मेरे साथ हुए अन्याय का जवाब कौन देगा

#मेरे_साथ_हुए_अन्याय_का_जवाब_कौन_देगा मैं जन्मा तो इतना अछूत था कि मेरे साथ साथ मेरे दई देयाद भी दस दिन तक अछूत बने रहे । मैं थोड़ा बड़ा हुआ त...

#मेरे_साथ_हुए_अन्याय_का_जवाब_कौन_देगा
मैं जन्मा तो इतना अछूत था कि मेरे साथ साथ मेरे दई देयाद भी दस दिन तक अछूत बने रहे । मैं थोड़ा बड़ा हुआ तो अघोरी हो गया जहाँ मन शौच कर दिया जहाँ मन मूत्र कर उसे गिंजने लगा, मक्खियों के पीछे भागने लगा अपना थूका ही चाटने लगा । कुछ और बड़ा होते ही मैं अधर्मी हो गया, ना झूठा समझा, भगवान के भोग लगने से पहले ही केला खाने की ज़िद करने लगा, गंदैला जल ही शिव पिंडी पर डालने लगा बदले में माँ से डाँट भी सुनी मगर खिलखिला कर हँस दिया, अबोध था ज्ञानहीन था । कुछ समझने लायक हुआ तो उपनयन संस्कार करा दिया गया मैं।उस दिन से पूर्ण ब्राह्मण कहलाने लगा । जनेऊ मेरे कंधे में झूलता घूमता कमर तक लटकता रहा । जितना सिखाया उतना इसे पहनने के नियमों का पालन किया । 
फिर मैं और बड़ा हुआ नियम वही रहे मगर मेरे दोस्त बढ़ गये । दोस्त जिनकी जाति ना जानी ना पूछी । मेरे टिफिन का पराठा भुजिया उन्हें भाता तो उनके घर से आया आलू का पनीर का पालक का पराठा मुझे पसंद था । उसी टिफिन के साथ जाति भी मिल गयी । मगर जनेऊ अपने नियम के साथ ही कंधे से होते हुए कमर तक झूलता रहा । पढ़ाई खत्म हुई बाहर रहने आया अपने बाथरूम का फ्लश साफ किया तब मैं मेस्तर हो गया । कमरे में झाड़ू लगाया मैं कामवाला बन गया, खाना बनाया हलवाई हो गया । राशन की खरीद में मोल भाव करते करते सेठ जी संग मैं भी लाला बन गया ।
नौ से पाँच मालिक की डांट सुनी मैं, देहाड़ीदार मजदूर बन गया । अपने कपड़े धोये मैं धोबी हो गया । जूता भी पाॅलिश किया, महीने के अंत से पहले जूते का सोल उखड़ा तो फैवी क्विक से खूद जोड़ते हुए चमार भी बना । सुबह शाम मंत्रोचारण करते हुए पंडित भी हुआ । इन सब के साथ ही जनेऊ नियमों के साथ मुझ से लिपटा रहा । 
जन्म के साथ रोने की भाषा बोली, थोड़ा बड़ा हो कर खिलखिलाने की बोली सीखी, घर में बज्जिका बोलना सिखाया गया, स्कूल से काॅलेज तक पंजाबी बोली, किताब से हिंदी सीखी, भाहर के दोस्त बने उनसे हिंदी बोलने लगा, जब जवानी जागी और इंटरनेट के शुरुआती दौर में याहू आया तो पिलिपीननों के साथ अपनी अंग्रेजी भी झाड़ ली । बुआ के बेटे या जो भी पच्छिमाहे दोस्त या जान पहचान वाले हुए उनके साथ भोजपुरी भी बोल ली, मैथली को समझ लिया । 
हर एक कर्म किया, हर तरह के लोगों के साथ ज़िंदगी का कोई ना कोई पल जिया । मैं बढ़ता रहा छूत अछूत भेद भाव जात पात सब से अनभिज्ञ हो कर । हर किसी को सुना हर किसी को समझने का प्रयास किया और इन सबके दौरान जनेऊ मेरे कंधे से नहीं उतरा, अपने नियमों के साथ वो झूलता रहा । और अब ये जलेगा मेरी चिता के साथ ही, जब मैं जाते जाते मुझे झूने वालों और मेरे कुल खानदान वालों अछूत बना जाऊंगा दस दिनों के लिए । 
मैं जन्म से ब्राह्मण रहा, कर्म से ब्राह्मण रहने का हर प्रयास किया मगर मुझे खुद को और मेरे दोस्तों या मेरे संपर्क में आने वालों को मुझ में ब्राह्मणवाद नहीं दिखा जिसके विरोध में मेरा ये जनेऊ एक सूअर को पहना दिया गया ? मैं ब्राह्मण होने के नाते अपने साथ हुए इस अन्याय का जवाब अपने किस दलित दोस्त से मांगू ? क्या भेदभाव ना करना ही मेरा पाप रहा ? क्या छुआ छूत ना मानने के कारण मुझे लज्जित किया गया ? क्या मैने हर जाति हर कर्म को अपना माना ये मेरा दोष था ? अगर हाँ तो आप सच में आपसे बड़ा जाहिल कोई नहीं है क्योंकि सबसे बड़ा भेदभाव तो आप कर रहे हैं मुझ जैसे लाखों की आस्था के साथ । 
ईश्वर आप सब को सदबुद्धि दें 
धीरज झा
 

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