​#और_इस_तरह_सच_जीत_गया (काल्पनिक कहानी)

​#और_इस_तरह_सच_जीत_गया (काल्पनिक कहानी) इस कहानी के सभी पात्र और घटनाएं काल्पनिक हैं इनका किसी घटना अथवा व्यक्ति से कोई संबंध नहीं । ऐसा कभी...

​#और_इस_तरह_सच_जीत_गया (काल्पनिक कहानी)
इस कहानी के सभी पात्र और घटनाएं काल्पनिक हैं इनका किसी घटना अथवा व्यक्ति से कोई संबंध नहीं । ऐसा कभी संभव हो भी नहीं सकता । इसलिए केवल कहानी पढ़ें । कहानी काल्पनिक है मगर पढ़ें ज़रूर । 
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"वकील साहब मेरे बेटे को किसी तरह बचा लीजिए । ज़मीन बेच कर आपकी फीस भर रहा हूँ । कहीं ऐसा ना हो बेटा भी चला जाए और ज़मीन भी ना बचे ।" रघुनाथ ने बड़ा असहाय सा हो कर अपनी बात जगपाल वकील को कही । 
जगपाल एक ऐसा वकील था जो कानून के साथ साथ जज जनता और मीडिया तक को अंधा साबित करने की कला में माहिर था । शहर में कहावत थी कि जगपाल अगर अपनी आई पर आजाए तो कटघरे में भगवान को खड़ा कर के शैतान और शैतान को भगवान साबित कर दे । वो आज तक एक केस नहीं हारा था । जगपाल के आगे बड़े से बड़ा सच भीगी बिल्ली बन कर झूठ के आगे नतमस्तक हो जाता था । 
"छोटी मोटी बात है रघुनाथ, नया खून है हो जाता है । अब बच्चे गलतियाँ करेंगे तभी तो सीखेंगे । और रही मेरी फीस की बात तो इकलौते बेटे के लिए तो लोग अपना आप तक बेच देते हैं तो भला तुमने ज़मीन बेच कर कौन सा बहुत बड़ा बलिदान कर दिया । औलाद होती ही ऐसी है, अब देखो ना पिछले साल परतवा की बेटी के केस में तुम ही धरना दिए बैठे थे ना कि उससे बलात्कार करने वाले मनीलाल सेठ के बेटे को सज़ा मिलनी ही चाहिए और आज अपने बेटे की बारी आई तो तुम मेरे पास ये जानते हुए भी भागे चले आए कि तुम्हारा बेटा बलात्कारी ही नहीं खूनी भी है । बाकि तब मैने मनीलाल सेठ के बेटे को उसके खिलाफ ढेरों सबूत होने के बाद भी बचा लिया था और अब तुम्हारे बेटे को भी बचा लूंगा । मैं तो बस पैसे का दोस्त हूँ । जो देगा उसे बचा लूंगा । चिंता ना करो कल की सुनवाई में ही तुम्हारा बेटा बरी हो कर घर लौट आएगा ।" जगपाल वकील ने चाय का आखरी घूंट भर कर रघुनाथ को दिलासा देते हुए कहा ।
रघुनाथ के बेटे ने हरिराम की बेटी का बलात्कार करने के बाद उसका गला काट कर जला दिया ताकि वो किसी को कुछ बता ना सके । वैसे तो रघुनाथ जुर्म के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए सड़कों पर उतर आता था मगर इस बार बात उसके इकलौते बेटे की थी । उसकी पत्नी ने पहले ही धमकाया था कि अगर उसके बेटे को कुछ हुआ तो वह ज़हर खा लेगी । रघुनाथ अपने बेटे से हार गया और उसे गलत को जीत दिलाने के लिए जगपाल वकील का सहारा लेना ही पड़ा । 
अगले दिन कोर्ट के बाहर अपराधों और अपराधियों के खिलाफ़ जनता की जागरुक्ता साफ दिख रही थी । हर बार तरह जनता भी वही थे जगपाल वकील के खिलाफ लग रहे मुर्दाबाद के नारे भी वही थे । हर बार बदलता था तो अपराधी का नाम बाकी सब वैसा ही रहता । कोर्ट में बहस शुरू हुई और आखिर में कानून को अंधा साबित करते हुए गलत की जीत हुई । सच कोने में खड़ा खईनी रगड़ रहा था क्योंकि अब उसे हारने की आदत होगई थी इसलिए रोता नहीं था अपनी हार पर । रघुनाथ अंदर से दुःखी था मगर बेटे के वापिस आने की खुशी भी थी उसे । जिनके साथ वो अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाया करता था उनके सामने से सर नीचा कर के निकल रहा था । 
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इस घटना को चार महीने बीच चुके थे । जगपाल एक शाम घर लौटा तो उसे पता चला कि उसकी बेटी मेनिका काॅलेज से घर नहीं लौटी । उसने तुरंत ही पुलिस में खबर की, बेटी की सारी सहेलियों के घर फोन कर के पता किया मगर मेनिका का कहीं पता नहीं चला । शाम ढलने लगी थी और रात का घना काला साया जगपाल के घर के साथ साथ उसके मन मस्तिष्क में छाने लगा था । पत्नी की मौत के बाद जगपाल सिर्फ अपनी इकलौती बेटी के लिए जीता और कमाता था । रात ज्यों ज्यों नज़दीक आ रही थी जगपाल वैसे वैसे डर के तले दबता चला जा रहा था । 
रात करीब साढ़े दस के करीब पुलिस ने फोन किया कि हाई वे रोड के पास वाले खंडहर में एक अधजली लाश मिली है आप उसकी पहचान कर लें । डर को अपने दिल ओ दिमाग पर सवार किए हुए जगपाल घटना स्थल पर पहुंचा और लाश की पहचान करने लगा । कपड़ों तो दूर लाश पर सही से चमड़ी तक नहीं बची थी । पास मिले पर्स और उसमें मौजूद आई कार्ड से पता चल गया था कि लाश मेनिका की ही थी । जगपाल पागलों की तरह रोने लगा । उसके सामने उन सभी बच्चियों की सूरतें घूमने लगीं जिनके गुनहगारों को जगपाल ने बचाया था । 
जगपाल के सोचने समझने की शक्ति शून्य हो चुकी थी । वो सारा दिन गुमसुम बैठा रहता ना रोता ना हँसता ना कुछ बोलता । कुछ दिनों की छान बीन के बाद पुलिस ने अपराधी को पकड़ लिया । जगपाल की बेटी का बलात्कार और कत्ल मनीलाल सेठ के बेटे और रघुनाथ के बेटे ने मिल कर किया था । जगपाल ने ठान ली थी कि वह इस बार अपनी बेटी के साथ बाकि सभी मासूम बच्चियों को न्याय दिला कर ही रहेगा । बात अदालत में पहुंच गई थी, अपराधियों के खिलाफ़ पुख्ता सबूत थे । जनता ये जानती थी कि यह जगपाल जैसे ज़ालिम वकील की बेटी का केस है बावजूद इसके वह अपराधियों को सज़ा दिलाने के प्रयास में जुटे थे । सबको उम्मीद थी की जगपाल इस बार अपनी बेटी के न्याय के लिए केस लड़ रहा है तो वह अपराधियों को सज़ा दिला कर ही रहेगा । 
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मनीलाल भी जानता था कि जगपाल उसके बेटे को सज़ा दिलाने के लिए पूरा ज़ोर लगा देगा । इसीलिए उसने पैसा पानी की तरह बहा दिया था और पैसे ने ही जगपाल बनाया था और अब इसी पैसे ने जगपाल का तोड़ निकाल लिया था । मनिलाल और रघुनाथ ने इस बार चड्ढा वकील को अपने बेटों का केस सौंपा । चड्ढा जगपाल का असिस्टेंट रह चुका था इसलिए उसकी हर चाल समझता था । कार्यवाही शुरू हुई, बहस चलने लगी । सच को भी इस बार यह सोच कर थोड़ी उम्मीद थी कि उसके पक्ष में जगपाल खुद खड़ा है और वह आज तक एक भी केस नहीं हारा । 
लंबी बहस के बाद फैसला सुनाया गया । अदालत का एक दस्तूर बिलकुल नहीं बदला और वह था झूठ जीतना और जो दस्तूर बदला था वह था जगपाल का इस कोर्ट में पहली बार हार जाना । सच आज विचलित था क्योंकि आज उसे यकीन हो चला था कि वह किसी खास व्यक्ति की वजह से नहीं हारता बल्कि इस दौर में उसकी किस्मत में ही हारना लिखा है । झूठ की जीत ही परम सत्य है । 
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जगपाल माथे को हाथों पर टिकाए कानून की देवी की तरफ बेबस सी नज़रों के साथ देख रहा था और कानून की देवी हमेशा की तरह आँखों पर पट्टी और होठों पर मौन साधे उससे कह रही थी "क्या करूं अंधी हूँ जो साबित करेगा वो जीतेगा भले वो सच हो या फिर झूठ ।" 
जगपाल के सामने चड्ढा वकील, मनीलाल बाप बेटे और रघुनाथ का बेटा खुशी मना रहे थे । चड्ढा वकील के ठहाके जगपाल के सीने में भाले की नोख की तरह चुभ रहे थे । ऐसे लग रहा था जैसे सब मिल कर सच पर हँस रहे हों । मगर कुछ ही पल में इंस्पैक्टर की कमर में लटकी पिस्तौल जगपाल के हाथ में थी और देखते देखते चार लाशों के साथ पांचवीं उसकी खुद की लाश ज़मीन पर थी । गोली चलने की आवाज़ के साथ कोर्ट रूम में कुछ पल के लिए गहरा सन्नाटा छा गया । 
इस सन्नाटे के बीच एक ज़ोरदार कहकहे की आवाज़ गूंज रही थी जो किसी के कानों तक पहुंच नहीं पाई । वह आवाज़ थी कोने में खड़े सच की, जो तालिताँ पीट पीट कर हंस रहा था और कह रहा था "मान गए जगपाल पहले गलत तरीके से झूठ को जीत दिला कर खुद सही बने रहे और आज गलत तरीके से मुझे जीत दिला कर कातिल बन गए । काश तुमने पहले से ही सही तरीके से मुझे जीत दिलाने का प्रयास किया होता तो आज तुम भी ज़िंदा होते और तुम्हारी बेटी के साथ साथ और बच्चियों की ज़िंदगी और इज्ज़त भी बर्बाद ना हुई होती ।" 
तरीका गलत था मगर आज सच की छाती को ऐसे ठंडक पहुंची थी जैसे कड़ी धूप में जलने के बाद बारिश की फूहारों से धरती की छाती ठंडक महसूस करती है । 
धीरज झा

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