वो आखरी रात

#वो_आखरी_रात (काल्पनिक)  कलम के सिपाही, हिंदी साहित्य के सेनानायक धनपत राय उर्फ नवाब राय उर्फ मुंशी प्रेमचंद जैसे महान कहानीकार और उपन्यासका...

#वो_आखरी_रात (काल्पनिक) 
कलम के सिपाही, हिंदी साहित्य के सेनानायक धनपत राय उर्फ नवाब राय उर्फ मुंशी प्रेमचंद जैसे महान कहानीकार और उपन्यासकार को मैं इस काल्पनिक कहानी के रूप में एक छोटा सा उपहार भेंट करता हूँ । इस कहानी का सारा दर्द मेरा है, ये सारी पीड़ा मेरी महसूस की हुई है । 
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काली स्याह रात की चाबुक की मार से दम तोड़ती पीली और बेहद कमज़ोर पड़ चुकी दिए की रौशनी में पलंग पर लेटे थे नए युग के वेदव्यास और उनके सिरहाने बैठी शिवरानी देवी उनके सर को सहला कर उनकी पलकों को कुछ देर झपक जाने के लिए मनाओन कर रही थीं । मुंशी जी का शरीर कुछ इस तरह का होगया था जैसे चार पांच दिन से लटके गुब्बारा हो जाता है, मानों जैसे सारे शरीर की हवा खींच कर पेट में भर दी गयी हो ।  पेट को छोड़ बाकि सारे शरीर से गोश्त गायब था, बस थी तो सिर्फ हड्डियों से चिपकी हुई सूखी चमड़ी । पेट फूल कर सख्त हो गया था । 
कमरे की उस पीली और कमज़ोर रौशनी को अंधेरे के साथ साथ उस कमरे में पसरे सन्नाटे की भी मार सहनी पड़ रही थी । हवा भी आज मानो रूठ गयी थी । कहीं कोई शोर ना था । सारी रात चर्र मर्र की आवाज़ करने वाला खिड़की का ढीला पड़ चुका पल्ला भी आज इतना उदास था कि एक बार भी आवाज़ नहीं निकाली थी उसने । शिवरानी देवी की आँखों में घर किये भय का आकार आज पहले के दिनों से भी विकराल था । भय इतना हावी हो चुका था उन पर कि उनके दिल धड़कनें भी बेआवाज़ ही धड़क रही थीं । 
तब सन्नाटे को पराजित करने का ज़िम्मा उठाया मुंशी जी की लंबी सांसों ने । शिवरानी देवी ने घबरा कर पूछा "आप ठीक हैं ?" 
"हूं ।" मुंशी जी ने इतना सा उत्तर ही दिया ।
"कुछ सोच रहे हैं ?"
"आज कल सोचने के सिवा और काम ही क्या है ।" 
"मत सोचिए, सब ठीक हो जाएगा ।" 'सब ठीक हो जाएगा' सुनकर मुंशी जी के सूखे होंठ पीड़ा की कोठरी से एक सूखी और बासी हंसी निकाल लाए । 
"सब ठीक हो जाएगा ? लेकिन कब शिवरानी ? अब तो अंतिम बेला आगयी । 'सब ठीक' हुए तो वर्षों बीत गये । सब ठीक हुआ करता था जब मैं चुपके से बेपरवाह सा माँ द्वारा छुपाये गुड़ का सफाया कर दिया करता था । पहले उस चोरी के गुड़ से मुंह मीठा होता और फिर माँ की डांट से मन मीठा हो जाता । मगर फिर माँ चली गयी और उसके बाद से कुछ ठीक ना रहा । उसके बाद ना मुंह मीठा हुआ ना मन । आज तक उस गुड़ और उस डांट का स्वाद दोबारा कभी ना चखने को मिला ।" बुदबुदाते बुदबुदाते मुंशी जी की सांस फूलने लगी । 
"आप निराश मत होईए, बहुत मान सम्मान और ख्याति पाई है आपने अपनी मेहनत से । आपको तो खुश होना चाहिए ।" शिवरानी देवी भी जानती थीं कि वह झूठा हौंसला दे रही हैं मुंशी जी को मगर उस वक्त उनके पास इस झूठे हौंसले के सिवा कुछ और था भी नहीं उन्हें देने को । 
"बात सिर्फ मुझ तक होती तो मैं संतोष कर भी लेता मगर यहाँ बात तुम्हारी है, हमारे बच्चों की है । मैं तुम सबको विरासत में क्या देकर जाऊंगा ? तुम जी जान से मेरी सेवा कर रही हो, मेरा मल साफ करती हो मेरी कै साफ करती हो, नहलाती धुलाती हो, खाना खिलाती हो । एक पत्नी के साथ साथ मेरी माँ बन गयी हो । इतना त्याग इतना बलिदान कर रही हो मेरे लिए और बदले में मैं तुम्हें क्या देकर जाऊंगा ? दोबारा विधवा बना जाऊंगा । तुम्हें तुम्हारे शेष जीवन के लिए एक भयावह सूनापन उपहार में देकर जाऊंगा ।" मुंशी जी के मन में दबी हुई आग अब लावा बन कर उनकी आँखों से बहने लगी थी । 
"मैं कल को जब मर जाऊंगा तो मेरे आस पास के लोग ही मुझे नहीं जानते होंगे । उन्हें पता ही नहीं होगा कि मैने हिंदी साहित्य के लिए क्या योगदान दिया । वे बस मुझे एक मास्टर समझेंगे । हाँ निःसंदेह आने वाले समय में मेरी कहानियों और उपन्यासों को प्रकाशित कर के कुछ प्रकाशक अपना पेट भरेंगे उसके बदले मुझे सम्मान दिया जाएगा, हिंदी साहित्य का भिष्म पितामह कहा जाएगा मगर उससे मुझे और मेरे परिवार को क्या मिलेगा ? उस ज़माने में मेरी कहानियाँ और उपन्यासों को पढ़ कर समाज पर आँसू बहाने के बाद मुझे नमन करने वाले क्या मेरे इस दर्द इस पीड़ा को महसूस कर पायेंगे जो मैं बच्चपन से अब तक सहता आया हूँ ? उस समय भारत आज़ाद हो गया होगा, मेरी प्रतिबंधित रचनाएं भी लोगों के बीच उपलब्ध होंगी, वे सब उन्हें पढ़ कर समाज और देश की बड़ी बड़ी बातें करेंगे मगर क्या वे जान सकेंगे कि इन्हें लिखने के लिए मुझे किस दौर किन यातनाओं और किस तरह के प्रतिबंधों से हो कर गुज़रना पड़ा ? क्या उन्हें समझ आएगी ये बात कि मैने सच को ज़िंदा रखने के लिए अपने माता पिता द्वारा दिया नाम तक बदल दिया ? नहीं शिवरानी ये कोई नहीं समझेगा । सिर्फ और सिर्फ मेरी कहानियाँ मनोरंजन के लिए पढ़ी जाएंगी । वो ऐसा वक्त होगा जब मुंशी वंशीधर जैसे ईमानदार कर्मचारी तो इक्क दुक्का मिल जाएंगे मगर पंडित अलोपीदीन जैसा कोई ईमानदारी को पहचानने वाला बेईमान नहीं मिलेगा । उस रोज़ भी कोई ना कोई हल्कु कंबल के बिना पूस रात में तड़पेगा । तब भी पेट की आग को बुझाने वाले आलुओं के आगे लोगों को किसी के जीवन की कीमत शून्य लगेगी । तब ना जाने हामिद अपनी दादी के लिए मेले से चिमटा लाएगा या सारे पैसे ऐय्याशी में उड़ा देगा । शिवरानी मैं सोचता हूँ मैने अपनी रचनाओं के रूप में आने वाले समाज को अपने हाथों की परवाह किये बिना उन्हें तराश कर एक आईना तो भेंट कर दिया मगर क्या वे इसका फायदा उठा पाएंगे ? क्या वे इस आईने में वो देख पाएंगे जो मैं उन्हें दिखाना चाहता हूँ ? नहीं वे बस इस आईने की बनावट देख कर वाह वाह कर के चलते बनेंगे । मैं ना चाह कर भी भयभीत हो जाता हूँ ये सोच कर कि ये आने वाला कल कहीं आज से भी भयावह ना हो जाए ।" शिवरानी देवी ने मुंशी जी के मन में दबी आग को उनकी आँखों और बातों से बह जाने दिया । 
"हो सकता है तब किसी विशेष कलमकार को लोग मेरे नाम से संबोधित कर के उसका सम्मान करें मगर मैं प्रार्थना करता हूँ उस ईश्वर से कि वो फिर से कोई मुंशी प्रेमचंद ना गढ़े । भविष्य में कलम के जो सिपाही हों वो मुझ से कहीं ज़्यादा बेहतर हों मगर कोई मुंशी प्रेमचंद बन कर वो सब ना झेले जो मुझे झेलना पड़ा । मुंशी प्रेमचंद की तरह किसी की कलम को जंज़ीरें ना पहनी पड़ें, किसी को मेरी तरह प्रेम के लिए ना तरसना पड़े, किसी को अपनी अथाह पीड़ा को लिखने के लिए कागज़ और कलम की मिन्नतें ना करनी पड़ें, जो जिस लायक हो उसे उसके जीवन में उसी लायक सम्मान दे दिया जाए,किसी को मरने के बाद महान ना बनाया जाए । मुंशी प्रेमचंद होना बेहद कष्टदायक है शिवरानी । ऐसा कष्ट ईश्वर किसी कलमकार को ना दे ।" मुंशी जी अपने अंतिम बोल के साथ ही फूट फूट कर रो पड़े ।
"मनुष्य अपने कर्म का भागीदार होता है । आपने अपना कर्म कर दिया अब निश्चिंत हो जाईए । आपने जो धरोहर आने वाले कल के लिए संजो कर रख दी है उसका इस्तेमाल वे अपने हिसाब से कर लेंगे । वो उनका कर्म होगा । अब आप सो जाईए ।" इतना कह कर शिवरानी देवी उन्हें चुप कराते हुए उनके माथे से पैर की तरफ आगयीं तथा उनके पैर के तलुओं की मालिश करने लगीं । मुंशी जी शीवरानी देवी के धैर्य और सहनशीलता से आनन्दित हो उठे । एक ही क्षण में सारी चिंता और भय दूर भाग गया । उस रात वह काफी दिनों बाद चैन से सोये । 
सुबह उठे और कुल्ला करने बैठे तो सारा शरीर अकड़ गया । मानों जैसे मन की आग के लावा बन कर बह जाने के बाद मन खोखला हो गया हो । मुंह का कुल्ला मुंह में ही रह गया और हिंदी साहित्य के भीष्म पितामह इस निर्मोही जगत को अलवीदा कह गये । 
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 लाखों हिंदी पाठकों और लेखकों की तरह आप मेरे भी पहले गुरू हैं । पढ़ने और पढ़ कर फिर लिखने की चाह आपने ही हम सब में जगाई है । मैं हर संभव प्रयास करूंगा कि गुरू दक्षिणा के रूप में आपको कुछ ऐसा भेंट करूं जिसकी कल्पना आपने उन दिनों कल के लिए देखे गये सपने के रूप में की हो । 
मुंशी प्रेमचंद जी की 137वीं जयंती पर उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजली व शत् शत् नमन ।


धीरज झा

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वो आखरी रात
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