कौन मजबूत कौन बेबस

"पता लगा आज मार्केट गयी थी ?" गुस्से में लाल आँखों को खाने की थाली पर टिकाए संदेह ने सावित्री से पूछा । सावित्री अवाक थी क्य...



"पता लगा आज मार्केट गयी थी ?" गुस्से में लाल आँखों को खाने की थाली पर टिकाए संदेह ने सावित्री से पूछा ।
सावित्री अवाक थी क्योंकि संदेह से वो अच्छे से परिचित थी । उसे पता था संदेह के मन में कोई बात आगयी तो वो सावित्री पर लांछन लगाते नहीं चूकेगा । पकड़े गये चोर की तरह हकलाती ज़ुबान से बोली "वो वो बऊआ का बैग लाना था ज़िद कर....।" डरा हुआ सच झूठ का हमशक्ल होता है ।
"कहा था ना तुमको कि शनिवार छुट्टी होती है मैं ला दूंगा फिर बाज़ार जाने की क्या आग लगी थी ।  सच सच बता दो किससे मिलने गयी थी ?" संदेह ने बिना सावित्री की बात सुने हमेशा की तरह उस पर आरोप लगा दिया ।
"ससस सच्च कह रही हूँ । बाऊआ ज़िद्द करने लग गया था ।" सावित्री को पता था संदेह ने जो सोच लिया वही सच है उसके लिए और अब वो अपने असली रूप में आ ही जाएगा ।
"कैसी माँ हो जो बच्चे को दो दिन के लिए समझा नहीं पाई । मैं जानता हूँ कुछ चल रहा है तुमारे दिमाग में । सच बता दो वरना...।" संदेह के अंदर का शैतान बाहर आ चुका था उसने कुर्सी से उठते हुए सावित्री को उसके केश से पकड़ लिया ।
"सच कह...।" बात पूरी होने से पहले ही संदेह सावित्री को बालों से खींचा और गंदी गालियाँ देनी शुरू कर दीं ।
"नाम सावित्री रखने से कोई सावित्री नहीं बन जाती । सब जानता हूँ तुम्हारे बारे में मैं । साले करम फूटे थे जो घर वालों की बात में आ कर तुम जैसी को गले बांध बैठा । हज़ार बार कहा है घर से बाहर पैर ना रखा करो मगर तुम्हें तो ना जाने कौन सी आग...।" इतने विषवाण सावित्री का स्वच्छ मन ना सुन पाया
संदेह की बात काटते हुए बोली "बस करिए, इतना बुरा मत बोलिए ।" इसी के साथ संदेह के कठोर हाथों का चांटा सावित्री के कोमल गालों पर एक कलाकृति उकेर गया । खाने की थाली ज़मीन पर फैंकते हुए संदेह गालियाँ बकता हुआ अंदर चला गया ।
सावित्री एक कोने में बैठी रोती रही । शोर से बऊआ जाग गया था, माँ के पास आ कर बोला "माँ मेरी वजह से तुमको मार पड़ी ना । मैं अब कभी जिद्द नहीं करूंगा माँ तुम चुप हो जाओ ।" मासूम हाथों के स्नेह भरे स्पर्श ने सावित्री की पीड़ा तो सोख ली मगर अपने कर्मों से उसकी शिकायत कम ना हुई । पितृसत्ता के अहम में चूर एक पुरुष ने आज फिर एक नारी को नीचा दिखा दिया था और उसे ये अहसास करा दिया कि तुम पैरों की जूती से ज़्यादा कुछ भी नहीं ।
सावित्री के मकान से दो गली छोड़ कर
कर्तव्य अपने कमरे में लेटा हुआ था । संदेही ने पच्चीस लाख की डिमांड रखी है कोर्ट में । कर्तव्य की आँखों में आँसू भरे हैं और दिमाग में पूराने दिनों की बातें घूम रही हैं । वो एक पुरानी सोच में डूब गया ।
दरवाज़ा खटका । अंदर से तेज़ कदमों की आहट दरवाज़े के नज़दीक आई और फिर दरवाज़ा भड़ाक से खुला । सामने कर्तव्य खड़ा था । काम से थका इंसान घर आराम करने जाता है मगर कर्तव्य काम पर ज़्यादा आराम महसूस करता था क्योंकि उसे पता होता था घर जाते ही उसकी ज़िंदगी के हिस्से का नर्क उसे भोगना पड़ेगा ।
"तुम्हें कहा था मेरे लिए एक साड़ी लेते आना । कहाँ है ?" संदेही ने अपने स्वभाव के अनुसार हमेशा की तरह आते ही फरमाईश सुनाई ।
"तुम्हें बताया था ना सैलरी नहीं आई है । आते ही ले आऊंगा ।" कर्तव्य ने फ्रिज से पानी निकालते कर पीते हुए कहा ।
"अकाऊंट में तो हैं ना वो किसके लिए बचा के रखे हैं । कल ही तुम्हारे अकाऊंट से दस हज़ार विड्राल का मैसेज देखा था । कहाँ उड़ाते फिरते हो पैसे ? मैं कुछ कह दूं तो तुम्हारा रोना निकल जाता है ।" हमेशा की तरह शक़ भरा एक और सवाल कर्तव्य के आगे था ।
मगर कर्तव्य के लिए ये सब रोज़ का था । उसने खौलते पानी में चायपत्ती डालते हुए कहा "वो बैंक लोन की इंस्टालमेंट के लिए कटे हैं । चैक कर लो मैसेज ।"
"जानती हूँ तुम्हारा इंस्टाॅलमेंट मैं । हमेशा इसी तरह बहाने बनाते हो ह मैं थक गयी हूँ तुमसे । एक इच्छा नहीं पूरी की तुमने मेरी कभी । सारिका दीदी के हस्बैंड उनके लिए डायमंड सेट आर्डर किए हैं । मगर तुम... ।"
"संदेही तुम संतुष्ट क्यों नहीं होती मेरे पास जितना है उतने भें ही करूंगा ना सब । मैं कहाँ से लाऊं डायमंड सेट ?" दुःख के कारण कर्तव्य की आवाज़  थोड़ी ऊंची हो गयी ।
"मुझ से ऊंची आवाज़ में बात मत करो समझे । नौकरानी नहीं हूँ तुम्हारी । करम फूटे थे मेरे जो तुम्हारे साथ शादी कर ली । मुझे क्या पता था तुम कंगाल हो ।" संदेही का लहज़ा ज़ाहिलाना हो गया ।
"प्लीज़ संदेही सही से बात करो ।" कर्तव्य हर मामले को प्यार से सुलजाने की कोशिश करता था मगर संदेही ने कभी समझा ही नहीं ।
"मैं सही से ही बात करती हूँ । तुम सच में किसी लायक नहीं । तुमसे शादी करने से अच्छा था मैं कुंवारी रह कर खुद कमाती ।" अब संदेही की बातें कर्तव्य के बस से बाहर हो रही थी । कर्तव्य चिल्ला उठा ।
"चिल्लाओ मत, कुछ कर नहीं सकते थे तो शादी का बोझ उठाया क्यों ? तुम जैसे लोग ही अपने साथ दूसरे की ज़िंदगी भी नर्क बनाते हैं ।" कर्तव्य उठ कर कमरे में चला गया और संदेही बड़बड़ाती रही ।
ये तकरीबन रोज़ का था । और फिर धीरे धीरे बात तलाक़ तक पहुंच गयी । संदेही ने कर्तव्य पर प्रताड़ना और दूसरी औरतों से नजायज़ संबंध होने का आरोप लगाया । इसी के साथ कर्तव्य को कई महिला संगठनों का विरोध भी झेलना पड़ा ।  कर्तव्य इन सब बातों पर यकीन ही नहीं हो रहा था । उसने प्रताड़ित करना तो दूर कभी संदेही से शिकायत तक नहीं की थी उसके स्वभाव को ले कर । अब कर्तव्य के पास अपना घर बेचने के सिवाए कोई और रास्ता नहीं बचा ।
कर्तव्य की आँखों से बेबसी के आँसू झर रहे थे और नारीवाद एक कोने में खड़ा उसकी बेबसी पर ठहाके मार कर रो रहा था । इतिहास गवाह रहा है किसी भी वाद हमेशा कमज़ोर को कुचल कर ही बड़ा बना है । जिसेके नाम पर इन तरह तरह के वादों ने अपना अस्तित्व कायम किया उनकी तो इन्होंने कभी खबर तक नहीं ली । बाक़ी आज के दौर में बुरा आदमी या बुरी औरत नहीं बुरी है इंसान की मानसिकता और ये मानसिकता आदमी या औरत किसी की भी हो सकती है । अच्छा या बुरा इंसान का कर्म होता है उसका वर्ग नहीं ।

धीरज झा

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क़िस्सों का कोना : कौन मजबूत कौन बेबस
कौन मजबूत कौन बेबस
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क़िस्सों का कोना
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