाब 
"हम तोहरा के नौ महीना पेट में रखली । कहिओ तोहरा के कहली कि केतना तकलीफ भेल हमरा । नऽ नू ! जानेला काहे ? काहे कि हम महतारी हईं तोहर । आ तू करम किष्ट बेटा अपना महतारी के अब बूढ़ कह के.....।" रंगीला बाबू ने अपनी पैंसठ साल की माँ को ऊपर से नीचे तक देखा और सोचा कि कह दें "आ अही नौ महीना के दुःख  भरल गाथा सुना के तू हर महीना एगो ना एगो फालतू खर्चा करा लेबेलू ओकर की ? अहिओ उमिर में तोहरा के फैसन पसंद बा लेकिन हमर जेब में तऽ पुराना जमाना के तनखाह पड़ेला ।" मगर रंगीला बाबू माँ की ममता के आगे हार गए और बाकि उनमें हिम्मत भी तो नहीं थी ।
"ठीक हई ले आएब दू चार दिन में ।"
"नऽ दू चार दिन नऽ । तू बिहाने आन के दऽ हमरा के काहे कि परसूं हमरा डिलर इहां ओकरा बेटा के पूजा मटकोर में जाए के बा । ऊहां हम नएका चसमा पहिन के जाएब तऽ तोहार बाबू जी हमरा के देखते रह जईहें जईसे ऊ जौनपुरबाली के नऽ निहार सकेलन ।" माँ जी इतना कह के शर्माती हुई चली गईं । रंगीला बाबूआँ बाबू के बुढ़ाड़ी रोमांस की कल्पना मात्र से ही शर्मा के लाल हो गए । 
थोड़ी और देर बाद 
"ससुर सब किहाँ बेटा जनमता है । हमारे इहाँ हमारा बाप जनमा है । बुझएबे नहीं करता है कि हम इस घर का सबसे बड़का हैं । जहिआ से इसका बिआह किए ई साफ हाथ से बेहाथ हो के जोरू के गुलाम होगया । गुड मैन दी लालटेन वाला एको गुन नहीं इस में ।" ये कोई नया राग नहीं था । तनख्वाह मिलने के दिनों में रंगीला बाबू के बाबू जी जो शहर में एक बैंक के दरबान रह चुके थे का गुस्सा इसी तरह फूटता था । उन्हें यह शौख़ था कि रंगीला बाबू अपनी सारी तनख्वाह उनके हाथ में ला कर धर दें । मगर यहाँ तो बारह आने जेब में पड़ने से पहले ही दो रुपए का गिलास टूटा होता तो इसमें भला रंगीला बाबू क्या बताएं और क्या निचोड़ कर पिता जी को दें । 
अब हर बार की तरह रंगीला बाबू को अपने बाबू जी को अगले महीने से सारी कमाई उनके हाथ में धर देने की झूठी कसम फिर से खानी पड़ी । मतलब जितना झूठा कसम ऊ खाए उसके असर से कोई मरता तो बड़के महराज जो उनके कुल गुरू थे मरने के बाद भी दो सौ बार से ज़्यादा मर गए होते । इसके अलावा वो कुछ कह भी तो नहीं पाते ना क्योंकि उनका हिम्मत ही कहाँ हो रहा था । 
अब तनख्वाह आई नहीं थी फरमाईशों की लिस्ट बढ़ती जा रही थी । इसमें अभी राशन और बाकी जरूरत के सामान का जुड़ना तो बाकि ही था तो अब एक ही रास्ता था और वो था फिरन जी सोनार । उसी के पास से रंगीला बाबू हमेशा की तरह पईसा उधार लाए अगले महीने चुका देने के करार पर । कुछ ब्याज तो लगेगा पर अब इतना सा ब्याज के लिए रंगीला बाबू सब का मन कईसे तोड़ दें । पईसा का क्या है आज है कल नहीं परसो फिर आ जाएगा मगर परिवार का जिम्मेदारी और परिवार का खुशी तो रंगीला बाबू को ही देखना है । 
रंगीला बाबू सब फिर से साढ़े तीन टाँग वाली कुर्सी पर बईठे हुए कर्जा के कारण बेचैन हो रहे बन को संभालने की नाकाम कोशिश कर रहे थे । इतने में उनका ललना आया और बोला "बाबू जी आज फादर्स डे पर हम निबंध सुनाए और हमको फस्ट प्राईज मिला । आप भी सुनिए ना ।" रंगीला बाबू ने निबंध सुनाने को कहा 
"पिता एक ऐसी ए टी एम मशीन हैं जिसमें कैश आउट ऑफ स्टाॅक होने के बाद भी हमारी ज़रूरत मुताबिक कैश हमेशा रहता है । पिता वो मशीन हैं जो कभी बंद नहीं पड़ते, हर धूप हो या बरसात काम करते ही रहते हैं । माँ मकान को घर बनाती है मगर उसके लिए सीमेंट बालू में पानी के साथ साथ पिता अपना पसीना मिला कर मकान तैयार करते हैं, पिता एक पिता होने के साथ साथ एक बेटे एक पति एक भाई सबका फर्ज निभाता है, घर में खाने की कमी देख आधा खाना माँ के लिए छोड़ खुद आधा पेट खा कर उठ जाता है, मगर जताता नहीं कभी बताता नहीं कभी......" रंगीला बाबू बाकि सब सुनने से पहले ही अपने ललना को गले लगा कर मन ही मन कहे चलो ससुर एक दिन के लिए ही सही कम से कम हमारा कदर तो जाने । 
"बहुत अच्छा लिखे हो बेटा । चलो हम भी तुम्हारे दादा को हैपी फादर्स डे कहते हैं ।" इतनी सी खुशी से ही रंगीला बाबू की सारी बेचैनी समाप्त हो गई । यही हैं पिता जो ज़िम्मेदारियों को निभाते हुए परेशान हो जाने पर ज़रा सी खुशी मिलते ही फिर से जोश में आ जाते हैं । पिता मजबूत है, अपनी कमज़ोरी अपनी थकावट को उजागर नहीं करते क्योंकि वो कमज़ोर पड़े तो पूरा परिवार संकट में आजाएगा और यही वजह है कि वोसख्त दिखते हैं वरना माँ जितना ही कोमल मन पिता का भी होता है । 
देश के सभी सख़्त फादरों को फादर्स डे की शुभकामनाएं 😉🙏
धीरज झा

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