कृष्णा, के नाम पत्र

कृष्णा, आपके लिए पत्र लिखा है, पढ़ ज़रूर लेना हे कृष्ण वैसे तो मुझे उसी तरह इस बात का पूर्ण विश्वास है कि आप पूर्णतः ठीक होंगे जिस तरह मुझे ...

कृष्णा, आपके लिए पत्र लिखा है, पढ़ ज़रूर लेना
हे कृष्ण
वैसे तो मुझे उसी तरह इस बात का पूर्ण विश्वास है कि आप पूर्णतः ठीक होंगे जिस तरह मुझे आपके अस्तित्व पर, महादेव की कृपा पर और अपनी माँ के मातृत्व पर हमेशा विश्वास रहता है मगर फिर भी औपचारिक्ता निभाना भी तो कोई चीज़ होती है ना । बड़े दिन हुए आपसे भेंट नहीं हुई तो सोचा इस आनंदमय अवसर पर आपको एक पत्र लिख कर वो बातें सांझा करूं जो साथ रहते कभी ना कह पाया । 
प्रभु ने भी मनुष्य नाम का बड़ा विचित्र फ्राणी बनाया है, ये कभी भी उसका मोल नहीं जान पाता जो साथ रहता है और उसके बिछड़ते ही उसे उसके अनमोल होने का आभास होने लगता है और फिर बिना कारण दुःखी होता रहता है । ख़ैर ये सब मैं आपको क्यों बता रहा हूँ, आप तो खुद सर्वज्ञाता हैं तो अच्छा होगा आपको इधर उधर से बटोरा हुआ छुटपुटिया ज्ञान देने बजाय वो कहूँ जिस कारण मैने पत्र लिखा । 
हे कृष्ण, आदर मैं आपका उतना ही करता हूँ जितना महादेव का, ना एक मिसिया ज़्यादा ना एक मिसिया कम । मैं जानता हूँ आप श्री हरि के तेईस अवतारों में पूर्ण अवतार हैं ठीक उसी तरह जिस तरह प्रभु श्री राम हैं । मगर एक बात साफ़ कहूँगा कि मैं आपको भगवान नहीं मानता । मेरे मन में आपके प्रति रत्ती बराबर भी भगवान या ईश्वर वाली भावना नहीं है । मुस्कुराईए मत सुन लीजिए फिर फैसला करिएगा कि मेरी बात बच्चकानी है या सयानी । 
बहुत छोटा था जब आपसे मिला था । मुझे तो याद भी नहीं, माँ ही बताती हैं कि अपनी पहली जन्माष्टमी जो आपके साथ मनाई थी तब आपको बहुत तंग किया था । सब ने आपको खूब अच्छे से सजा कर पालने में रख दिया था । उस चमचमाती चाँदी की मूर्ति में आपका रूप बड़ा खिल रहा था । आस पास गुब्बारे लगा दिये थे सब ने । हर कोई आता था आपको बड़े प्यार से झुलाता था, बड़ी श्रद्धा से माथा टेकता था । मगर मैं अधर्मी जिससे आपकी पूछ और सबका आपके प्रति प्रेम देखा नहीं जा रहा था, जाता था और पालने को खूब जोर से हिला कर आपको गिरा देता था । माँ आती थीं, प्यार से, थप्पड़ दिखा कर, आँखें तरेर कर हर तरह से समझाती थी कि मत कर ऐसा वो भगवान जी हैं उन्हें तंग नहीं करते मगर मैं तो अबोध था, कहाँ समझने वाला था माँ की डांट मैं फिर से आपको गिरा देता था । 
फिर मेरी नज़र आपकी बांसुरी पर पड़ी थी और मैने वो बांसुरी ले कर मुंह में लगा ली । माँ फिर दौड़ी थी मुझे डांटते हुए मगर मैं आपकी बांसुरी बजाने की नाकाम कोशिश में मग्न था । माँ ने चार बार आपकी बांसुरी धोई थी और मैने पाँच बार उसे फिर से मुंह लगा लिया था । अंत में हार कर माँ मुस्कुरा दी थी और आप तो शुरू से ही मुस्कुराते आ रहे थे । भला क्यों ना मुस्कुराते, आप तो नटखटों के सरदार रहे हैं । 
मंदिर में स्थापित आपकी वो प्रतिमा जिसमें आप बड़े लग रहे हैं मगर वो नटखटपन वो मासूमियत वो बच्चपना आपके उस स्वरूप में भी उसी तरह झलक रहा है जिस तरह उस छोटी बच्चपन वाली मूर्ति में झलकता है । आपको देख देख मैं भी बड़ा होने लगा । मैं किसी बात से परेशान हो कर आपके मंदिर के सामने वाले बरामदे में मुंह लटकाये बैठा रहता था और आप हमेशा मुस्कुराते रहते थे । मैं जितना परेशान होता था आप उतना ही मुस्कुराते प्रतीत होते थे । मगर मेरी परेशानी को हल करने का रास्ता भी तो आप ही ढूंढते थे । 
आपको याद है, मैं जब पहली बार प्रेम का अहसास बटोरे आपके पास आया था और शर्माते हुए सारी बात बताई थी ? कितना हँसे थे ना आप, आपकी मुस्कुराहट गहरी होती साफ़ दिख रही थी तब । राधा रानी आपको कनखियों से चुप रहने का ईशारा कर रही थीं मगर आपको तो मुझे चिढ़ाने में ही मज़ा आता है । लगा था जैसे आप कह रहे हैं कि "बेटा अभी नौवीं कक्षा में पढ़ते हो । ज़्यादा उड़ो मत पर कतरे जाएंगे ।" मैं बहुत गुस्सा हुआ था आपसे मगर जब मेरे ही प्रेम ने उसके प्रति मेरे प्रेम की धज्जियाँ उड़ा कर अपने पिता जी को फारी बात बताने की धमकी दी थी तो भागता।हुआ आया था आपके पास और कान पकड़ कर कहा था कि कृष्णा इस बार गिरने से बचा लो, अब नहीं उड़ूंगा और आपने मुझे बचा भी लिया था । जानते हैं अपने उस अहसास के बारे में पहले ले मैं महादेव को बताने गया था मगर उनका लाल तमतमाया हुआ मुख देख चुप चाप लौट आया और आपको आकर शर्माते हुए सारी बात बता दी । इसीलिए तो कहता हूँ कि आपको भगवान नहीं मानता । भगवान से सही गलत ऊंच नींच का डर लगता है मगर आपसे नहीं । जैसे आप विष्णु अवतार हैं वैसे ही मुझे लगता है कि आपके ही अंग का कोई हिस्सा हूँ मैं, भले ही आपके घने केशों में से ही एक मगर हूँ आपसे ही जुड़ा हुआ । 
हमेशा आप पहले मुस्कुराए हैं और फिर मेरी सहायता भी की है । हाँ सच याद आया कृष्णा, माँ की तरफ से मुझे माफी माँगनी है आपसे । जानता हूँ उसने मन ही मन माँग ली होगी और आपने मन ही मन कबा होगा कि माफी जैसा कुछ था ही नहीं । पापा जा रहे थे और माँ कैसे आपको बोल रही थी ना । उसका गुस्सा भी तो जायज़ ही था । भला कोई तीस साल की सेवा के बदले अपने सबसे प्रिय की जान भी आपसे नहीं माँग सकती ? वो कितना चिल्ला रही थी ना आपको अपनी पीड़ा सुना सुना कर । कृष्णा उस दिन पहली बार मैने आपका मलीन मुख देखा था । मुझे लगा कि कहीं मर्यादा ना टूट जाये आपके पलकों पर पड़े आँसू कहीं आपके नयनों का साथ ना छोड़ दें । मुख मलीन होता भी कैसे ना तीस साल आपकी सेवा करने वाला वो पुजारी आपको छोड़े जा रहा था जिसने आपके साथ हमेशा ऐसे बर्ताव किया जैसे आप उनके साथ हों, उनके सामने हों । आपके सामने रोये भी, आपसे गुस्सा भी हुये, आपको मनाया भी । मैं समझ ही नहीं पाता था कि कई बार वो बहुत ज़्यादा परेशान होने पर घंटों आपके सिरहाने क्यों बैठे रहते थे । मैने जब जब पिता जी से पूछा उन्होंने हंस कर टाल दिया मगर अब मैं समझता हूँ कि वो क्या करते थे । 
अभी भी जब मैं अपने प्रेम को पाने के लिए तड़प कर आपको याद करता हूँ और कहता हूँ कि "आप तो प्रेम को सबसे ज़्यादा समझते हैं, फिर क्यों हम दोनों की दशा पर केवल मुस्कुरा कर रह जाते हैं ?" तब लगता।है जैसे आप राधा रानी की तरफ़ इशारा कर के कहते हो कि "प्रेम पा लेने की वस्तु नहीं प्रेम तो जी लेने का नाम है । तुम प्रेम को जी कर देखो फिर हर वक्त उसे अपने पास ही पाओगे, जीवन के बाद भी वो तुमारे साथ रहेगा । मुझे और राधा को ही देख लो ।" 
मगर कृष्णा मैं भी इस पर यह साफ़ कर दूँ कि मुझ में आप जैसी सहनशक्ति नहीं है । आपकी तरह त्याग मुझ में नहीं । राधा को ना पा सकने की जितनी पीड़ा राधा रानी को हुई उससे ज़्यादा आपने सही मगर फिर भी त्याग उनका ही बड़ा माना गया । किसी ने आपने मन की वेदना को तो नहीं जाना । आपकी तरह मुझमें सबकी बातें सुन कर मुस्कुराते रहने का साहस नहीं । लोग आपकी रानियों और पटरानियों की संख्या गिनवाते हैं मगर कोई ये महसूस नहीं करता कि बंट जाना आसान नहीं होता और वो भी हज़ारों के बीच । किस लिये ? सिर्फ और सिर्फ सबकी खुशी के लिए । हिर्फ इसलिये कि समाज में उन्हें निरादर ना सहना पड़े । किसी एक का हो कर रह जाना कठिन नहीं मगर हज़ारों में बंट कर सिर्फ राधा का हो कर रह जाना कठिन है और यह सिर्फ कृष्णा ही कर सकते हैं । 
बहुत भावुक हो गया कृष्णा और आप तो मुस्कुराते ही रहे हमेशा की तरह । चलो अब चलता हूँ । कहना तो बहुत कुछ है मगर सब कुछ मैं कह दूँगा तो आप महसूस कैसे करेंगे वो जो अनकहा रहना चाहिए । आखिर में फिर कहता हूँ, आप मेरे भगवान नहीं हैं, आप तो मेरे मित्र हैं, गुरू हैं, मार्गदर्शक हैं, आप आराध्य हैं मेरे मगर भगवान नहीं । आपके सामपे रो सकता हूँ, हँस सकता हूँ।अपने मन की कोई भी बात कोई भी दुविधा आपको निसंकोच कह सकता हूँ । आपको भगवान बनाकर मैं अपना ये अधिकार खोना नहीं चाहता । 
जन्मदिन की हार्दिक शुभकाभनाएं मेरे कृष्णा । बस यही माँगूँगा कि भले ही  रूठ जाना मैं मना लूंगा, बुरा लगे तो डांट भी देना, बुरा करूं तो सज़ा भी देना मगर खुद को कभी मुझ से विमुख ना होने देना । भले ही अपना अंश भर ही सही मगर मेरी आत्मा में समाहित ज़रूर रहना । 
जय श्री कृष्णा 
आपका 
धीरज झा 

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