सुबोधबा की आज़ादी

​#सुबोधबा_की_आज़ादी (कहानी) "ऐ सुबोधबा, आज तईयार रहना रे, तेरे मालिक दो दिन के लिए बाहर जा रहे हैं ।" मालकिन ने बायें कल्ला में पा...

​#सुबोधबा_की_आज़ादी (कहानी)
"ऐ सुबोधबा, आज तईयार रहना रे, तेरे मालिक दो दिन के लिए बाहर जा रहे हैं ।" मालकिन ने बायें कल्ला में पान दबा कर निर्लजता भरे रौब के साथ सुबोधबा को हुकुम सुनाया । 
"मालकिन आज पूरा एक तेरह कठा खेत में कोदारी (कुदाल) चला कर आये हैं । गत्तर गत्तर दुखा रहा है ।" सुबोधबा का तन और मन दोनो आहात था । उसके शब्दों से उसकी पीड़ा साफ़ झलक रही थी । 
"साला तू हमको ये ना बताओ कि तुमको हो क्या रहा है, तुम बस वो करो जो हम कहते हैं । नौकर है तू और तोहर काम है हमारा हुकुम मानना ।" मालकिन के वक्तव्य में वहीं प्रभुता थी जो दश्कों पहले मालिक अपने बंधुआ मज़दूरों के प्रति दिखाते थे । उन्हें मज़दूर के घाव दर्द या किसी भी तकलीफ़ से कोई मतलब नहीं होता था । वह मज़दूर को खाना भी सिर्फ इसलिए देते थे कि उसमें ताकत बनी रहे जिससे वो काम के बोझ तले दब कर मरे ना । मालकिन का रवैया भी सुबोधबा के प्रति कुछ ऐसा ही था । 
इंसान अपने मन के विरूद्ध कोई एक आधा काम कर भी लेता है तो कुछ दिनो के अफसोस के बाद उसे भुला सकता है मगर अपनी आत्मा से विरूद्ध हो कर कोई भी काम करना किसी को भी उस घाव के समान लगता है जिसकी टीस उसे हर रोज़ तड़पाती है । सांवले रंग मगर लंबे चौड़े देह वाला जवान सुबोधबा भी अपनी आत्मा के विरूद्ध जा कर ही यह काम करता था । सांवला रंग होने के बावजूद भी एक अलग सा आकर्षण था उसके रूप में । उसकी नीली आँखें ऐसे चमकती थीं कि मानो जैसे सफेद गगन की गोद में नीला चाँद अटखेलियाँ कर रहा हो । मगर इसी आकर्षण ने उसे ऐसे काम में फंसा दिया जिसकी इजाज़त उसकी आत्मा कभी नहीं देती थी । सुबोधबा अब पूरी तरह से मालकिन के गिरफ़्त में जकड़ा जा चुका था और यहाँ से निकलने का कोई रास्ता उसे नज़र नहीं आ रहा था । 
चंद महीने पहले सुबोधबा भटकता हुआ सेठ धनी राम के पास काम मांगने आया था । शहर में बढ़ती चोरी की वारदातों से सहमे हुए धनी राम ने उसे नौकरी देने से साफ़ मना कर दिया । सुबोधबा मायूस हो कर लौट रहा था कि तभी मालकिन जो धनी राम से आधी उम्र की होकर भी उसकी पत्नी होने का बोझ ढो रही थी से उसकी आँखें मिलीं । सुबोधबा की पहली झलक ने ही मालकिन के बंजर होते जा रहे मन पर अरमानों की मुसलाधार वर्षा कर दी । मालकिन ने धनी राम को बताया कि ये लड़का माली के काम से झाड़ू बहाड़ू, बर्तन हाँडी माँजना, खेत खलिहान देखना आदि सब कर लेगा तो इसे रख लो । इससे मुझे भी थोड़ा आराम मिलेगा और बाकी के नौकरों को भी तनख्वाह नहीं देनी होगी । धनी राम मालकिन की बात नहीं टालता था इसलिए उसने सुबोधबा को रख लिया । 
कुछ दिनों में मालकिन को पता चला कि सुबोधबा की माँ को गले का कैंसर है और उसके इलाज के लिये उसे बहुत से पैसों की ज़रूरत है, क्योंकि घर में कमाने वाला वो अकेला था । गरीब की मजबूरी अमीर के लिए मौका बन जाती है । और इसी तरह सुबोधबा के माँ की बिमारी मालकिन के अरमानों को पूरा करने का रास्ता बन गई । सुबोधबा को धनी राम खिला पिला कर साल में दो जोड़ी कपड़े और एक हजार रुपए देता था । मगर मालकिन ने उसके सामने शर्त रखी की अगर वो अपना सारा काम करने के बाद जब वो कहे तब उसका बताया काम करे तो वो उसे इसके अलावा पाँच हज़ार महीना देगी । कुल मिला कर छः हज़ार रुपए सुबोधबा के लिये बहुत बड़ी रकम थी । इतने में उसकी माँ का इलाज आसानी से हो जाता । 
सुबोधबा ने बिना कुछ सोचे हाँ कर दी, मगर जब पहली बार जब सेठ जी बाहर गये और मालकिन ने जो काम उसे करने को कहा वह उसे किसी हाल में मंज़ूर नहीं था, उसे बार बार अपनी बीवी का चेहरा याद आ रहा था जिससे शादी हुए अभी साल भर भी नहीं हुआ था । । पर इधर बात उसके हाल की नहीं बल्कि उसकी माँ के हाल की थी । सुबोधबा को अपनी आत्मा की आवाज़ दबा कर मालकिन के कहे मुताबिक करना पड़ा । मालकिन सेठ धनी राम के सामने इस तरह से पेश आती जिससे धनी राम सपने में भी उसके खिलाफ नहीं सोच सकता था । 
एक दिन ज़्यादा शराब पी लेने के बाद मालकिन ने सुबोधबा से कहा था "तू समझता होगा मालकिन छिनार है ? उसे।हर जगह मुंह मारने की आदत है ? है ना यही सोचता है ना ? मगर ऐसा नहीं है रे सुबोधबा । मैं भी तो औरत हूँ मेरे भी तो अरमान हैं । मेरे पिता ने दहेज बचाने के लालच में मेरी शादी इस बूढ़े सेठ से करा दी । मैं तब भी कुछ नहीं बोली, मैने समझ लिया कि मेरी यही नियती है । मगर यहाँ तो यह मुझे ना पारीवारिक सुख दे पाया ना शारीरिक सुख । मैं फिर भी कहीं बाहर मुंह मारने नहीं गयी । मगर जब तुझे देखा तो लगा कि भगवान ने तुझे मेरे लिये ही भेजा है ।" इतना कह कर मालकिन सुबोधबा के गले में बाँहें डाल कर झूल गयी और फिर उसी से गले लग के सो गयी ।
सुबोधबा समझता था मालकिन के दर्द को मगर उसे यह सब पाप लगता था । वो छुप छुप कर बच्चों की तरह रोया करता था । मालकिन का इस तरह छूना उसे घिन्न लगता था । उसे हमेशा लगता कि वह अपनी पत्नी और सेठ जी दोनों के साथ धोखा कर रहा है । उसे हमेशा ऐसा सपना आया करता जिसमें वो यह देखता कि वह एक अंधेरी जगह में फंसा हुआ है जहाँ से निकलने का कोई रास्ता उसे नज़र नहीं आ रहा । उस अंधेरे में दिख रही है तो बस उसकी माँ की सूरत । सुबोधबा बस माँ माँ चिल्ला रहा है और इसी तरह चिलाते हुए उसकी नींद खुल जाती ।
आज सेठ जी एक सप्ताह के लिये बंबई जा रहे थे । सुबोधबा कुछ सामान लाने बाहर गया था । इधर मालकिन ये सोच कर खुशी से पागल हुई जा रही थी कि अब बे रोक टोक के वह पूरा सप्ताह सुबोधबा के साथ बिता पायेगी । वो सुबोधबा को नये कपड़े पहना कर पास वाले शहर ले जायेगी । वहाँ दोनों सिनेमा देखेंगे और साथ ही साथ वो मेला भी घूमेंगे जिसकी सारे इलाके में धूम है । मालकिन सपने सजाते सजाते ये भूल ही गयी कि तीन घंटे बीत गये हैं मगर सुबोधबा वापिस नहीं आया । वो अब बेचैन हो जाती है । 
जब उससे रहा नहीं जाता तब वहदरबान को आवाज़ लगा कर उससे कहती है कि वो जा कर देखे कि सुबोधबा अभी तक वापिस क्यों नहीं आया । 
"मालकिन वो तो अपने गाँव चला गया । कल शाम को ही तार आता था कि उसकी माँ गुज़र गई ।" दरबान ने जवाब दिया । 
मालकिन थोड़ी देर शांत मुद्रा में खड़ी रहती है और फिर मुस्कुरा कर मन ही मन कहती है "चलो अच्छा है कोई तो आज़ाद हुआ । मैं नहीं तो तू सही ।"
सुबोधबा के यहाँ ना चाहते हुये रहने की एकमात्र वजह थी उसकी माँ । मगर शायद माँ की ममता ने अपने बच्चे की तड़प को महसूस कर लिया था इसलिये वह अपने बच्चे को आज़ाद कराने के लिये खुद ही अपनी ये कष्टदाई देह छोड़ कर चली गयी। 
धीरज झा

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क़िस्सों का कोना : सुबोधबा की आज़ादी
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