दूसरी प्रेमिका

#दूसरी_प्रेमिका (काल्पनिक कहानी) "क्या मेरे शेर किस बात पर मुंह लटका कर बैठा है ?" शर्मा जी ने अपने पड़ोस में रहने वाले जतिन के सुब...

#दूसरी_प्रेमिका (काल्पनिक कहानी)
"क्या मेरे शेर किस बात पर मुंह लटका कर बैठा है ?" शर्मा जी ने अपने पड़ोस में रहने वाले जतिन के सुबह से बंद कमरे का दरवाज़ा खोल कर उसके पास बैठते हुए कहा । 
सुबह काॅलेज गया था जतिन मगर एक एक ही घन्टे में वापिस आ गया और तब से ना जाने क्यों दरवाज़ा बंद किये हुए बैठा था वो । जतिन के माँ बाप छः साल पहले इस काॅलोनी में शिफ्ट हुए थे और शर्मा जी वहाँ तेरह सालों से थे । काॅलोनी थी तो बड़ी मगर मकान छः सात ही तैयार हुए थे अभी तक । शर्मा जी को शांति चाहिए थी इसीलिए यहाँ आ बसे थे । जतिन अपने माता पिता के साथ जब शर्मा जी के पड़ोस में रहने आया था तब बच्चपने के सोलहवें पायदान पर था और आज बाईसवें पायदान पर था । शर्मा जी के अकेलेपन को जतिन के साथ ने एक दम से खत्म कर दिया था । इतने उम्र का फासला और दोस्ती ऐसी जैसे लंगोटिया हो । जतिन, शर्मा जी को दादू कहा करता था और शर्मा जी भी उसे देख कर सोचते कि अगर उनका पोता होता तो जतिन जितना बड़ा ही होता । 
"कुछ नहीं दादू, बस मुझे अकेला रहना है, आप जाओ मैं मूड ठीक होते ही आपके पास आऊंगा ।" जतिन ने पेट के बल लेटे हुए बिना शर्मा जी की तरफ देख बिना जवाब दिया ।
"अच्छा बेटा, अब ये तेवर हो गये हैं जनाब के । ठीक है तो बर्थ डे गिफ्ट कैंसिल ।" शरा जी ने धमकी दे कर बैड से धीरे धीरे उठते हुए कहा ।
"दिस इज़ नाॅट फेयर दादू । ये पर्सनल है समझा करिए ।" जतिन ने उठ कर बैठते हुए शर्मा जी से विनती सी की । 
"अब छोड़ ना इतना भी क्या पर्सनल । मम्मी पापा के सारे झगड़ों की बातों से भी पर्सनल है क्या ? वो तो बड़े आराम से बताता था । बताऊं उन्हें ?" शर्मा जी ने बच्चों की तरह शिकायत लगाने की धमकी दी ।
"अरे दादू, अच्छा बताता हूँ । मेरा ना दिपाली से ब्रेकप हो गया । आज उसने बताया कि उसके पापा का ट्रांस्फर हो रहा है और वो लोग देहरादून जा रहे हैं इसीलिए अब हमारे बीच कोई रिलेश्न नहीं है ।" ग़ौर से सारी बात सुनते सुनते आखिर में शर्मा जी ज़ोर से ठहाका लगा कर हंस पड़े । 
"अरे तो इसीलिए मुंह लटका कर बैठा है । मर्द बन लड़के मर्द ।" 
"छोड़ो दादू आप नहीं समझोगे । आपको क्या मालूम प्यार क्या होता है । कभी किया हो तब इस तड़प का पता अहसास हो आपको ।" अभी तक हँस रहे शर्मा जी की हँसी अचानक से बंद हो गयी । अभी अभी जो ठहाका शर्मा जी के होंठों से होता हुआ पूरे चेहरे पर बिखरा हुआ था वो एक क्षण में घुटी हुई मुस्कुराहट में बदल गया । 
वो बिना बोले वहाँ से उठ कर अपने घर की ओर चल दिये । जतिन को लगा कि उसने कुछ गलत कह दिया । उसने एक दो बार उन्हें बुलाने की कोशिश की मगर फिर वो वहीं लेट कर रोने लगा । 
इधर शर्मा जी अपने कमरे की आराम कुर्सी पर आँखें बंद कर के लेटे हुए थे और लेटे लेटे अचानक सालों पीछे चले गये ।
"साॅरी साॅरी, शर्मा जी मैं फिर लेट हो गयी ।" रागिनी शरा जी से क्षमा मांगते हुए उनके बगल में बैठ गयी
"कोई ना, अब फर्क नहीं पड़ता ।" मुंह घुमाये हुए शर्मा जी ने जवाब दिया ।
"क्यों जी अब फर्क क्यों नहीं पड़ता ?" शर्मा जी की तरफ थोड़ा और खिसकते हुए रागिनी ने कहा 
"हमें दूसरी प्रेमिका मिल गई है, तो अब तुम आओ तो वाह वाह ना आओ तो वाह वाह ।" शर्मा जी थोड़ा इतराते हुए बोले 
"अच्छा जी, चलो कोई ना, वो प्रेमिका ही रहेगी वो भी दूसरी मैं तो बीवी बनने वाली हूँ ।" रागिनी को पता था शर्मा जी ऐसे ही मज़ाक कर रहे हैं इसलिए शर्मा जी की बाँह से लिपटते हुए रागिनी ने बेपरवाह हो कर कहा ।
"तुम ऐसे ही बेपरवाह रही तो शायद बीवी भी वही बने ।" रागिनी की पकड़ थोड़ी ढीली हो गयी ।
"अच्छा ऐसा क्या खास है उसमें ।"
"नाक चपटी नहीं उसकी तुम्हारी तरह, मेरा हर कहा मानती है, मेरी परवाह है उसे, जब जब तुम नहीं रहती तब तब वो हर समय साथ रहती है ।"
"शर्मा जी खबरदार मेरी नाक को चपटी कहा तो ये बस थोड़ी बड़ी है ।" रागिनी ने शर्मा जी की बात का विरोध करते हुए कहा ।
"हाँ वही ।"
"उस कमीनी का नाम बताओ, मैं छोड़ूंगी नहीं उसे ।" रागिनी जानती थी ये मज़ाक है फिर भी उसे बुरा लग रहा था ।
"गाली मत दो उसे ।"
"दूंगी हज़ार बार दूंगी ।" अब रागिनी की आँखों में बादल उमड़ आये थे । शर्मा जी को लगा इनके बरसने से पहले उसे रोक लें ।
"अच्छा नाम नहीं पूछोगी ?" शर्मा जी ने दुलार से रागिनी को कहा 
"बताओ क्या नाम है, अपने ही काॅलेज की है? कहीं वो नकचढ़ी शिल्पी तो नहीं ? 
"उसका नाम है "तुम्हारा याद ।" इतना कह कर शर्मा जी मुस्कुरा दिये ।
"तुम्हारा याद तुम्हारे बाद से हर समय साथ रहती है, मेरी इतनी परवाह करती है कि सब बातें याद कराती रहती है, खाना खाया, नोट्स बनाये, अभी तक सोये क्यों नहीं, इतना मत सोचो । इन सब बातों के लिए मुझे टोकती रहती है ये मुझे । तुम कितना डरती हो अपने पिता से लोगों से मगर ये निर्भिक है, सौ लोगों के बीच भी बेधड़क चली आती है और मुझ से लिपट जाती है । अब बताओ हुई की ना तुम से अच्छी ?" शर्मा जी की बाहों ने चुपके से रागिनी को घेर लिया था । 
"तुम सच में पागल हो ।" इससे आगे रागिनी के बोल उसके आँखों से बरसने वाली बारिश में भीग जाने के डर से मुंह के अंदर ही दुबक कर रह गये । 
शर्मा जी के कमरे का दरवाज़ खुलने से उनकी बंद हुई आँखें भी खुल गईं और रागिनी के आँखों की बरसात ने चंद मिनटों में सालों का सफर तय कर के शर्मा जी की आँखों में छलांग लगा दी थी । 
सामने जतिन खड़ा था । शर्मा जी की आँखों को बरसता देख वो घबरा गया । शर्मा जी के हाथों में एक तस्वीर थी जो आज से पहले जतिन ने कभी नहीं देखी थी । 
"बेटा तू ने सच ही कहा था, मैं भला प्यार को क्या समझूंगा । ये रागिनी है तेरी ना हो सकी दादी । शादी होने वाली थी हमारी और अचानक से एक सड़क दुर्घटना ने कुछ दिनों में होने वाली हमारी शादी को मातम में बदल दिया । अब जब प्रेम सिखाने वाली ही चली गयी तो मैं प्रेम क्या सीखता । मगर इसकी याद आज भी मेरे साथ साथ चलती है, हर जगह हर परिस्थिति में । अभी भी देख वो सामने पलंग पर बैठी हमारी बातें सुन रही है । मैं इतना रो चुका हूँ कि अब आँसू नहीं आते, शायद मेरी तड़प दम तोड़ चुकी है इसीलिए मैं तुम लोगों के आज कल के प्यार को समझ नहीं पाता ।  तू ने छः सालों में स्कूल से काॅलज तक ये तीसरी लड़की से ब्रेकॅप किया है और मैं गंवार आज भी रागिनी की याद के सहारे बैठा हूँ, इस उम्मीद में कि साँसें खत्म होते शायद सामने रागिनी मेरे इंतज़ार में खड़ी हो ।" बोलते बोलते शर्मा जी की आँखों में सालों से जमें आँसू पिघलते जा रहे थे । इधर जतिन अपना दुःख भूल कर शर्मा जी के आँसुओं में भीग चुका था । 
जतिन को रोता देख शर्मा जी को लगा कि उन्होंने शायद ज़्यादा ही दुःखी माहौल बना दिया इसलिए जतिन से बोले "अच्छा यार जतिन कितने दिन होगये वो सी टी टी नहीं गये । चल ना आज चलते हैं ।"
"दादू वो सी सी डी होता है, कितनी बार समझाया आपको ।" भीगी आँखों के साथ जतिन हँस दिया और इधर शर्मा जी भी ज़ोर से हंसने लगे । और दोनों को हंसता देख शर्मा जी की दूसरी प्रेमिका यानी रागिनी की याद एक कोने में बैठी शांतचित से मुस्कुरा कर दोनों को दुआएं दे रही थी । 
धीरज झा

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