किसी धर्म या मज़हब से नहीं इस भीड़ से डरिए

​#किसी_धर्म_या_मज़हब_से_नहीं_इस_भीड़_से_डरिए  ज़्यादा वक्त नहीं हुआ यही कुछ डेढ दो महीने पहले की बात है । मेरी एक रिश्तेदार अपने गाँव से वापि...

​#किसी_धर्म_या_मज़हब_से_नहीं_इस_भीड़_से_डरिए 
ज़्यादा वक्त नहीं हुआ यही कुछ डेढ दो महीने पहले की बात है । मेरी एक रिश्तेदार अपने गाँव से वापिस पंजाब जा रही थीं जहाँ उनका परिवार रहता है । किसी कारणवष उन्हें अकेले सफर करना पड़ा । सब कुछ ठीक था मगर जब गाड़ी लुधियाना स्टेशन पहुंची तो एक सिख युवक ट्रेन में चढ़ा । उस युवक को देख कर साफ लग रहा था कि उसने अमृतपान किया हुआ सच्चा कहे जाने वाला सिख था । पगड़ी और गातरा पहने हुए उस सिक्ख युवक ने मेरी रिश्तेदार से सीट से उठ कर बैठने को कहा जबकी पूरी बोगी लगभग खाली थी । उसके साथ चार और युवक थे । महिला ने उनसे कहा कि उनकी तबियत नहीं सही इसीलिये वो लेटी है, पूरी बोगी तो खाली है वो कोई और सीट पर बैठ जाएं मगर वो युवक नहीं माना । थोड़े से वाद विवाद के बाद उस युवक ने अपना गातरा निकाला और मेरी रिशतेदार पर वार कर दिया । इसके बाद वो युवक अपने साथियों के साथ गालियाँ देता हुआ भाग गया । 
मेरी रिश्तेदार का लुधियाना से जलंधर तक खून बहते आया । यहाँ आने पर रेलवे पुलिस ने उनके पति को फोन किया जो जलंधर से तकरीबन सौ कि मी दूर रहते हैं । कुछ घंटे उन्हें आते लग गये । घाव बहुत गहरा था इसलिये उन्हें अमृतसर रेफर कर दिया गया । वहाँ सरकारी हाॅस्पिटल में पच्चीस हज़ार खर्च करने के बाद उनका ऑपरेश्न हुआ और कहा गया कि गारंटी कोई नहीं की वो बच जाएं । घाव गहरा था खून बहुत ही ज़्यादा बह चुका था मगर भगवान की कृपा से दस दिन में उन्हें होश आगया और वो बच गईं । 
मैं इस घटना का निचोड़ निकालते हुए कहूं कि सिक्ख जिनका मैं दिल से सम्मान करता हूँ उसी कौम ने बिहारी कह कर उस महिला पर हमला किया और ये इंसानियत के दुश्मन हैं तो मुझ से बड़ा मुर्ख शायद ही कोई होगा । किसी एक के लिए मैं पूरी कौम को गालियाँ कैसे दे सकता हूँ ? 
वैसे मैने कई बार सोचा कि अगर मेरी वो रिश्तेदार मर जातीं तो शायद मैं भी उनके नाम से काली पट्टी बांधने की अपील करता सबसे । करने को अब भी कर ही सकता हूँ क्योंकि हमला तो जानलेवा ही था और ट्रेन में ही हुआ और उन्हें बिहारी कह कर मज़ाक उड़ाते हुए ही हुआ मगर फिर मैने ये भी सोचा कि अपील करना बेकार है क्योंकि इस मामले में विरोध प्रकट करने वालों को कोई मसाला नहीं मिलता । मार्केट में ऐसे मामले ठंडे पड़ जाते हैं जिन पर हो हल्ला ना जुट पाये ।
जुनैद के साथ जो भी हुआ वो बेहद बुरा और भयावह था । उसके लिए न्याय की मांग भी जायज़ है । एक मासूम की हत्या की गई है तो उसे न्याय मिलना ही चाहिए । मगर एक बात याद रहे यह पहली हत्या या पहला अपराध नहीं है । इससे पहले भी हत्याएं होती रही हैं और होती रहेंगी क्योंकि यहाँ इंसान नहीं मरते यहाँ मरता है हिंदू, यहाँ मरता है मुस्लमान, यहाँ मरता है किसी कौम का आदमी । और आवाज़ें भी कौम के लिये ही उठाई जाती हैं । 
डाॅ नारंग की मौत हुई तो हिंदू मरा, अखलाक, पहलू मरे तो मुस्लिम मारे गये । और मारने वाली भीड़ भी होती है हिंदू और मुस्लिम की । आप क्यों नहीं समझ पा रहे कि  भीड़ भीड़ होती है, अमानवीय तत्वों की भीड़, हैवानों की भीड़, अपराधियों की भीड़ । जिनका काम ही है दहशत फैलाना । अगर हम ऐसे ही एक दूसरे पर इल्ज़ाम लगा कर एक दूसरे को दोषी करार देते रहे तो फिर जल्दी ही इस भीड़ का मनोबल बढ़ेगा और कोई पता नहीं की इस भीड़ का अगला निशाना मैं आप या हमारा कोई अपना बन जाये । 
अगर आप जुनैद की मौत का कारण हिंदुओं की भीड़ को बता रहे हैं तो आपको उन्हें गलत कहने का कोई हक़ नहीं जो कहते हैं कि आतंकवाद का मज़हब इस्लाम है, आपको उन सब की ये बात भी माननी होगी कि कश्मीर के सारे मुस्लमान गद्दार हैं और अगर वो गद्दार हैं तो देश के बाकि मुस्लमान भी गद्दार ही होंगे । क्षमा चाहता हूँ ऐसा बोलने के लिए मगर आपको सोचना होगा इस पर कि अगर आप कुछ लोगों के अमानवीय कृत्यों को उनके पूरे धर्म से जोड़ रहे हैं तो फिर बचे आप भी नहीं रहेंगे और इसी तरह एक दिन खुद में लड़ कर ही मर जाएंगे । 
जानते हैं हम लोग एक दूसरे पर इल्ज़ाम लगा कर अपने आने वाली नस्ल के लिये डर के गुबार से भरा आसमान तैयार कर रहे हैं जहाँ हमारे बच्चों को आए दिन खून की फुहारों में सावन के गीत नहीं बल्कि हरौसम का मातम मिलेगा । इसीलिए आपको अभी से डरना चाहिए और उस डर से पार पाने के लिये लड़ना चाहिए । आपको समझ होनी चाहिए कि यहाँ भीड़ मार रही है और इंसान मर रहा है । अगर आवाज़ उठे तो हर किसी के लिए उठाई जाए वरना चुप चाप आँखें बंद कर तमाशे का शोर सुना जाए । 
धीरज झा

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क़िस्सों का कोना : किसी धर्म या मज़हब से नहीं इस भीड़ से डरिए
किसी धर्म या मज़हब से नहीं इस भीड़ से डरिए
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