​हम गाँओं हूँ

हम गाँओं हूँ "सब खाना खाके दारू पी के चले गये, चले गये चले गये ।" सुबह से नीम के स्वाद की तरह ज़ुबान पर लिपटा ये गाना गुनगुनाते हु...

हम गाँओं हूँ
"सब खाना खाके दारू पी के चले गये, चले गये चले गये ।" सुबह से नीम के स्वाद की तरह ज़ुबान पर लिपटा ये गाना गुनगुनाते हुए किसी शीतल छाया की तलाश में हम अपने  खलिहान की तरफ बढ़े चले  जा रहा थे । गाने के नाम पर इस कलंक को हम गुनगुनाते हुए खलिहान पहुंचे तो देखे  कि एक अजीब प्राणी वहाँ पहिले से बईठा है । 
हम पास जा कर थोड़ा रोब से पूछे "कौन हो बाबा ? डिस्को बाबा तो मर गया, अब तुम कौन अवतार हो हमको भी बताओ ?" अकुलाती गर्मी के प्रकोप से मुँह छुपाने के लिए जब हम वहाँ लगे पेड़ों के पास पहुंचे तो देखे एक लाईन से खड़े बीजू बमई, चिनियबा और जर्दा आम के पेड़ों में से बीजू बमई के नीचे बैठा था एक बूढ़ा बाबा । 
अब आप सोचेंगे कि बैठा था तो बैठा था, इसमें कौन सी बड़ी बात है, तुम काहे टोक दिए उसे जा कर, क्या तुम भी दलित पर प्रभुत्ता जमाने वाले क्रूर सवर्ण हो या तुम्हें घमन्ड है अपने अढ़ाई कट्ठा के इस खलिहान का जिसे तुम्हारे बाबा तुम्हारे लिए छोड़ गये हैं और साथ ही लगा गये आम के तीन पेड़ । मगर ऐसा कुछ भी नहीं है जनाब हमतो बुढ़ऊ को ऐई खातिर टोक दिए काहे कि उसका वेषभूषा बड़ा अजीब था । एकबार तो हमको ई धोखा हुआ कि क्रिस गेल का बाबा कहीं भटकते हुए इन्हाँ तो नहीं आगया । रंग रूप उसी से जो मिलता था ऊपर से फटा हुआ जिंस पहना था और मैल के कारण सफेद से पीली हो गयी एक टी शर्ट । अब हमारे गाँव का होता तो धोती लूंगी ई सब लपेटा होता । मगर ई परंपरा का विरोधी इहाँ कहाँ से आगया यही सोच कर उससे सवाल कर दिये । मगर जवाब हमको कुछो ना मिला । मगर हम आज के किरांतिकारी हैं ऐसे ही थोड़े छोड़ते । सवाल करना हमारा जनमसिद्ध अधिकार जो है । 
"ऐ मोहन मौन काहे हो जी ? कुछ तो बोलो, फटे होंठों का फाटक तो खोलो । समर्थन नहीं तो कम से कम विरोध ही करो, स्नेह नहीं तो ना सही क्रोध ही करदो ।" बाबा के मौन पर मेरे अंदर का फटेहाल कवि जाग गया और बाबा को देख अपनी बात कविता के सबसे कुरूप रूप में कह डाली । 
शायद मेरी कविता ने अपना कमाल दिखा दिया था क्योंकि फैश्नेबल बाबा की झुकी हुई गर्दन में अब हरकत हुई थी और देखते देखते बाबा की आँखें अब मेरे चेहरे पर जम गयी थीं । आँखों के नीचे की लटकी हुई चमड़ी ने अपने भार से उनकी आँखों को बुरी तरह थका दिया था । मुझ पर नज़रें टिकाए हुए बाबा ने अपने अंदर का सारा ज़ोर इकट्ठा कर के बुढ़ापे के वजन से भारी हो चुके होंठों को हिलाने की कोशिश करते हुए कहा "हम गाँव हूँ ।" अरे साला ये तो सेम टू सेम "मैं समय हूँ" वाली टोन थी बस ऐसा लग रहा था कि 'हरीश भिमानी' की आवाज़ बुढ़ापे के कारण थरथरा रही हो ।  
"अमां बुढ़ऊ, एक तो तुम अजीब हुलिया बना कर पहिले ही मेरी विचारों द्वारा आधे पागल साबित किये जा चुके हो, अब ऐसी अजीब बात कह के क्यों पूरे पागल की दावेदारी के लिए मेरे विचारों का बहुमत प्राप्त करने पर तुले हो ।" मैं थोड़ा कड़क हुआ ।
"हम सच में तोहार गाँव हैं । कहो तो कब बसे, कौन बसाया, किसने जियाया कौन धंसाया सब का सब सुना दें तुमको । महादेव झा के पोता ना होते तो देते पटकुनिया आ चढ़ जाते छाती पर ।" बाबा एक पसली के, हम कहाँ भीमकाय । उनकी पटकुनिया देने वाली बात पर उनको ऊपर से नीचा तक एक बार देखे । मगर फिर सोचे गाँव में भूत प्रेत का बड़ा।हल्ला सुने हैं अभिये तऽ कुछ दिन पहिले एगो लईकीया के उठा उठा पटका था । बस यही सोच कर हम मन ही मन तनिक भयभीत हुए मगर भय को अपने सुंदर मुख पर पसरने ना दिया । 
"अच्छा बबा मान लिये तुमहीं गाँव हो मगर जदि तुम गाँव हो तो धोती कुर्ता काहे नहीं पहने जो ई जिंस टी शर्ट झाड़े हो ?" हम तो पहिलहीं कहे थे कि हम जरा किरांतीकारी परविरती के हैं, सवाल तो पुछबे करेंगे सो एक और सवाल पूछ दिये । 
अपने सामने खड़े इस विकलांग सवाल को देख बाबा का क्रोधित मुख ज़रा सा दुःखी दिखने लगा । बाबा कांपती हुई आवाज़ में बोले "हम खुद से थोड़े कुछ करते हैं जो इहाँ का लोग करता है, जईसा हमको बनाता है वईसा हम हो जाते हैं ।" बाबा को देख कर लगा कि इस बार जो इतनी बरसात हुई है उसका आधा पानी बाबा की बूढ़ी आँखों में जमा हो गया है । बाबा की बरसती आँखों को देख कर मेरा मन चालू कुल्फी की तरह पिघल गया । 
"रोते काहे हो बाबा ?"
"रोएं ना तो क्या करें बबुआ ? तोहार परबाबा लोग जब हमको बसाये थे तब हम का थे और आज देखो का हो गये हैं । बदलता जनरेसन ससुर हमको का से का बना दिया । तोहरा सबके परबाबा सब के समय में हम जवान थे एक दम, सुरसा जईसे मुंह बाए हुए ई ओभर वेट नदी जो तुम देखते हो, ई उस समय में आज कल की नयकी हिरोईनिया सब जईसन थी । पतली कमर, सूरज की रौशनी में चमकता इसका यौवन छूने से मैला होता था और आज इसको देखो कितना भद्दा बना दिया है इसको ताकने का मन नहीं करता इसकी तरफ । ई सब गाँओं वाला सब के देन है । ई लोग परदेस गया, हम खुस हुए । सोचे चलो बच्चा सब परदेस गया है कुछ कमा के लाएगा, हमारा रूपरेखा सुधरेगा मगर देख का हुआ, जो पढ़ा लिखा गया वो वहीं का हो गया और जो अनपढ़ मजदूर गया ऊ पईसा खाक लाता, हमारा रूपरेखा खाक बदलता उल्टा धीरे धीरे शहर का छोड़न अपने साथ ला कर हम में मिला दिया । हम ससुर ना सही से गाँव रह पाये ना सही से शहर हो पाये । ये हालत बना कर रख दिया हमारा । हमार बिटिया सब, मतलब हमारी शान थीं हमारी रौनक थीं । अपना ससुरार से आती थी तो सूना हमारे सूने मन को हरियरा देती थीं । उन दिनों में सावन आने से जितना खुशी नहीं मिलता था, बरसात से हमार कलेजा जेतना नहीं ठंडाता था । उतना खुशी अपनी बिटिया सब के आने से होता था हमको, उन सबकी खिली हुई हंसी के फव्वारों से हमारे सीना में ठंडक पहुंचता था । मगर ई देखा आज कल हमरी बिटिया सब दिल्ली बंबई से आती हैं तो लगता है कि इंग्लैंडवा ई सबके शहर के बाद वाला इस्टेसन ही है । पहिले आती थी तो हमको गोबर माटी से लीप कर अपना हाथ से रंग से सजाती थीं अब ई सब को माटी से एलर्जी है सारा दिन हाय गर्मी गर्मी चिचियाते और खुद का मुंह फेसबास से धोते निकल जाता है ।" बाबा बोलते बोलते हांफने लगे, हम भी थोड़ा सेंटिया गये । 
थोड़ा रुक कर फिर बोलना एस्टाट किये "बबुआ कईसे ना हमारा कलेजा फटे तुम बताओ, हमारी छाती जो साधारण खाद पानी से ही हरियरी उगलती थी उसमें अब खाली कीटनाशक भर दिया गया है, हमारे सीने को हर की कोमल नोक की सहलाहट नहीं मिलती अब तो सतफारा सीधे चीरता है हमको । पहिले किसान खेत में उम्मीद बोता था, बेटी की विदाई की उम्मीद, बबुआ के पढ़ाई की उम्मीद घर के बनाई की उम्मीद मगर अब उम्मीद का गला घोंट दिया गया है । कर्जा नाम का दैंत हत्या कर दिता इन सब उम्मीद का । कसम से कहते हैं बबुआ पहिले घर घर से ना तरकारी का खुशबू गमकता था मगर अब बस उस घर से गमक आता है जिस घर में विलायती मसाला का फोरन पड़ा हो । दूध दही सब मिलावटी हो जाने के कारण देखो केतना दुर्बल हो गये हम । अब इहाँ कोनों आँगन से गुनगुनाहट की आवाज़ नहीं आती अब तो बस भोजपुरी आ हिंदी फिल्मी गाना बजता है । अब बूढ़ी माई की बात सुनने को कोई पुतोह नहीं बैठती अब सबके घर में टी .वी लग गया है शहर वाला सीरियल सब हमारे यहाँ तक घुस गया है ।  न खेल है न कूद है न बतकही है बस मोबाईल है, जिसका नेटवर्क ढूंढते हुए आज के बच्चे अपने अपने रिश्ते ही कहीं गुम कर दिये है ।" बबा की आँखों के किनारों पर बना पुल उनकी भावनाओं के तूफान के आगे ऐसा कमज़ोर पड़ा की सब्र का बांध तोड़ते हुये उनकी आँखें बहने लगीं । हमने बाबा के कमज़ोर कंधे पर अपना हाथ रखा और थोड़ी हिम्मत दी ।
"दुःख इस बात का नहीं कि हम तरक्की कर रहे हैं अरे ई तो खुसी का बात है कि हालत सुधर रहा है , हम बस इसलिये दुःखी हैं कि ये तरक्की धीरे धीरे हमारी पहचान हमारा वजूद मिटा रही है । सहर हम कभी हो नहीं पाएंगे और गाँव हमको रहने नहीं दिया जाएगा ।" 
"बाबा दुःख तो आपका जायज है हो तो बुरा ही रहा है आपके साथ । बाकि हमको बताओ हम आपके लिए का कर सकते हैं ?"
"बबुआ तुम तो बाहर जन्में बाहरे रहे तुमसे कोई शिकायत नहीं बस कर सकते हो तो एतना करना कि कभी अपना मन से हमारा नाम ना मिटने देना, ख़याल रखना कि तुम्हारी साँसों से कभी हमारी महक ना ख़तम होने पाए । तुम सब तरक्की करो खूब करो मगर हमको हमारे जईसा ही रहने दो । हमको अपना देहातीपना में ही गर्व महसूस होता है ।" 
हम उनकी इच्छा सुन कर मुस्कुरा दिये और आँख बंद कर के  हाथ जोड़ कर बोले "आप जैसे खुश रहें हम वही करेंगे । हमारे पिता जी की आखरी निशानी हैं आप, आपकी छाप भला अपने दिल से कैसे मिटा सकते हैं ।" इतना कह कर हम आँख खोले तो पाये कि बाबा गायब थे वहाँ से । 
उनको चला जाता देख हमारे अंदर का गंवाला कवि खाना दारू को भूल कर अपने अपने आप गुनगुनाने लगा 
पी गेल करबाईट हमारा अमवा के मिठास

चूस लेलक चकलेट लेमचुस के खटास

फेस वास करियामिया सुनरता गऊंआ के खा गईल

जादा दिन नऽ  जिएत बुढ़ऊ ई हमरा के बुझा गईल 

सोचा कुछो ऊपाये ऐकरा के बचावे के 

आ नऽ त रही न मुंह दोबारा गऊंआ में आवे के 
इसके बाद एक लंबी सांस ले कर हम बुढ़ऊ के बारे में सोचते सोचते वहीं सो गये । 
धीरज झा

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