अम्मा

“यही फुटबौल था। गजब जिद ठान दी थी मनटुनिया। रोते रोते जान देबे पै उतारू हो गयी थी। कहे जात रहे "गुब्बाला लेंगे तभी खाएंगे।“ सरोज...


“यही फुटबौल था। गजब जिद ठान दी थी मनटुनिया। रोते रोते जान देबे पै उतारू हो गयी थी। कहे जात रहे "गुब्बाला लेंगे तभी खाएंगे।“ सरोज अम्मा की आंखें लगातार छ्ज्जी पर रखे उस फुटबॉल पर ही टिकी थीं। ऐसा लग रहा था मानो वो फुटबॉल न हो कर जादुई गोला हो जिसमें से सरोज अम्मा अपने हाल ही में बीते दिनों के हसीन लम्हें ढूंढ रही हो। और इधर भुटना अपनी पलके लगातार झपकता हुआ सरोज अम्मा को ऐसे सुन रहा था जैसे बच्चे दाई की कहानियां सुनते हैं ।
जनबै करत हो अपन गांव अइसन कि कुछो न मिले समय पे। बित्ता भर के ऊ लड़की हमको पूरा नाच नाचा दी रहे, फिर रजना के मनाओन किये तबभे जा के ऊ बजार से फुटबौल लाए के दिया उसको। फुटबौल मिलते ही मुरझाये पतझड़ से खिला सावन होए गई रही बिटिया मेरी। हाए, केतना प्यारा हंसत है हमारे बच्चा । नजर न लगे।” इतना कहते हुए सरोज अम्मा ने आंसुओं से अपनी पोती की नजर उतार दी।
बहू आई थी बनारस से दो चार दिन के लिए। खैर बहु के आने ना आने से ज़्यादा फर्क अब कहाँ पड़ता था उन्हें। वो आती भी तो सारा दिन “बिजली नहीं है, ठंडा पानी नहीं है, मच्छर बहुत हैं, यहाँ कि सड़कों ने तो कमर तोड़ दी" जैसी हज़ारों शिकायतों के साथ मन बहला कर चार दिन काट लेती थी। कोई विलायत में पली बढ़ी हो तो मानें भी कि सच में दिक्कत होती है मगर ये तो तीन बरस पहले ये चार गाँव छोड़ कर सारा दिन माटी की लीपा पोती करती थी। शायद बनारस बहुते फास्ट था इसीलिए बहू को तीन बरस में ही शहरी बना दिया। जिस बेटे के पैदा होने का अम्मा ने 15 साल इंतजार किया उसे आज काम ने इतना व्यस्त कर दिया था कि वो अपने गांव सहित उस माँ को भी भूल गया है जिसकी गोद बिना नींद भी उसकी आँखों में समा नहीं पाती थी।
ले दे कर सरोज अम्मा को इंतज़ार रहता था तो अपनी पोती मनटुन का। वही तो थी जिसने सरोज ताई के सूख कर पीले पड़ रहे पत्तों जैसे जीवन में हरा रंग भर उसे फिर से कोमल पत्तियों सा कर दिया था। बनारस से भी वो जब तक ताई से एक बार बात न कर लेती तब तक उसकी पलकों पर नींद सवार ना होती।
कल चली गई मनटुन और संजोग देखिए उसके जाने के बाद से ही सरोज अम्मा की पीड़ा को भांप कर आसमान एक पल के लिए चुप न हुआ। इधर मनटुन को याद कर के अम्मा की आँखें बरसती हैं तो उधर अम्मा की पीड़ा से आसमान का रोना भी नहीं थमता।
बहू को कहा था अम्मा ने कि दो दिन और रुक जाए मगर बहू ने साफ मना कर दिया ये कह कर कि पंद्रह दिन बाद वापिस जाना है, अब कुछ पल अपनी माँ के पास भी बिता लूं। सरोज अम्मा का मन एक बार रोने को हुआ ये सोच कर कि काश बहू ग़ौर से देख लेती तो उसे यहाँ भी पल पल तड़पती एक माँ दिख जाती, मगर उसने तो हमेशा एक सास को ही ढूंढा यहाँ। फिर वो सोचती कि बहू का कहना भी जायज है, उसकी माँ भी तो आस लगाए बैठी होगी अपनी बेटी के आने की। मैं तो तड़प ही रही हूँ अपने बेटे के लिए तो भला वो क्यों अपनी बेटी को तड़पे।
रात को सोते हुए भी सरोज अम्मा के कानों में मनटुन के वो शब्द गूंजते जब वो गाड़ी में बैठी चिल्लाती रही कि “मुझे दादी के पाश लहना है, मुझे नहीं जाना। दादी आप भी साथ तलो ना।” मगर उसकी सुनता कौन। जाते जाते वो सरोज अम्मा के जीवन में अभी अभी उभरे हरे रंगों को भी ले गई।
देखते देखते समय बीत गया
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चौबिस साल बीत गये आज के दिन को, पिछले साल मनटुन के हाथ भी पीले हो गये। वो अपने पिता की तरह बदली नहीं थी। शादी के दिन तक दादी दादी की रट उसकी ज़ुबान से नहीं जाती थी। अब भी हफ्ते में दो तीन बार फोन कर लेती है। सरोज अम्मा की उम्र भी अब अपने आखिरी पड़ाव पर मृत्यु की राह देखती है मगर अकेले इंसान को मौत का साथ भी जल्दी नसीब नहीं होता न।
“अम्मा देख कौन आया है।” भुटना ऐसे दौड़ता हुआ आया जैसे भूत पीछा कर रहा हो।
“कौन आफत आ गई, काहे चिल्लात है ?” ज़मीन को अपनी छड़ी से टोहते हुए अम्मा बाहर आई।
सामने बहू खड़ी थी मुस्कुराते हुए। ताई की कमज़ोर आँखें अब खुद का चेहरा भी नहीं पहचान पाती थीं मगर बहू का चेहरा उसने झट से पहचान लिया। आज कितने वर्षों बाद बहू ने आंगन में पैर रखा था। अम्मा के पैर छूने के बाद जब दोनों खाट पर बैठे तो ताई ने बहू के चेहरे को गौर से देखा। कुछ बोली नहीं बस उसका सर सहला दिया।
“अकेला घर काटने को दौड़ता है अम्मा। मनटुन के जाने के बाद अब मन उचाट सा रहता है। इन्हें अपने काम से ही फुर्सत नहीं है। मैने सोचा कुछ दिन आपके पास हो आऊं।” ये सारी बात कहते समय बहू की आँखें अम्मा के झुर्रियों भरे हाथों पर टिकी रहीं या शायद उसके मन की ग्लानि ने उसका सर ऊपर ना उठने दिया।
“तुहारा ही घर है मेरी बच्ची तू जबे मन करे तब आ। हमार जिनगी का अब का पता कब है कब न।” अम्मा ने अपने अंदर के अकेलेपन के हमशक्ल को बहू की आँखों से झांकते हुए देख लिया था।
“ना अम्मा अभी बहुत दिन जीना है आपको। कुछ दिन यहाँ रहेंगे फिर सब साथ बनारस चलेंगे। अब वहीं रहा जाएगा। मैं भी तो अब अकेली ही हूँ वहाँ।” बहू के मुंह से ‘अकेली’ शब्द सुन कर अम्मा के मन की पीड़ा दुगनी हो गई क्योंकि वो इस दर्द को बहुत अच्छे से समझती थी। अम्मा बस मुस्कुरा कर रह गई।
देर रात तक दोनों सास बहू ने माँ बेटी की तरह खूब बातें कीं और फिर सोने चली गयीं। आज अम्मा अकेली नहीं थीं आज उसने अपने आखिरी दिन की राह भी नहीं देखी मगर आखिरी दिन को तो आना ही उस रात था जिस रात अम्मा अकेली न हो। और आज वो आखिरी रात चुपके से अम्मा के सिरहाने आ कर बैठ गयी।
कल रात सास और बहू दोनों ने अपने अपने अकेलापन को कहीं दूर भगा दिया था मगर सुबह तक बहू का अकेलापन भटकता भटकता फिर से उसके पास आ खड़ा हुआ। कहते हैं वक्त पलटता है, आपने जो किया उसका हिसाब देने के लिए। आज सच में वक्त पल्टा था, बहू को ये समझाने के लिए कि अकेलापन इंसान की मुस्कुराहटों को किस तरह से छीन लेता है। अगले दिन तक बेटा, पोती, दामाद, नाते रिश्तेदार सब अम्मा के सूने आंगन में आ विराजे थे मगर अम्मा ये सब देखने को अब बची कहाँ थी। वो सब जिन्होंने सालों से अम्मा के चेहरे की झुर्रियाँ नहीं गिनी थीं आज उसके संस्कार में उसके अच्छे कर्मों का लेखा जोखा लगा रहे थे। अम्मा की देह जल रही थी और साथ ही जल रहा था उसका अकेलापन भी।

धीरज झा 

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