#जब_मेरे_घर_इनकम_टेक्स_की_रेड_पड़ी

#जब_मेरे_घर_इनकम_टेक्स_की_रेड_पड़ी  हाथ में चाकू छुरी ले कर बैठा ही था कि इतने में दरवाज़े की घंटी बजी । भाई उठा और जा कर मेनगेट खोला । गया त...

#जब_मेरे_घर_इनकम_टेक्स_की_रेड_पड़ी 
हाथ में चाकू छुरी ले कर बैठा ही था कि इतने में दरवाज़े की घंटी बजी । भाई उठा और जा कर मेनगेट खोला । गया तो वो अकेला था मगर लौटते वक्त साथ में कई जूतों की फट फट करती आवाज़ कानों में पड़ी तो मेरी नज़र कौतुहल वष कमरे के दरवाज़े पर टिक गयी । 
मन के कौतुहल को शांत होने के लिए ज़्यादा इंतज़ार ना करना पड़ा क्योंकि अगले ही पल कमरे के सामने चार अफ़सर टाईप लोग खड़े थे । वे सभी सुटेड बुटेड थे । उनमें से एक जिसने ब्लैक पैंट और ब्लू शर्ट के उपर से काला कोट और आँखों पर महंगा चश्मा लगा रखा था, मेरी तरफ बढ़ते हुए सवालिया अंदाज़ में कहा "मिस्टर धीरज झा ?" 
"जी मैं ही हूँ, पर आप लोग ?" 
"माई सेल्फ जगमोहन दास, एंड आई एम फ्राम इनकम टेक्स डिपार्टमेंट । आपके घर इनकम टेक्स की रेड पड़ी है ।" इतना कहते हुए उन्होंने मेरी तरफ एक कागज़ बढ़ा दिया । वैसे तो मुझे ये सोच कर खुशी से झूम उठना चाहिए था कि मुझ फटेहाल देहाड़ी लेखक के घर इनकमटेक्स की रेड पड़ी है । अब ये समाज मुझे भी अमीरों की श्रेणी में रख लेगा । मगर मैं अचानक से सब कुछ हो जाने की वजह से खुश होना भूल कर हैरान परेशान हो गया । 
थोड़ी बातचीत के बाद बाकि के तीन अफसर जैसी रूपरेखा वाले लोग घर तलाशने लगे । वे सब बगल वाले कमरे में पड़ी गोदरेज की तरफ बढ़ने ही वाले थे कि इतने में जगमोहन दास जो उनका हेड था ने उन्हें रोका और उनसे कहा "बेकार में वक्त बरबाद करने से कोई फायदा नहीं, मैं जानता हूँ हमारे काम की चीज़ कहाँ मिलेगी ।" 
इतना कह कर जगमोहन दास खुद उठ खड़े हुए और किचन की तरफ बढ़े । कुछ ही पल में वे फ्रिज के पास थे और उसे ग़ौर से देख रहे थे । मैं अब बुरी तरह डर गया था मुझे लगा कि शायद परसो जो नया फ्रिज लिया है उसके कारण कहीं पकड़ ना लिया जाऊं । मगर मेरे अंदाज़े को गलत साबित करते हुए जगमोहन दास ने फ्रिज खोला और दो चार मिनट इधर उधर ढूंढने के बाद फ्रिज से एक थैली निकाली । उस थैली के मिलते ही जगमोहन दास के चेहरे पर जीत वाली मुस्कुराहट ऐसे फैल गयी जैसे फूटते ही अंडा पैन में फैल जाता है । 
"इसे जब्त कर लो ।" थैली को बाकि अफसरों को पकड़ाते हुए जगमोहन दास ने कहा ।
"अब बताईए मिस्टर धीरज आपके घर में ये छः टमाटर और चार शिमला मिर्च कहाँ से आये । जैसा कि हम जानते हैं आप एक गुमनाम से फटेहाल लेखक हैं फिर आपने इस बेशकीमती टमाटर और शीमलामीर्च के लिए इतना काला धन कहाँ से जुटाया ?" उनकी बात खत्म होते ही सन्नाटे ने कमरे को दसों दिशाओं से घेर लिया । 
कुछ देर सोचने के बाद मैं उठा और कबर्ड से पेपर्स ला कर उन्हें दिखाते हुए बोला "तीन महीने से टमाटर का एक टुकड़ा नहीं खाया था सर, जब बर्दाश्त ना हुआ तो कुछ दिनों पहले हमने मैगी बनाने का प्लाॅन किया और उसी प्लाॅन को पूरा करने के लिए कई दिनों की मेहनत और भाग दौड़ के बाद बैंक से लोन ले कर आज टमाटर वाली मैगी खाने के सपने को साकार करने जा रहे थे कि इतने में आप आ गये ।" बोलते बोलते मेरा सारा दर्द मेरी आँखों से बहने लगा ।
मेरी बातों ने जगमोहन दास समेत बाकि तीनों के मन पर भी गहरा असर छोड़ा और इसी के साथ ही जगमोहन दास भी टूट कर बिखरते हुए अपनी भर्रायी हुई आवाज़ में बोले "मिस्टर धीरज, हम लोगों का भी यही हाल है । डिपार्टमेंट की नज़र हर वक्त हम पर रहती है कि कहीं हम घूस में टमाटर ना ले लें । अगर आप हम पर इतनी दया कर दें कि टमाटर वाली मैगी में से चार चार चम्मच हमें भी दे दें तो हमारी तड़पती आत्माएं आपको लाखों दुआएं देंगी ।" मैं इस पक्ष में बिल्कुल भी नहीं था मगर मेरा कोमल मन उनके गर्म आँसू की वजह से झट पिघल गया । 
कुछ देर पहले चारों को मैगी जिसमें एक एक टमाटर  का टुकड़ा था खिला कर भेजा है । दुआएं देते हुए गये हैं । 
"प्राणप्यारी तुम अपने पिता जी को समझाना कि मैं इन दिनों में अगर टमाटर खा सकने की हिम्मत रखता हूँ तो क्या तुम्हें कभी कोई कमी आने दूंगा । हाँ मगर उन्हें ये ना बताना कि टमाटर लोन पर लाया था । कहना इतनी कमाई है कि रोज़ एक टमाटर खिला सकता है लड़का ।
नोट - घटना पूर्णतहः सत्य है टमाटर के बढ़े हुए दाम की कसम । 
धीरज झा

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