बाबुल मोरा नईहर छूटो ही जाए

#बाबुल_मोरा_नईहर_छूटो_ही_जाए (कहानी) "बाबुल मोरा नईहर छूटो ही जाए" रघुनाथ बाबू को ये गीत बहुत सुहाता था । खो से जाते थे इसे सुनते ...

#बाबुल_मोरा_नईहर_छूटो_ही_जाए (कहानी)
"बाबुल मोरा नईहर छूटो ही जाए" रघुनाथ बाबू को ये गीत बहुत सुहाता था । खो से जाते थे इसे सुनते हुए । 
"पिता जी हमको ये अच्छा नहीं लगता क्यों सुनते हैं इसे । कितना रोते हुए गाता है इसमें ।" रघुनाथ बाबू को अक़सर ये गीत सुनते देख एक दिन पायल ने अपनी नाराज़गी जता दी थी ।
छोटी सी पायल की इस बात पर रघुनाथ बाबू मुस्कुरा कर कहते "पसंद आएगा बेटा, जब तुम बड़ी हो जाओगी और इसका मतलब समझोगी ना तब बहुत अच्छे से समझ आएगा । 
पायल को इस गीत का मतलब समझाने के लिए समय बड़ी तेज़ी से भागने लगा और भागते भागते आज उस दिन आकर ठहर गया जिस दिन का सामना करने से  रघुनाथ बाबू को सोच कर ही भय लगता था ।
"रमन, दरवाजे तक हो आओ एक बार । हलुआई से पूछ लेना कुछो चाहिए तऽ नऽ । बाकि फेर शाम हो जाएगा तो दिक्कत होगी ।" माथे पर बंधा मुरेठा खोल कर उससे अपना मुँह पोंछते हुए रघुनाथ बाबू अपने बेटे से बोले ।
"पिता जी, सारा सामान आगया है, आप बेकार में फिक्र कर रहे हैं । अभी घन्टा भर पहले आया हूँ दरवाजे से ।" मोबाईल में से किसी का नंबर ढूंढते हुए रमन ने रुघुनाथ बाबू से कहा । 
"अच्छा, तो टेंट वाले को कर लो फोन और बोल दो कि नहीं होता है तो आज रात तक बिछावन जगा दे । कल कहीं हड़बड़ी में भूल गया तो बराती सब कहाँ सोएगा ।" रघुनाथ बाबू पंखे के नीचे बैठे हुए भी पसीने से तर हुए जा रहे थे जिस कारण बार बार उन्हें अपने गमझे से मुंह पोंछना पड़ रहा था । 
रघुनाथ बाबू की इस बात पर रमन ने उन्हें ग़ौर से देखा और सोफे से उठ कर उनके पास पलंग पर जा कर बैठ गया । रमन ने उनका सर हौले से दबाते हुए कहा "पिता जी, सब इंतज़ाम हो गया है । आपने ही तो सामने खड़े हो कर एक दिन पहले ही सब करवाया है । आप प्लीज़ ज़्यादा मत सोचिए । सब बहुत अच्छा जा रहा है ।" 
"पापा, ये राघबबा को देखिए ना चिढ़ा रहा है हमको । ऐसा करेगा तो हम शादी नहीं करेंगे ।" पायल अपने पुराने अंदाज़ में पैर पटकते हुए (शायद अपने अल्हड़पने की आखरी ) शिकायत आ पहुंची । उसे आता देख रमन चुप हो गया और रघुनाथ बाबू को इशारे में ये कहता हुआ बाहर चला गया कि वो जा रहा है दुआर पर सब कुछ फिर से देखने । 
"ऐ रघबबा टांग तोड़ देंगे ससुर जो हमारी बेटी को चिढ़ाए तो ।" रघुनाथ बाबू राघव को झूठ मूठ का डांटने के बाद पायल की तरफ मुस्कुरा कर देखते हुए उसके मासूम से चेहरे में उसकी बच्चपन से अब तक की झलकियाँ देखने लगे । 
हर पिता की तरह रघुनाथ बाबू को भी अपने तीनों बच्चों से बड़ा प्रेम था मगर पायल में उनकी जान बसती थी । पायल कोई फरमाईश करे और रघुनाथ बाबू चुपके से वो खुशी उसकी झोली में ना डाल दें ऐसा आज तक नहीं हुआ । बेटी को लाढ़ करने की हद तब पार होती दिखाई दी जब पायल के जन्म के दस साल बाद राघव का जन्म हुआ । रघुनाथ बाबू नयी सोच के आदमी थे । शुरू में तय कर लिया था कि दो ही बच्चे होंगे और जब रमन के जन्म के दो साल बाद पायल का जन्म हो गया तब तो उनकी सोच और पक्की हो गयी । दोनों बच्चों को पा कर रघुनाथ बाबू अब निश्चिंत थे । बच्चे बढ़ने लगे और रघुनाथ बाबू अपने काम काज में व्यस्त हो गये । पायल यही कोई आठ नौ साल की रही होगी तब जब एक दिन रोते हुए घर आई । माँ ने जब पास बिठा कर रोने का कारण पूछा तो बोली "सुनितिया से जब कहे कि अपने बाबू से खेलने दो तो वो हमको मना कर दी और हमको बोली खेलना है तो अपना बाबू ले आओ । माँ मेरा बाबू ला दो मुझे ।" माँ ने बहुत समझाया मगर वो मानने को तैयार कहाँ थी । घूमते घूमते ये ज़िद्द रघुनाथ बाबू के कानों में पड़ गयी फिर क्या था साल भर बाद पायल का बाबू आगया । रघुनाथ बाबू की पत्नी थोड़ी मखौलिया थीं तो जब भी राघव पायल को तंग करता या उसे मारता तो माँ बनावटी गुस्से में कहती " इतनी प्यारी बहन को ये कैसे तंग करता है । पैर छूआ कर इसके इसकी ज़िद्द के कारण ही तू यहाँ है ।" 
बच्चपन से ही पायल यही रटती आ रही थी कि जब शादी करेंगे तो पुलिस सिपाही से ही । वो अपने बच्चपने में ये कहती और रघुनाथ बाबू इस बात को अपने दिल ओ दिमाग में बिठा चुके थे और आज पायल की शादी भी एक पुलिस ऑफिसर से ही हो रही थी । हाँ मगर पायल के प्रति अपने प्रेम का वो कभी दिखावा नहीं करते थे । कभी उसकी किसी ज़िद्द पर उन्होंने नहीं कहा था कि वो उसे पूरा कर देंगे । बस चुपके से पूरा कर देते थे ऐसे जैसे उन्होंने नहीं किया ये बस संयोग से हो गया । मगर रघुनाथ बाबू के दिल में पायल के प्रति भरा प्रेम उनकी आँखों से झलकता था जिसे हर कोई पढ़ लेता ।
"क्या बात है पिता जी आपको पसीना क्यों आ रहा है ? आप परेशान हैं ना ?" पायल ने रघुनाथ बाबू का ध्यान तोड़ते हुए कहा । 
"अरे नहीं बेटा हम काहे परेशान होंगे ।" 
"नहीं आप परेशान हैं । मैं जानती हूँ  कि शादी में बहुत  खर्चा लग रहा है  इसीलिए आप परेशान हैं ।" रघुनाथ बाबू से उनके दोनों बेटे भय खाते थे मगर पायल उनके सामने कोई बात कहने से नहीं डरती थी । उसका दिल साफ़ था । उसकी उम्र ने बच्चपन छोड़ दिया था मगर उसके मन को बच्चपने ने अभी तक नहीं छोड़ा था । कभी कभी इस बच्चपने पर रघुनाथ बाबू की पत्नी थोड़ा परेशान हो जाती थीं मगर रघुनाथ बाबू हर बार कहते कि "बच्चपन सबसे अनमोल होता है, खुशनसीब हैं वो लोग जिनमें बच्चपना बच्चपन के बाद तक भी झलकता है । हमारी बेटी बस मन की साफ है और साफ मन में भगवान बसते हैं, वो हमेशा इसे हर मुश्किल से बचाएंगे । 
"ऐ बेटा, खर्चा से हम कभी नहीं डरे और कमाए किसके लिए ? तुम लोगों के लिए ही तो कमाए हैं तुम सब की खुशी के लिए खर्चा करने में कैसा डर ।" 
"जानती हूँ, मेरे पिता जी बहुत बहादुर हैं ।" बेटी की आँखों में पिता के लिए गर्व पिता के जीवन की सबसे बड़ी उप्लब्धियों से अहम उप्लब्धी जिसकी अनुभूती पायल की आँखों से रघुनाथ जी साफ अनुभव कर रहे थे । 
रघुनाथ बाबू पायल को भला अपनी परेशानी का कौन कौन सा कारण बताते । क्या।उसे ये बताते कि उनके अपने दिल का कटना नहीं सहा जा रहा, या ये।बताते कि उन्हें चिंता है इस बात की कि कल से उन्हें ज़्यादा मीठा खाने, कभी कभी सिगरेट पीने पर कौन डांटेगा, या ये बताते कि आदतन किसी बात पर ज़्यादा गुस्सा आने पर उन्सें कौन याद दिलाता कि ज़्यादा गुस्से से उनका ब्लडप्रैशर बढ़ जाएगा । कौन उन्हें सोने से पहले भजन सुनाया करेगा, कौन उनके खाने पीने का इतनी बारीकी से ध्यान रखेगा । रघुनाथ जी कैसे बताते की चिंता उन्हें रूपये पैसे की नहीं बल्कि इस बात की है कि अब पायल की हर छोटी बड़ी खुशी का ख़याल कौन रखेगा ? रघुनाथ बाबू की इन परेशानियों पर भला कौन ध्यान देता । सबके लिए वो पिता हैं वो पिता जो कठोर होता है, जिसका स्नेह माँ के मातृत्व की तरह खुल कर सामने कभी आ ही नहीं पाता क्योंकि उसे हर तरफ देखना है, उसे अपने बच्चे से स्नेह करते हुए इस बात का भी ध्यान रखना है कि उसका बच्चा कल कैसे खुश रहेगा । पिता।होना बहुत कठिन है।मगर बेटी का पिता होना उससे भी कहीं ज़्यादा कठिन है । 
सारी तैयारियाँ हो चुकी हैं । बारात का स्वागत भव्यता के साथ हुआ है । बच्चे शरारतों से अपनी खुशी ज़ाहिर कर रहे हैं, घर की औरतें विधि व्यवहार की तैयारियाँ करती हुईं गीत गान में खुश हैं, भाई लोग व्यवस्था को संभाले रखने में खुश हैं और रघुनाथ बाबू इन सबसे अलग अपने पक चुके आँसुओं को किसी तरह से पलकों पर ही लटकाए रखने की कोशिश में लगे हुए हैं । झूठी मुस्कुराहट चेहरे से कम नहीं होने दे रहा ये सोच कर कि कोई उनकी मातम जैसी उदासी का अंदाज़ा ना लगा ले । 
विदाई का समय आगया है, डोली सजी खड़ी है । पायल बेसुध सी है उसे समझ ही नहीं आरहा कि कैसे इस विरह की पीड़ा को बाहर निकाले । वो रह रह कर सबकी शक्ल देख रही है और इधर शहनाई कलाकार धुन छेड़ देते हैं " 

बाबुल मोरा, नईहर छूटो ही जाए

बाबुल मोरा, नईहर छूटो ही जाए
चार कहार मिल, मोरी डोलिया सजावें  

मोरा अपना बेगाना छुटो जाए

बाबुल मोरा, भईहर छूटो जाए
आँगना तो पर्बत भयो और देहरी भयी बिदेश

जे बाबुल घर आपना मैं पीया के देश

बाबुल मोरा ...
बाबुल मोरा, नईहर छूटो ही जाए

बाबुल मोरा, नईहर  छूटो ही जाए
ये शहनाई पर बज रहा गीत सुई का काम कर रहा है जिसकी नोक़ ने हल्का सा पायल के दिल को छुआ और उसकी पीड़ा मवाद की तरह छलछला कर बाहर आगयी । अब वो सुध में आई है, उसे अब आभास हुआ कि उसका सब कुछ छूट रहा है । अब वो व्याकुल है, बेतहाशा रो रही है, बार बार उस पिता को खोज रही है जो उसकी हर ज़िद्द को चुपके से पूरा कर देते आ रहा है । मगर आज उसकी ज़िद्द इतनी बड़ी है कि उसके आगे रघुनाथ बाबू असहाय हैं । वो तो बस आँसुओं को रोके सब कुछ देख रहे थे । उन्होंने अग्नि के साथ फेरों में उस बच्चपन को समाते देखा जिसे पायल ने कल तक संभाले रखा था, उसी अग्नि में आज वो बाप भी समा गया जिसका अपनी बेटी पर इकलौता अधिकार था । वो तो डोली जिसे सजाने के लिए शहर से अनोखे और बेहतरीन फूल मंगवाए थे वो उन्हें उस पिता केअधजले देह की अर्थी समान लग रही है जिसे अपनी नन्हीं और मासूम सी बेटी के साथ चले जाना है । 
अभी तक रघुनाथ बाबू अपनी पीड़ा को दबाए खड़े हैं और एकदम से पायल भागती हुई उन्हें गले लगा लेती है और रो रो कर कहती है "बाबुल मोरा, नईहर छूटो ही जाए ।" 
और इसी के साथ रघुनाथ बाबू के आँसुओं का बांध टूट गया । सब पायल को पकड़ कर डोली में बैठा रहे हैं और रघुनाथ बाबू आँसू बहाते हुए असहाय खड़े हैं । उनके कानों में बस यही गूंज रहा है "बाबुल मोरा, नईहर छूटो जाए ।" बेटी की हर ख्वाहिश को पूरा करने वाला पिता आज बेबस है, वो चाह कर भी अपनी बेटी को जाने से नहीं रोक सकता । बेटी का नईहर छूट रहा है और उसके साथ ही पिता की आत्मा का एक हिस्सा भी आँसुओं के रास्ते चुपके से उसके जिस्म से निकल रहा है । 
धीरज झा 

COMMENTS

Name

अन्य रचनाएँ,1,अलविदा,5,इश्क़ वाली कहानियां,14,कल्पनाएं,1,कविता,112,कहानियों का कोना,30,कहानी,121,किश्तों वाली कहानियाँ,5,किस्से गाँव के,14,ख़ास लोग,2,खुशियाँ,39,ख़्वाहिशें,2,गज़ल,31,चलते फिरते बस यूं ही,2,चिट्ठियाँ,22,जय जवान,11,तड़प मेरी तुम्हारे लिए,72,दु:ख,16,दुख,45,नमन,3,पापा के लिये,26,पुराने किस्से,3,प्रतिभा की दुनिया,2,फिल्म समीक्षा,3,बस यूं ही,27,बातें काम कीं,59,माँ,18,युवाओं की बात,1,रात के किस्से,6,लघु कहानी,8,लेख,149,वैश्विक,1,व्यंग,35,शायरी,30,सिनेमा,1,सिर्फ तुम्हारे लिये,63,हास्य कथा,1,
ltr
item
क़िस्सों का कोना : बाबुल मोरा नईहर छूटो ही जाए
बाबुल मोरा नईहर छूटो ही जाए
क़िस्सों का कोना
http://www.qissonkakona.com/2017/07/blog-post_21.html
http://www.qissonkakona.com/
http://www.qissonkakona.com/
http://www.qissonkakona.com/2017/07/blog-post_21.html
true
3081115015472439889
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS CONTENT IS PREMIUM Please share to unlock Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy