इसे कहते हैं साथ साथ जीना

#इसे_कहते_हैं_साथ_साथ_जीना (कहानी) "मेरे प्यारे हब्बी जी" स्नेहा ने सोये हुए रितेश के गालों को प्यार से सहलाते हुए कहा । वैसे तो र...

#इसे_कहते_हैं_साथ_साथ_जीना (कहानी)
"मेरे प्यारे हब्बी जी" स्नेहा ने सोये हुए रितेश के गालों को प्यार से सहलाते हुए कहा । वैसे तो रितेश की नींद बहुत कच्ची है और उसकी नींद तो स्नेहा के सुबह सुबह हड़बड़ा कर जागने के साथ ही खुल गयी थी मगर फिर भी वो आँखें बंद किये हुए जान बूझ कर लेटा था । 
"क्या बात है ये बोलो, मस्का मारने की ज़रूरत नहीं कोई ।" रितेश जानता है कि जब जब स्नेहा उसे इतने प्यार से जगाती है तो उसका मतलब होता है उसे पक्का कोई ना कोई काम है । 
"हुंह, तुम्हारा मतलब ये है कि मैं इतने प्यार से तुम्हें कभी नहीं बुलाती । बस मतलब भर के लिए ही है मेरा प्यार ।" रोनी सी सूरत बना कर स्नेहा बोली ।
"ड्रामें बंद करो और काम बताओ ।" रितेश ने स्नेहा को बाहों में भर कर अपने साथ लिटा लिया ।
"अरे अरे, बदमाश छोड़ो मुझे । मेरी ड्रैस खराब हो जाएगी ।" रितेश स्नेहा की बात नज़रअंदाज़ कर के उसके साथ बच्चों की तरह शैतानियाँ करने लगा । दोनों की किलकारियाँ पूरे कमरे में गूंज उठीं । 
"अच्छा सुनो ना । मैं ऑऊट ऑफ टाऊन जा रही हूँ । मेरी बहुत ज़रूरी मीटिंग है, शाम से पहले लौट आऊंगी । तुम प्लीज़ नूर की पेरेंट्स मीट में चले जाना और उसे होमवर्क करा देना और विभू को टाईम से उसका दूध और खाना दे देना । नूर के साथ जाने तक शोभा आन्टी आ जाएंगी । जब तक तुम नूर की पेरेंट्स मीटिंग अटेंड करोगे वो विभू को संभाल लेंगी ।" बिना रुके स्नेहा ने रितेश को सारे काम गिनवा दिये । 
"बस ! इतना ही ? सूपरमैन हूँ ना मैं । जो ये सब कर लूंगा और उसके बाद अपना काम भी निपटा लूंगा ना ।" 
"नहीं तुम सूपरमैन से भी ऊपरमैन हो । तुम सब कर लोगे । और हाँ एक बात तो भूल ही गयी । आज हिमानी और मिताली आ रही हैं रात के खाने पर । मैं शाम तक आ कर खाना बना लेती मगर उन्हें तुम्हारे हाथों की बिरयानी खानी है । सो प्लीज़ बना लेना । ओके बाॅय मुझे निकलना होगा लेट हो रहा है ।" रितेश इतने काम सुन कर कोई बहाना ना मार दे इससे पहले स्नेहा सारे काम फटाफट गिनवाते हुए रितेश को एक किस कर के वहाँ से जल्दी से भागी ।
"अरे सुनों मुझसे इतना सब.....नहीं होगा ।" आखरी वाला "नहीं होगा" सुनने से पहले ही स्नेहा वहाँ से जा चुकी थी । रितेश उसे जाता देख मुस्कुरा दिया । फिर उसे कुछ याद आया तो जल्दी से भाग कर बाॅलकनी में पहुंचा । स्नेहा कार में बैठने ही वाली थी । 
"सुनो ।" 
"बहाने के सिवा कुछ भी बोलो ।"
"फोन मैसेज करती रहना ।" रितेश ने आँखों में ढेर सारा प्यार और हल्की सी फिक्र समेटे हुए कहा । जवाब में स्नेहा ने बड़ी सी मुस्कान के साथ एक फ्लाईंग किस रितेश की तरफ उछाल दी और कार में बैठ गयी । 
रितेश जाती हुई गाड़ी को कुछ देर देखता रहा और उसके बाद उसने आज पूरे दिन के कामों को याद करते हुए अपने बाल नोचने शुरू कर दिये । ऐसा नहीं था कि रितेश ये सब पहली बार करने वाला था । वो हमेशा स्नेहा का हाथ बटाता था उसके बाहर जाने पर या उसे कुछ पल आराम देने के लिए बच्चों को संभालता था । लेकिन फिर भी उसे स्नेहा के साथ ऐसे मस्ती करने और स्नेहा को उसके हिस्से के काम के लिए ऐसे प्यार से मनाना अच्छा लगता था । 
 
रितेश सोच ही रहा था कि कहाँ से काम शुरू करे कि इतने में उसका बेटा विभू जो अभी एक साल का था ज़ोर से रो पड़ा । रितेश ने जल्दी से जा कर विभू को उठाया उसकी नैपी बदली और फिर उसके लिए दूध की बोतल तैयार कर के उसे चुप कराया । साढ़े आठ हो गये थे इधर नूर भी उठ के फ्रैश होने चली गयी थी । रितेश ने जल्दी से दोनों के लिए नाश्ता बनाया । नूर आज ये देख कर खुश थी कि नाशता पापा बना रहे हैं और आज उसे कुछ स्पैश्ल खाने को मिलेगा । 
 
नाशता खत्म करने के साथ ही शोभा आंटी आ गयी थीं इसलिए दोनों बाप बेटी स्कूल के लिए निकल गये । वहाँ से आकर कुछ देर रितेश ने अपना काम भी किया । नूर का होमवर्क भी कंप्लीट करवा दिया, विभू को टाईम टाईम पर खाना और दूध भी दे दिया । सब करते धरते शाम हो गयी । इधर रितेश ने बिरयानी भी लगभग तैयार कर ही दी थी । स्नेहा ने रितेश को फोन कर के बता दिया था कि उसकी दोनो दोस्त उसके साथ ही आएंगी । रितेश ने अपने हिसाब से दोनों के स्वागत की तैयारियाँ कर ली थीं । 
 
सब काम निपटा कर रितेश अपना कुछ काम ले कर बैठा था कि तभी दरवाज़े की घंटी बजी, वह समझ गया कि स्नेहा अपनी दोस्तों के साथ आ गयी है । रितेश ने दरवाज़ा खोला और सभी का स्वागत किया । स्नेहा अपनी सहेलियों को साॅफ्ट ड्रिंक्स दे कर रितेश के साथ किचन में कुछ स्नैक्स लेने आगयी । 
 
"वाह, ये तो लगता ही नहीं कि स्नेहा घर से बाहर थी । कितना साफ सुथरा रखा है घर को । स्नेहा ने अपने हब्बी को पूरे कंट्रोल में रखा है ।" हिमानी ने पूरे घर में एक नज़र दौड़ाते हुए कहा ।
"हाँ यार, हाॅओ लक्की शी इज़ । काश हमारे हब्बी भी इसी तरह हमारे कंट्रोल में होते ।" मिताली ने हिमानी की बात में हामी भरते हुए उदास मन से कहा । इतने में स्नेहा स्नैक्स ले कर आगयी ।
"रितेश को कहाँ छोड़ आई । हम तुम दोनो से मिलने आई हैं । उन्हें भी बुला ले ।" हिमानी ने मज़ाक में स्नेहा को छेड़ते हुए कहा । 
"हाँ हाँ बुला ले और डर मत माना कि तेरे हब्बी स्मार्ट हैं मगर हम उसे ले कर भागेंगे नहीं । एक तो संभाला नहीं जाता हमसे ।" मिताली की बात पर तीनों का मिला जुला ठहाका गूंज उठा । 
"अरे नहीं यार । उन्होंने ही कहा कि मैं तुम सबके साथ बैठूं तब तक वो डिनर की तैयारी कर लेंगे ।" 
"एक बात कहूँ स्नेहा । तू सच में बहुत लक्की है जो तेरे हब्बी तेरे कहने में हैं । हम लोगों के हब्बी के पास तो हमारे लिए उतना टाईम ही नहीं बच पाता । तेरे हब्बी के पास कितना फ्री टाईम है ना ! वो तेरा सारा काम कर देते हैं ।" हिमानी के मुंह से फ्री टाईम वाली बात सुन कर स्नेहा को थोड़ा बुरा लगा फिर भी वो मुस्कुराती रही । 
"वैसे तेरे हब्बी करते क्या हैं ?" मिताली ने पूछा । 
"तुम लोगों ने एन वी कंस्ट्रक्श्न का नाम सुना है ?" कोल्ड्रिंक का सिप लेते हुए स्नेहा ने कहा "हाँ बिल्कुल सुना है । शहर के सबसे बेस्ट बिल्डर्स हैं वो । हम तो उन्हीं की नयी काॅलोनी में फ्लैट लेने की सोच रहे थे । क्या रितेश वहीं जाॅब करते हैं ?" मिताली ने बड़ी उत्सुक्ता से पूछा । 
"नहीं जाॅब नहीं करते । उसके मालिक हैं । एन वी कंस्ट्रक्शन का पूरा नाम नूर एंड वैभव कंस्ट्रक्श्न है । हमारे बच्चों के नाम पर है इनकी कंस्ट्रक्शन कंपनी का नाम ।" स्नेहा ने बिल्कुल नार्मल हो कर जवाब दिया मगर जवाब सुन कर दोनो दंग रह गयीं । 
"अरे यार, कितने सालों बाद मिले हैं । हमें सच में नहीं पता था कि तेरे हब्बी की ही वो कंस्ट्रक्शन कंपनी है । वो इतने बड़े बिल्डर हैं फिर भी उनके पास इतना समय कैसे होता है ?" हानी ने हैरान हो कर पूछा । 
"समय तो उनके पास बिल्कुल भी नहीं है । मगर फिर भी वो समय निकाल लेते हैं । क्योंकि उनका मानना है कि कुछ पैसों का नुक्सान भले हो जाए मगर उनके पारीवारिक रिश्तों का नुक्सान नहीं होना चाहिए । मुझे जाॅब करने की कोई ज़रूरत नहीं थी मगर मेरा मन था कि मैं अपने दम पर कुछ करूं । उन्होंने एक बार भी नहीं रोका कि मुझे इतने बड़े बिजनसमैन की पत्नी हो कर जाॅब नहीं करनी चाहिए । मैं एक मार्केटिंग कंपनी की मैनेजर हूँ । जितनी सैलरी मुझे मिलती है उससे ज़्यादा एक दिन में इनके पास काम करने वाले मज़दूर ले जाते हैं । मगर फिर भी इन्हें कोई प्राब्लम नहीं । यकीन मानों बच्चों की नैपी तक चेंज करते आये हैं । जब जब मैं बिमार पड़ी हूँ या कहीं बाहर गयी हूँ या इन्हें लगा कि मैं थकी हूँ तब तब घर का सारा काम इन्होंने खुद किया है । नूर मुझसे ज़्यादा अपने पापा के हाथ का टिफिन ले जाना पसंद करती है । विभू कितना भी रोता हो रितेश की गोद में जाते चुप हो जाता है । इसका कारण बस यही है कि रितेश ने पति और पत्नी के बीच बंटे कामों को मिला दिया है । उनके हिसाब से यह नहीं कि वह अगर मर्द हो कर कमा रहे हैं तो मेरा फर्ज़ औरत हो कर घर चलाना है । हमने अपने बच्चों में खुद को माता पिता के हिसाब से नहीं बांटा । आज भी उन्हें काम रहा होगा मगर जब मैने उन्हें कहा कि मुझे काम से बाहर जाना है वो बच्चों को देख लें और साथ ही कुछ काम भी निपटा लें तो उन्होंने अपने काम का बहाना नहीं बनाया । बस मुस्कुरा कर मान गया । मैं जानती हूँ सब कुछ करने के बाद भी उन्होंने अपना काम किया होगा, ऑनलाईन मीटिंग्स अटेंड की होंगी । हिमानी, घर दो लोगों से चलता है । दोनों के अपने अपने काम बंटे हैं मगर इसका ये मतलब नहीं की दोनों अपने अपने काम के ज़िम्मेदार अकेले ही हैं । समय समय पर दोनों को एक दूसरे के कामों में हाथ बटा देना चाहिए । कभी कभी जब उनका मन नहीं होता तो वो खाना बना लेते हैं मैं उनके अकाऊंटस चेक कर देती हूँ । वो कितने भी थके आएं मगर बच्चों के साथ कुछ वक्त निकाल कर ज़रूर खेलते हैं । नूर को कहानियाँ सुनाते हैं अच्छी बातें सिखाते हैं । यही कारण है कि मुझे कभी नूर को पढ़ने के लिए स्कूल जाने के लिए फोर्स नहीं करना पड़ा, उसे उसके पापा ने पहले ही सिखा रखा है कि अच्छे बच्चों को कैसे रहना चाहिए ।" स्नेहा की बात हिमानी और मिताली बड़े ग़ौर से सुन रही थीं । उन्हें सच में आज जा कर समझ आ रहा था कि वैवाहिक जीवन जिया कैसे जाता है । 
 
"कम ऑन गर्ल्स, डिनर इज़ रैडी ।" डिनर टेबल सजा कर रितेश ने तीनों को आवाज़ दी । रितेश के साथ साथ नूर भी अपने पापा का हाथ बटा रही थी । 
खाने के दौरान हिमानी और मिताली स्नेहा और रितेश का चेहरा ही पढ़ते रहे । जिस पर ढेर सारा प्यारा और अथाह सुकून की भाषा में साफ़ साफ़ लिखा था कि 'इसे कहते हैं साथ साथ ज़िंदगी जीना' । मिताली और हिमानी डिनर के बाद दोनों से विदा ले कर अपने अपने घर को निकल गयीं और साथ ही साथ दोनों से बहुत कुछ सीख कर गयीं । 
रात को सोने के समय 
"थैक्स मेरे सूपर से भी ऊपरमैन ।" अपने ध्यान में मग्न लेट कर किताब पढ़ रहे रितेश के सीने पर सर रखते हुए स्नेहा ने खुशी में झूमते हुए कहा ।
"थैंक्स क्यों ?" रितेश ने स्नेहा का सर सहलाते हुए कहा ।
"जो तुम हमेशा मेरी खुशी के लिए करते हो उसके लिए, जो तुमने आज किया उसके लिए और ज़िंदगी के इस सफ़र में इतनी खूबसूरती से मेरा हाथ पकड़ कर चलने के लिए ।"
"मैं पैसे कमाता हूँ इसके लिए कभी थैंक्स कहा तुमने ?"
"नहीं वो तो तुम्हारा फर्ज़ है । उसके लिए भला थैंक्स क्यों ?"
"तो फिर इसके लिए भी मत कहो क्योंकि अपने परिवार को वक्त देना तुम सबकी खुशी का ध्यान रखना भी मेरा फर्ज़ ही है ।"
"तुम बहुत ज़िद्दी हो ।" स्नेहा ने हल्के से मुक्का मार के कहा ।
"तुम से ही सीखा है ज़िद्द करना ।" रितेश ने अपनी बाहों को कसते हुए कहा । और फिर दोनों चुप चाप एक दूसरे को महसूस करने लगे ।   नोट - बेशक़ कहानी आपको काल्पनिक लग सकती है । आप कह सकते हैं कि ऐसा थोड़े ना होता है । मगर मेरा मानना है कि ऐसा होता है और अगर नहीं होता तो होना चाहिए । एक माँ सिर्फ माँ ही क्यों बन कर रहे और एक पिता सिर्फ एक पिता बन कर ही क्यों रहे । दोनो एक दूसरे का काम अपनी मर्ज़ी से एक दूसरे की खुशी के लिए कर ही सकते हैं । परिवार चलाना आसान है मगर परिवार में प्यार बनाए रखना किसी किसी को आता है । अपने काम से थोड़ा समय अपने परिवार के लिए निकालिए क्योंकि आप काम भी परिवार के लिए ही करते हैं अगर परिवार खुश नहीं तो आपका कमाना बेकार है । 
धीरज झा 

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