जितिया (कहानी बदलाव की)

#जितिया (कहानी बदलाव की ) "लत्ती सी लतरती जा रही है, अब इसका बिआह कर दो, या समय हाथ से निकल जाने के बाद सारी उमर पछताने का मन बना लिये ...

#जितिया (कहानी बदलाव की )
"लत्ती सी लतरती जा रही है, अब इसका बिआह कर दो, या समय हाथ से निकल जाने के बाद सारी उमर पछताने का मन बना लिये हो ।" नये चूल्हे को लेपती चंपा ने अपनी नई चूड़ियों की खनक से उठ रहे संगीत में अपने कर्कश स्वरों के साथ वही पुराना अलाप छेड़ा था । किसी उबाऊ संगीत कार्यक्रम में मित्र के साथ ज़बरदस्ती ले आए गये आदमी की तरह मोहन जी ने भी जम्हाई भर कर उन कर्कश स्वरों को हमेशा की तरह कान के बगल से गुज़र जाने दिया । 
चार साल पहले जब कुसुम नौ की थी तब से चंपा को लतरती हुई दिख रही है । खुद बाईस की उम्र में मोहन जी के साथी दुत्ती ब्याह की और तब भी अपनी अम्मा से लिपट कर रोते हुए कहती थी "अम्मा इतनी जल्दी क्या पड़ी थी, काहे हमको बाली उमर में पराया कर रही हो ?" और इधर पंद्रह की कुसुम इन्हें बोझ लगने लगी थी । इधर कुसुम पिता का मुंह देख कर चंपा के प्रति एक बेटी का फर्ज़ निभाते नहीं थकती और दूसरी तरफ चंपा सौतेली माँ होने का पूरा फर्ज़ निभा रही थी । चंपा का बस चलता तो वो छोटी सी कुसुम को उसी साल घर से विदा करवा देती जब वो इस घर में आई थी । 
मोहन जी की पहली पत्नी को टी बी की बिमारी अपनी संगबहिना बना कर साथ ले गयी । सबने बहुत कहा कि उन्नतिस की उम्र से  अकेले एक बच्ची की परवरिश करते हुए बाक़ी की उम्र काटना बहुत कठिन होगा इसीलिए शादी कर लेने में ही भलाई है । अपनी पहली पत्नी से अथाह प्रेम के कारण यह फैसला किये कि अब शादी नहीं करेंगे । यही सोच कर एक साल तो पिता के साथ साथ माता का किरदार भी खूब निभाये मोहन बाबू  मगर एक साल में वो गत्त हुई कि शरीर आधा रह गया । फिर मन ही मन सोचे कि अगर यही हाल रहा तो हम ही ना रहेंगे फिर कुसुम को कौन देखेगा । यही सोच उन्हें कर दूसरी शादी का फैसला लेना ही पड़ा । 
मस्त मलंग आदमी थे मोहन जी, कचहरी में सब का मन बहलाए रखते थे । लाख चिंता के बावजूद भी मजाल है माथे पर एक बल पड़ा दिख जाए ! मगर कभी कभी कुसुम को मुरझाया हुआ देखते तो मन ही मन अपने आप को दूसरी शादी के लिए कोसते । हालांकि वो जानते थे चंपा मन की बुरी नहीं, यह सब तो उसकी अम्मा सिखा कर भेजी है । वह एक दिन कह भी रही थी कि 'हमको कुसुमिया पर बहुत दया आता है मगर हमारी अम्मा कहती है कि सौतेली संतान को लाढ़ प्यार दो तो फिर अपनी औलाद भूखी मरती है और हमारी अम्मा कभी झूठ नहीं बोलती, काला निशान है उसकी जीभ पर ।' मोहन भाबू ने कई बार समझाने की कोशिश की के कुसुम इतनी प्यारी है वो क्या तुम्हारा बुरा करेगी और तुम्हारी औलाद उसका भाई या बहन ही होगा । बेकार का ज़हर मत पालो ।
 मगर चंपा को तो उसकी अम्मा ने कहा था और भगवान झूठे हो सकते थे मगर उसकी अम्मा नहीं । बुढ़िया तीन चार महीने बाद आ धमका करती थी पाँच सात दिन के लिए और उन पाँच सात दिनों के लिए कुसुम अपनी ही ज़िंदगी में नर्क भोग लेती । पर बेचारी इतनी सीधी थी कि इतना सहने के बाद भी मोहन जी के आने पर मुस्कुरा देती यह सोच कर कि बाबू जी सारा दिन कचहरी से थके आते हैं उनके सामने मुरझाई सूरत ले कर उन्हें दुःखी नहीं कर सकती । 
मगर मोहन बाबू पिता ठहरे, मन की जान लेते थे उन्हें पता होता कि कौन सा फूल ताज़ा है और किस फूल पर पानी मार कर ताज़ा रखने की नाकाम कोशिश की गयी है । अपनी गलती सुधारने के लिए कई बार कुसुम से कहा कि वो दिल्ली अपने चाचा के यहाँ चली जाए, वहीं रह कर पढ़े । मगर कुसुम को अपने बाबू जी को छोड़ कर जाना मंज़ूर नहीं था । 
ख़ैर जैसा भी था प्रभु के आसरे कट रहा था । वो क्या सोचे बैठा था यह भला कौन जान सकता था ।  सब कुछ था चंपा के पास, एक तरह से मालकिन बनी बैठी थी मगर औलाद का दुःख उसे हमेशा कचोटता रहता । वह चाहती थी कि उसे एक सुंदर सा बेटा हो जिसकी मालिश कर के नहला धुला कर उसे चंदन काजल लगा कर वो उसे गोद में लिए धूप सेके जिससे हर आने जाने वाला उसके भाग्य को सराहे । अपने लाल के लिए हर साल बाक़ी सभी औरतों की तरह वह भी जितिया व्रत करे । मगर सब कुछ चंपा के हाथ में तो नहीं था । पाँचवां साल पूरा होने जा रहा था शादी का मगर बच्चे की किलकारियों के बिना आंगन अभी तक सूना था । हाँ ये बात अलग है कि चंपा की कर्कश आवाज़ में कुसुम को हर घंटे पड़ने वाली डांट फटकार काभी हद तक आंगन का वो सूनापन तो  दूर कर देतीं लेकिन उसके मन का सूनापन दूर ना हो पाता । दिन बितते जा रहे थे मगर खुशखबरी की कभी सुगबुगाहट भी ना होती । 
अब तो पट्टी भर में उसके बांझ होने की बातों ने भी ज़ोर पकड़ लिया था । बड़की दाई कहतीं "कर्मों का फल है बहुरिया, ईश्वर सब देखता है । जितना ये बेचारी कुसुम पर जुलुम ढाती है ना उतना ही इसे औलाद के लिए तड़पना पड़ेगा ।" उधर से फलांपुर वाली काकी कहती "काकी, तड़पना तो सारी उमरे पड़ेगा, सुने हैं बांझ है । बच्चा ना हो पाएगा ।" ऐसी कितनी अफवाहों ने एक दूसरे के मुंह से उड़ कर एक दूसरे के दिमाग में घर कर लिया था । बात घूमते घूमते चंपा के कानों तक भी आती और फिर चंपा अपना चंडि रूप धार कर बिना नाम लिये पूरी पट्टी की औरतों को गरियाती । 
कुसुम शांत थी मगर जब कोई चंपा को बांझ कहता तो उसका मुंह क्रोध से लाल हो जाता और वो वहाँ से उठ खड़ी होती । "चर्बी चढ़ गया दिमाग में ? काहे मारी तुम फुलवा की बेटी को ? झगड़ो तुम आ सबका ओरहन हम सुनें ?" चंपा एक दिन खूब चिलाई कुसुम पर । 
"ऐ चाची उसको काहे डांटती हो ? फुलवा चाची की बेटी तुमको बांझ बोली तो ये भी उसका माथा नोच ली । तुम्हारे लिये लड़े भी आ तुमसे मार भी खाए ।" कुसुम को डांट पड़ता देख बगल के लंगड़ू का बेटा टुनटुनमा बोल पड़ा । टुनटुनमा की बात सुनते चंपा शर्म से गड़ गयी । मगर कुसुम के लिए उसके मन में इतना ज़हर था कि इतनी जल्दी निकलने वाला नहीं था । 
समय ने अपना पासा फेंका और शादी के छठे साल में खुशखबरी आ गयी । चंपा फूली नहीं समाती थी । जो उसके घर आता सबको टोंट मार कर कहती "रे बिल्लईया के भाग से कहीं छिक्का टूटा है ।  केतनो लोग हमारा बुरा मना ले मगर भगवान अचछा ही करेंगे । देखना हमको बबुआ ही होगा आ फेर सबको बताएंगे जो जो हमको बांझ कहती रही है ।" इधर कुसुम भी बहुत खुश थी यह सोच कर की उसका भाई आएगा, जिसको वो खूब सुंदर से साज श्रृंगार कर के राजकुमार बनाएगी और उसके साथ खूब खेलेगी । इन दिनों चंपा का भी कुसुम को बात बात पर डांटना कम हो गया था । कुसुम उसकी खूब सेवा करती थी, एक तिनका इधर से उधर ना करने देती थी । 
समय बीतता रहा और फिर वो दर्द से भरी रात भी आगयी जिसका सौभाग्य हर औरत मनाती है । दर्द से छटपटाती चंपा के मन में सिर्फ खुशी थी और कल के सपने जब उसके हाथों में एक सुंदर सा एक राजकुमार होगा । जितिया व्रत भी आने ही वाला है वो इसी बार से जितिया करेगी अपने ललना के लिए । यही सब सोच सोच कर उसे अपनी ये असहनीय पीड़ा भी बहुत कम लगने लगी । दाई ने अपना काम करना शुरू किया दर्द में तड़प रही चंपा की चीखों के बीच सबको किलकारियों का इंतज़ार होने लगा । दर्द चीखें बहुत सी चीखें पीड़ा से भरी कराहें और फिर एक दम शांति सिर्फ शांति ही नहीं मातम के घर जैसा सन्नाटा कहिए । 
"बबुआ हुआ था लेकिन मरा हुआ ।" दाई ने इतना ही कहा । चंपा बेहोश पड़ी थी । घर बसने से पहले उजड़ चुका था । कुसुम की चीखें गगन में छेद कर के बैकुंठ में बैठे उस संसार के पालक का मन छेदने पर तुली थीं । मोहन जी मौन थे एक दम मौन, कुछ सूझ ही नहीं रहा था । उन्हें बच्चे के दुःख से ज़्यादा चंपा की चिंता थी । 
चंपा को होश आ गया था । होश आते ही उसके हाथों ने अपने उस सपने को खोजना शुरू किया जो भले ही नौ महीने से उसकी कोख में था मगर उसकी आँखों में कई वर्षों से पल रहा था । मगर यहाँ नहीं है, कहाँ होगा ? कौन ले गया मेरे लाल को ? अरे रूको तुम सब मुझे देखने दो ।" चंपा ये सब मन में सोचती रही मगर कुछ बोल नहीं पा रही थी । शरीर कमज़ोर पड़ गया था । मोहन जी सामने खड़े थे । कुछ देर मोहन जी को निहारने के बाद चंपा ने उनकी आँखों को वो मौन तोड़ते देखा जो मोहन जी अब तक साधे हुए थे । चंपा भांप गयी । बस फिर क्या था, उसकी सारी ताक़त उसके कंठ में जमा हो गयी और फिर जो क्रंदन हुआ उसे सह पाना इंसान के बस की बात ना रही । भले ही कल की शाम से पहले चंपा को लांछनों के तीर से बिंध दिया जाता, भले ही कल के बाद ज़ुबान पर उसके बुरे कर्मों और खोटी किस्मत की कहानियाँ होतीं मगर इस वक्त पट्टी के हर उस आदमी औरत और यहाँ तक की बच्चे की आँख से चंपा के चित्कारों में छुपी वेदना बह कर निकल रही थी । 
कुसुम सब को हटाती हुई आगे बढ़ी और चंपा को अपने सीने में छुपाती हुई उसकी पीड़ा को सोखने लगी । चंपा को इस वक्त इसी तरह का कोई चाहिए था जो उसे इस भयानक सच के प्रकोप से बचा सके । उसके सपने सच होते होते उसके हाथों से फिसल कर चूर चूर हो गये थे । चंपा कुसुम के सीने से चिपकी रोती रही रात भर और कुसुम एक माँ की तरह उसे अपना बच्चा जान कर उसे हिम्मत देती रही । 
सुबह का उजाला आज रात के अंधेरे से भी घना था । चंपा को बच्चे के ना बचने के दुःख के अलावा हर तरफ उसकी उड़ने वाली हंसी का भय खाने लगा । "हम सचमुच बांझ निकले कुसुम, सब सहिए कहते थे ये हमारे कर्मों का फल है ।" चंमा रोते रोते थक जाती तो फिर से यही बोल कर रो पड़ती । 
"माँ, तुम सब ठीक हो जाएगा । तुम कुछ बुरा नहीं की हो । तुम तो जो कही वही हुआ ना बबुआ ही आया था मगर उसका जीना मरना तुम्हारे हाथ नहीं था अम्मा ।" कुसुम इस समय चंपा को ऐसे समझा रही थी जैसे चंपा ही बेटी हो और कुसुम माँ । 
समय अपने पंख लगा कर उड़ता रहा । उसके उड़ने के साथ ही घाव भी भरता रहा मगर उस घाव का निशान नहीं गया जो हमेशा लोगों के तानों से एक टीस दे जाता । अब चंपा शांत हो गयी थी, उसके मुंह पर भी कोई कुछ कह जाता तो वो चुपचाप सुन लेती । कुसुम पर वो अब बुल्कुल नहीं चिलाती थी । कुसुम उसकी बच्चों की तरह देखभाल करती । उसे अब चंपा का ना चिल्लाना कचोटने लगा था । वो बार बार कुछ ना कुछ जान बूझ कर गिरा देती यह सोच कर कि चंपा उसे डांटे मगर चंपा तो जैसे लाश हो गयी थी, वह लाश जिसमें सासें तो थीं मगर उम्मीद नहीं । 
"बाबू जी, अम्मा अब हमें नहीं डांटती, ये हमको बहुत डराता है । उसे समझाओ ना कि वो मुझे डांटे, हम मार भी खा लेंगे बस उसे कसो कि पहले जैसी हो जाए ।" इधर चंपा सब सुनती रहती और फिर सिरहाने में मुंह छुपा कर रो देती ।
जितिया व्रत आने वाला था एक दो दिन में, पट्टी की औरतों के बीच इसी को लेकर बातें चलतीं । किसके घर वाले ने उसे इस बार कितने भर सोने का जितिया बनवा के दिया, किसने कौन सी साड़ी खरीदी इन्हीं सब बातों के बीच चंपा के प्रति घृणा भी सबकी ज़ुबान से टपक ही जाती । कईयों से झगड़ आई थी कुसुम इस बात के लिए । अफने आप ही कुसुम का लगाव चंपा से बढ़ गया था । 
"ई समान ला देना ।" चंपा की आवाज़ सुन कर मोहन जी चौंक पड़े । चौंकते भी कैसे ना कई महीनों बाद चंपा कुछ लाने के लिए बोली थी ।
"हाँ हाँ लाओ लाओ । क्या लाना...." लिस्ट पढ़ते हुए आधी बात उनके मन में ही रह गयी ।
"तेल खरी, मांछ, चूड़ा....ये सब तो जितिया का समान है ?" मोहन बाबू अचंभित थे ।
"हाँ जितिया है तो उसी का सामान मंगाएंगे ।" बिछावन से उठती हुई चंपा बोली ।
"मगर किसके लिए? कौन करेगा जितिया ?" मोहन जी का एक और सवाल 
"हम करेंगे और कौन ?" 
"तुम आराम करो तुम ठीक नहीं हो ।" मोहन जी को लगा कि चंपा सदमें मे है ।
"बहुत दिन बाद तो ठीक हुए हैं, और आप कहते हैं ठीक नही हैं । जाईए सामान ला दिजिए हमको कल जितिया करना है ।" ये मजबूती बड़े दिन बाद झलकी थी चंपा की आवाज़ में ।
"मगर किसके लिए ? चंपा वो नहीं है । वो जन्म लेते ही चला गया ।" चंपा कई बार अपने उस बच्चे को खोजा करती थी जिसका चेहरा भी उसने नहीं देखा । मोहन बाबू ने समझा वो अब भी उसी का ख़याल किये बैठी है । 
"हाँ जानते हैं वो चला गया है मगर हमको कुसुम के लिए जितिया करना है ।" चंपा की आवाज़ में नमी का भार आ जाने से आवाज़ कांप गयी ।
"कुसुम के लिए ? लेकिन ये तो बेटों के.... ।" मोहन जी को समझ नहीं आ रहा था कि वो कौन सा भाव प्रकट करें । 
"औलाद के लिए होता है जितिया हम भी करेंगे अपनी उस औलाद के लिए जो हमको जिंदगी दी, जिसको हम हमेशा दुत्तकारते रहे, जिसने हमें माँ समझ कर स्वीकार किया मगर हम उसे सौतेली मान कर उसको दुःखी करते रहे । आप नहीं जानते, इन दुःख भरे दिनों को हम काट पाए हैं तो बस कुसुम के सहारे । हमको नहीं चाहिए कोई संतान हमारी संतान है ना ई कुसुमिया जो बेटी के साथ साथ हमारी अम्मा भी है । वो अम्मा जो हमको इस दुःख के समय में अपने सीने में छुपा कर रखी, हमारे लिए लोगों से लड़ी ।भले हम उसका देना नहीं दे सकते मगर कम से कम उसकी लंबी उम्र के लिए जितिया तो कर सकते हैं ।" वो मौन जो चंपा के चेहरे पर इतने महीनों से पसरा हुआ था वो असल में एक प्रक्रिया थी उस ज़हर को मारने की जो उसके मन की संवेदनाओं को मार रहा था और आज वही ज़हर प्रेम बन कर उसकी बातों और आँखों से निकल रहा था । 
कुसुम दरवाज़े की ओट से निकल कर सामने आई और जा कर चंपा के सीने से जा लगी । चंपा ने कुसुम के माथे को चूमते हुए उसे सीने में छुपा लिया । मोहन जी एक तरफ खड़े खुशी के आँसू बरसाते रहे । उस साल चंपा ने जितिया किया और इसी के साथ एक मिसाल भी कायम कर दी । दो साल बाद चंपा के ऊपर से बांझपन का कलंक भी हट गया जब उसने सुंदर से बेटू को जन्म दिया । कुसुम फूली नहीं समाती थी उसे देख देख कर । चंपा बेटे को जन्म देने के बाद भी कुसुम पर उतना ही स्नेह लुटाती रही जितना वो अपने बेटे पर लुटाती थी । आखिर उसे उस भयावह दुःख से लड़ कर जीने का हौंसला भी तो प्यारी सी कुसुम ने ही दिया था । 
धीरज झा 

COMMENTS

Name

अन्य रचनाएँ,1,अलविदा,5,इश्क़ वाली कहानियां,15,कल्पनाएं,1,कविता,114,कहानियों का कोना,30,कहानी,124,किश्तों वाली कहानियाँ,5,किस्से गाँव के,14,ख़ास लोग,7,खुशियाँ,39,खेल कहानियां,4,ख़्वाहिशें,2,गज़ल,31,चलते फिरते बस यूं ही,2,चिट्ठियाँ,22,जय जवान,11,तड़प मेरी तुम्हारे लिए,72,दु:ख,16,दुख,45,नमन,4,पापा के लिये,27,पुराने किस्से,3,प्रतिभा की दुनिया,2,फिल्म समीक्षा,3,बस यूं ही,27,बातें काम कीं,60,बिहारनामा,1,माँ,18,युवाओं की बात,2,रात के किस्से,6,लघु कहानी,8,लेख,151,वैश्विक,1,व्यंग,35,व्यंग्य,1,शायरी,30,सिनेमा,1,सिर्फ तुम्हारे लिये,63,हास्य कथा,1,
ltr
item
क़िस्सों का कोना : जितिया (कहानी बदलाव की)
जितिया (कहानी बदलाव की)
क़िस्सों का कोना
http://www.qissonkakona.com/2017/09/blog-post_12.html
http://www.qissonkakona.com/
http://www.qissonkakona.com/
http://www.qissonkakona.com/2017/09/blog-post_12.html
true
3081115015472439889
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS CONTENT IS PREMIUM Please share to unlock Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy