आखरी निशानी

#आखरी_निशानी (कहानी) "अम्मा कर्जा बड़ा ढेर है, नहीं जाएंगे तो सधेगा नहीं ।" अपने खराब ज़िप वाले बैग के खुले हुए मुंह को सिप्टीपिन्न...

#आखरी_निशानी (कहानी)
"अम्मा कर्जा बड़ा ढेर है, नहीं जाएंगे तो सधेगा नहीं ।" अपने खराब ज़िप वाले बैग के खुले हुए मुंह को सिप्टीपिन्न से बंद करने की कोशिश करता हुआ शिवचरन दरवाजे पर बैठी अपनी माँ से बोला 
"इहें कोनो धंधा कर ले न, सीला बहीन के बेटा भी तो किराना के दोकान से अपना जीवन चलाईए रहा है । तोहर देह दिन पर दिन गलल जा रहा है, हमको डर लगता है । बहुत बड़का दुःख भगवान दे दिये हमको अब हिम्मत नहीं कि कोनो और धुःख सह सकें ।" जिस तरह बांस की बल्लियों ने उसके घर की छत को भगवान भरोसे संभाल रखा था उसी तरह उसकी माँ ने अपने आँसुओं को रोक रखा था, वेदना की तेज आँधी कब उन आँसुओं को धड़ाक से गिरा दे कोई पता नहीं । 
"अम्मा ऊ के सर पर कोनो कर्जा नहीं है । ऊपर से निरंजन कका कलकत्ता कमाए हैं बीस बरस, अकेला लड़का है, दुकान ना भी चले तो जिंदगी काट लेगा मजे से । मगर हमको पूरा परिवार का देखना है, सब कहते हैं समय बड़ा तेज होता है मगर गरीब की लड़की की उम्र समय के मुकाबले दुगना तेजी से बढ़ती है । चार पांच साल में मुनमुनिया शादी लायक हो जाएगी । ई रोहना को का अपना जईसे तारकोल फैक्ट्री में खटाएंगे का ? इसको पढ़ाना है, अच्छा नौकरी दिलाना है । ऊपर से बाबू के बिमारी में लिया गया कर्जा का ब्याज अनाधुन भागता चला जा रहा है । हमको तुम्हे छोड़ के जाने का रत्ती मन नहीं करता माई, मगर हम बईठ गये ना तो घर बईठ जाएगा । अच्छा होगा तुम खुसी खुसी असिर्बाद दे के बिदा करो हमको ।" माँ के पास घुटनों के बल बैठे बैठे माँ के हाथों को प्यार से दबाते हुए शिवचरन ने माँ को समझाया । 
"बेटा ऊ टीला पर वाला खेत बेच.....।"
"बस माँ केतना बेर समझाये हैं ऊ बाबू का आखरी निसानी है ओकरा के नहीं बेचेंगे चाहे जो मर्जी हो जाए ।" माँ की बात को बीच में से ही काटते हुए शिवचरन गरज कर बोला । उसके बाद माँ एक दम चुप हो गयी । लाख पहरों के बाद भी दो आँसू आँखों की कैद से छूट भागने में कामयाब हुये । 
शीवचरन के पिता पंचदेव शुक्ला अपने गाँव के पुरहित थे । सारे गाँव सहीत आस पास के अधिकतर गाँवों का जजिमनका उनका ही था । जितनी मधुर उनकी बोली थी उतने ही वो ज्ञानी थे । गाँव में आये दिन झगड़े फसाद होते रहते थे मगर मजाल है आज तक शुक्ला जी की किसी से बहस भी हुआ हो । भगवान को लोग कोस देते थे मगर शुक्ला जी को पीठ पीछे भी बुरा कहने वाला कोई नहीं था । उनके स्वभाव और बोली की मधुरता ने पूरे गाँव के लोगों का मन मोह लिया था । मगर बड़े बुजुर्ग कहते हैं अच्छे लोग भगभाव को इतने प्रिय होते हैं कि बहुत जल्दी भगवान उन्हें अपने पास बुला लेता है । स्वभाव और बोली की मधुरता शायद इतनी बढ़ गई थी कि मधुमेह की बिमारी प्रभु का उन्हें अपने पास बुलाने का संदेश बन कर आई और दो महीने की मानमनावन के बाद उन्हें अपने साथ ले गई । 
उनके जाने के बाद पीछे छूट गये उनके तीन बच्चे, बीवी और उनके दिये संस्कार । दो महीने की दवा दारू और इलाज ने उनकी सारी जमा पूंजी तो लुटी ही साथ ही साथ हजारों का कर्जा भी चढ़ गया । पंद्रह का था शिवचरण जब शुक्ला जी गुज़रे । ये छोटी उम्र का लड़का इसी उम्र में घर का बड़ा मर्द बन गया । परिस्थिती इतनी विकट हो गई कि दसवीं करते ही दूर देस में फैक्ट्री पकड़नी पड़ी । 
साल भर बाद आता था शिवचरण घर और माँ साल भर उसकी राह ताकती रहती । उसका ज़रा भी मन नहीं था कि उसका वो बेटा जो मान मनौती से जन्मा था उसे छोड़ कर उससे इतना दूर जाए जहाँ से वो उसकी खोज खबर भी ना ले सके । मगर मजबूरी इंसान से क्या कुछ नहीं करवाती । 
आज सुबह शिवचरन चेन्नई के लिए निकल गया । जाते हुए माँ के बहते आँसुओं को बच्चपन में ही सख्त हो चुके हाथों से पोंछते हुए कह गया कि " माँ, अब थोड़ा ही कर्जा बाकी रह गया है । इस बार कर्जा खतम कर के थोड़ा अधिक पईसा जोड़ लाएंगे आ यहीं कोई धंधा करेंगे । नहीं जाएंगे तुमको छोड़ कर देर ।" माँ उसकी इसी बात के सहारे खुद को एक साल और उससे दूर रहने के लिए मजबूत करने लगी । 
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छः महीने बीत गये शिवचरण को चेन्नई आए हुए । उसने तारकोल में अपनी मेहनत का पसीना मिला कर इतना धन इकट्ठा कर लिया था जिससे वो कर्जा मुक्त हो सके । अब उसे बाकि का पैसा जमा करना था जो गाँव में ही कोई काम धंधा खोलने के काम आ सके जिससे उसे अपनी माँ से फिर दूर ना जाना पड़े । मगर नियती कुछ और ही चाहती थी । सुबह जब वह नहा धो कर खुद को उस तारकोल की फैक्ट्री में।झुलसाने पहुंचा तो कलर्क ने आकर उसके नाम से आया टेलीग्राम दिया जिस पर लिखा था "खेत पर कब्जा हो गया है, जल्दी घर आना ।" 
खेत जो उसके पिता की आखरी निशानी थी, जिसे उसने अपने सबसे कठिन समय में भी बेचने का ना सोचा उस पर किसी द्वारा कब्जे की बात सुन कर वह भट्ठी की तरह जलने लगा । बिना मशीन पर चढ़े वह उल्टे पाँव अपने क्वाटर में लौट आया और बिना किसी को बताये अपना सामन बांध गाँव के लिए निकल गया । 
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इधर माँ अपने आपको तैयार कर रही थी कि कैसे उसके गुस्से को शांत करेगी । उसे पता था उसका बेटा बहुत शांत है मगर अपने पिता की आखरी निशानी को बचाने के लिए वो किसी भी हद तक जा सकता है । वह चौखट पर बैठी शिवचरण की राह देख रही थी । शाम होते होते  शिवचरण घर पहुंच गया । सूरज आज बादलों के बीच से होता हुआ छुपते छुपाते आसमान की गोद में ऐसे समा रहा था मानों उसे आज शिवचरण के अंदर की आग के आगे अपनी ज्वलनशीता के कमज़ोर पड़ जाने का भय सता रहा हो । शाम का रंग भी आज रक्त समान लाल था मानों शिवचरण की आँखों में उतरा लहू बहते हुए पूरे वातावरण में पसर गया हो । 
"उसे एतना हिम्मत मिला कहाँ से जो वो हमारे खेत पर चढ़ गया ।" शिवचरण गरजते हुए बोला । 
"बेटा, गाड़ी का मारा आया है, थक गया होगा । पानी पी ले थोड़ा सुस्ता ले फेर ई सब बात करना ।" माँ ने समझाने की कोशिश की । 
"अब कईसा आराम माँ, अब तो उसका खेन कर के ही आराम करेंगे ।" आज शिवचरण का गुस्सा दईब के कहने से भी थमने वाला नहीं था । वो आँखों में आग लिए घर से निकला । 
उसने पता लगाया कि एक मलाह ने उसकी ज़मीन पर कब्जा कर लिया है जिसके पास खेत के नकली कागज़ हैं । उसने नकली को इतना असली बनाया है कि शिवचरण के सही कागज़ उसके सामने झूठ लगने लगे । आपा खो कर जब शिवचरण ने उस मल्लाह से हाथा पाई की तो गाँव के लोगों ने यह कह कर छुड़ा दिया कि इसे मारने से क्या होगा आप सही कागज़ दिखा कर इसे झूठा साबित कर दीजिए । शिवचरण को सच्चा हो कर भी झूठ के आगे चुप होना पड़ा । उस दिन से शिवचरण अपने खेत के कागज़ों की खोज बीपन में जुट गया । हर दफ्तर हर अधिकारी से मिलने के बाद , हर बड़े बुजुर्ग से सलाह और सहानुभूती पाने के बाद आखिर में फैसला आया कि 'सच पराजित हो चुका है और झूठ की बैठे बिठाए विजय हुई है । अगर तुम्हें अपना खेत चाहिए तो अपने ही खेत पर सालों साल केस लड़ो और अपनी आधी ज़िंदगी इस खेत के नाम पर बर्बाद कर दो ।'
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"खाना खा ले बेटा ।" निराश मन के साथ पटकुनिए लेटे हुए शिवचरण का सर सहलाती हुई माँ बोली ।
"भूख नहीं है माँ ।" बारिश के बाद मिट्टी जैसे भारी हो जाती है उसी तरह भारी आवाज़ के साथ शिवचरण बोला । 
माँ कुछ देर उसका सर सहलाती रही । धीरे धीरे शिवचरण ने अपना सर माँ की गोद में रख दिया और रूंधी हुई आवाज़ में बोला "हम क्या करें माँ ? पिता जी की आखरी निशानी कोई हमसे छीन रहा है, हम कैसे उसे बचाएं । माँ हम उसके बाले बच्चे का खून कर देंगे । कोनो रहबे ना करेगा तो उस जमीन को भोगेगा कोन ।" एकाएक ही उसकी आवाज़ में एक अजीब सी हैवानियत झलक आई थी । 
"बेटा, तू सयाना हो गया है, अच्छा बुरा सब जानता है, मैं तुझे समझाऊं ये सही न है । मगर एक बात जरूर कहूंगी, सम्पत्ति कभी किसी की निशानी नहीं हो सकता, क्योंकि यह चंचल है । मेरे पास तोहर पिता की निशानियाँ हैं और वो हो तुम तीनों । हम सबके लिए हम सब ही उनकी निशानियाँ हैं । माँ भगवती तुम लोग को निरोग काया आ तुमारी मेहनत की कभाई में बरकत दे तुम तो अईसा अईसा कितना खेत खरीद लोगे । और गुस्सा में।अगर उसको कुछ करते देते।हो तो उससे क्या होगा ? ना जमीन अपना होगा और ऊपर से तुम भी जेल चले जाओगे । तुमारे पिता जी को खोना ही हमारे लिए सबसे बड़ा दुःख था अब तुमको भी खो दें तो फिर हम कईसे जीएंगे बेटा । जाने दो, जो अपने करम का नहीं होता वो किसी कीमत पर हमको नहीं मिलता और जो हमारा है वो किसी कीमत पर हमसे देर नहीं रह सकता ।" शिवचरण खौलते लावे से कब शीतल जल हो गया उसे पता ही ना चला । वो बस एक टक माँ को देखे जा रहा था । पिता जी को गये इतना वक्त हो गया था मगर शिवचरण को आज अहसास हुआ कि पिता जी गये नहीं वो तो माँ में ही थे । 
"कहाँ से लाती हो एतना हिम्मत माँ ।" आँसुओं वाली गीली मुस्कुराहट के साथ माँ का चेहरा निहारते हुए शिवचरण बोला ।
"डर एक बार लगता है पर जब बार बार वही डर सामने आता है तो उसका सामना करना बहुत आसान हो जाता है । अब इतना सह लिया है कि हिम्मत अपने आप आ गया है बेटा ।" माँ भी मुस्कुरा दी । माँ के अंदर की हिम्मत अब शिवचरण की आँखों में दिख रही थी ।
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माँ।की बातों ने अकेले शिवचरण को ही नहीं बल्कि कोने में सुबुक रहे सच को भी हिम्मत दी थी । सच भी ये सोच कर मुस्कुरा रहा था कि मेरी हद कोई इस सम्पत्ति तक ही थोड़े ना सीमित थी । मैं तो जीवन के हर क्षण लड़ने के लिए ही जन्मा हूँ । मुझे लड़ते रहना है, झूठ भले मुझे आज कमज़ोर साबित कर दे मगर एक दिन आएगा जब उसे अहसास होगा कि वो हर बार जीत कर भी हारता रहा और मैं हार कर भी लड़ता रहा । और झूठ की यही सोच ही मेरी विजय होगी जो सुनिश्चित है, अटल है । 
धीरज झा

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