बड़ी देर बाद समझ आई

​#बड़ी_देर_बाद_समझ_आई ( कहानी) "छोटे बाबू परनाम ।" वो जब भी आता तो उसके मुँह से पहला शब्द यही निकलता । चेहरे पर कहीं सफेद कहीं काले...

​#बड़ी_देर_बाद_समझ_आई ( कहानी)
"छोटे बाबू परनाम ।" वो जब भी आता तो उसके मुँह से पहला शब्द यही निकलता । चेहरे पर कहीं सफेद कहीं काले बालों वाली खिंचड़ी दाढ़ी, उम्र की मार झेलने से पहले ही हार मान चुका झुर्रियों से भरा चेहरा जिस पर लंबी नाक सरहद के उस सिपाही की तरह खड़ी है जो गर्मियों में तन कर खड़ा होता है मगर सर्दियां आते आते सुकुड़ जाता है मगर सुकुड़ने के बाद भी डटा रहता है । वह बाकि मेहमानों की तरह ड्राईंगरूम में नहीं बैठता था । हमेशा आकर पैरों के भार ज़मीन पर ही बैठता । 
"अरे राम जी कैसे हो ।" उसे देख कर विनीत ना खुश होता ना दुःखी । ऐसे लगता जैसे वहाँ कोई है ही नहीं । बस उससे हाल पूछ लेता और उसके बाद राम जी खुद ही बोलता रहता और बोलते बोलते जब थक जाता तो । "अच्छा छोटे बाबू चलता हूँ" कह कर चला जाता । कभी कभी उसे जब प्यास लगी होती तो वहाँ नौकर से पानी पिला देने का निवेदन कर देता । 
विनीत अपने पिता का इकलौता बेटा था । पिता जी बहुत बड़े ज़मीनदार थे । जब तक ज़िंदा थे तब तक विनीत कभी कभार गाँव चला जाता था मगर उनके देहांत के बाद तो जैसे विनीत का गाँव से कोई नाता ही ना रह गया हो । राम जी विनीत के पिता का बड़ा वफादार मुलाज़िम हुआ करता था । पत्नी के गुज़र जाने और बेटे के शहर बस जाने के बाद विनीत के पिता के सुख दुःख का इकलौता साथी राम जी ही था । वो हमेशा अपने बेटे को लेकर चिंतित रहते और राम जी से कहते "रे रमजीया, एक वादा कर हमसे, मेरे जाने के बाद तू मेरे बेटे की खोज खबर लेता रहेगा ना ?" राम जी जानता था कि उनका बेटा अपनी दुनिया में खुश है और किसी के खोज खबर रखने का मोहताज भी नहीं, फिर वह अपने स्वामी की बात कैसे टालता इसीलिए उसने उन्हें वचन दे दिया और अब उम्र हो जाने के बाद भी अपना वचन निभा रहा है ।
विनीत का बेटा नमन तीसरी कक्षा में पढ़ता था । राम जी के आने की एक वजह नमन भी था । राम जी विनीत को कहता था "बबुआ को जब देख लेते हैं तो लगता है मालिक के दर्शन कर लिए । पूरी मालिक की छवि हैं बबुआ ।" 
नमन विनीत ने एक दिन पूछ लिया कि "पापा ये अंकल कौन हैं ?" 
"बेटा ये हमारे गाँव से आते हैं । वहाँ हमारी ज़मीनों की देखभाल यही करते हैं ।" 
"पापा क्या ये किसान हैं ?" नमन ने दो मिनट राम जी को ग़ौर से देखते हुए विनीत से पूछा
"हाँ बेटा किसान ही हैं ये ।" विनीत ने लैपटाॅप पर नज़र गड़ाए हुए नमन की बात का जवाब दिया । 
इधर विनीत अपने काम में लगा रहा उधर राम जी खाँव की बातें बताता रहा । इसी बीच नमन राम जी के पास गया और उसका हाथ पकड़ कर चलने का इशारा किया । राम जी को कुछ समझ नहीं आया वह नमन के पीछे पीछे चल पड़ा । नमन ने राम जी को ला कर विनीत के सामने वाली कुर्सी पर बिठा दिया । विनीत का ध्यान लैपटाॅप से हट कर नमन पर जा टिका । 
नमन ने अपने दोनों नन्हें हाथों को जोड़ा और राम जी से कहा "हम सबको खाना देने के लिए आपका थैंक्यू ।" 
विनीत को कुछ समझ नहीं आ रहा था । उसने थोड़ी कड़क आवाज़ में पूछा "नमन ये क्या कर रहे हो ?" 
नमन ने अपनी मटकती आँखों को पिता के हैरान चेहरे पर टिकाते हुए कहा "पापा आज मिस ने बताया कि जवान बाॅर्डर पर हमारी रक्षा करते हैं और किसान हमें खाना देते हैं इसीलिए जहाँ फौजी दिखे उन्हें सैल्यूट करो और जहाँ किसान दिखे उन्हें नमस्ते कर के दोनों को थैंक्स कहो हमारी रक्षा करने के लिए और हमें खाना देने के लिए ।" विनीत की आँखों में गर्व भी था और शर्मिंदगी भी । उसे समझ नहीं आ रहा था कि नमन को क्या कहे । पढ़ा लिखा हो कर भी जिस बात पर उसने आज तक ग़ौर नहीं किया था उसके छोटे से बेटे ने उसे सिखा दिया था । 
ये सारी घटना के दौरान राम जी पूरी सहम सा गया था यह सोच कर कि ना जाने विनीत बाबू अब क्या करेंगे । कहीं बबुआ को डांटें ना या फिर कहीं मुझे यहाँ आने से रोक कर मेरा वचन ना तुड़वा दें । यही सब सोचते हुए राम जी ने कहा "छोटे बाबू बबुआ नादान हैं । जाने दीजिए ।" विनीत को अभी तक नमन को घूरता देख राम जी ने सोचा कि वह चला जाएगा तो विनीत शायद शांत हो जाए, इसीलिए बोला "ठीक है छोटे बाबू अब चलता हूँ ।" इस बार उसने नहीं कहा कि फिर आऊंगा । 
विनीत ने अब राम जी की तरफ ग़ौर से देखा और फिर मुस्कुरा कर बोला "राम जी आज रुक जाईए यहीं । साथ ही खाना खाएंगे । कल सुबह निकल जाईएगा ।" विनीत की बोली में आदर का भाव आगया था । राम जी की आँखें भर आईं । पहले तो मना किया मगर विनीत और नमन के बार बार कहने पर वो रुक गया । 
अंदर से रुपाली सब कुछ देख रही थी । वो हमेशा विनीत से कहती कि "तुम राम जी के साथ बहुत रुखे से बात करते हो ।" तब विनीत कहता "अरे नौकर है वो उसे सर पर कैसे बिठा लूं ।" आज रुपाली अपने बेटे के लिए खुश थी । 
उस दिन सबने साथ खाना खाया और सुबह जाते हुए विनीत ने राम जी के पैर छूए तो राम जी ये कहते हुए एक दम पीछे हट गया कि "ये क्या छोटे मालिक ? पाप काहे चढ़ा रहे हैं ।" इस पर विनीत हंसते हुए बोला "राम जी मैं आपके पैर नहीं छू रहा । मैं तो एक किसान और अपने पिता के पैर छू रहा हूँ । आप उनके सबसे करीबी थे उनके बाद उनके समान आप ही हैं अफसोस यह बात मुझे आज समझ आई ।" विनीत के साथ नमन ने भी राम जी के पैर छूए । राम जी ने गीली आँखों के साथ ढेरों आशीर्वाद दिए सबको । 
धीरज झा

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