जय माँ

आज से शारदीय नवरात्रों का आरंभ हुआ है । भक्ति अपने चरम पर है । आज से हर तरफ़ माता के भक्त माता की पूजा आराधना में लीन नज़र आएंगे । स...






आज से शारदीय नवरात्रों का आरंभ हुआ है । भक्ति अपने चरम पर है । आज से हर तरफ़ माता के भक्त माता की पूजा आराधना में लीन नज़र आएंगे । स्त्रीशक्ति का प्रबल प्रतीक हैं ये नवरात्रे । जब हम ब्रह्मा, विष्णु, महेश और उनके अवतारों को सर्वशक्तिमान मान कर उनकी भक्ति में लीन उनकी जयकार बुलाने लगते हैं तभी हमें ये अहसास हो जाना चाहिए कि इनके के लिए प्रयोग किए जाने वाले 'सर्व शक्ति मान' में जो 'शक्ति' है वो स्त्री है । जब ही हम 'हर हर महादेव' का उदघोष करते हैं हमें उसी समय महादेव माँ काली के चरणों के नीचे दबे हुए देख यह आभास हो जाना चाहिए कि हमारे आराध्य ने खुद स्त्री का पद खुद से कहीं ऊपर उठा कर अपने आपको उनके चरणों में समर्पित कर दिया है ।
ये है स्त्री, ये है स्त्री का वो महानतम अस्तित्व जिसके बिना ब्रह्माण्ड की परिकल्पना भी ना कभी पूर्ण हो पाती । शिव इस लिए शिव हैं क्योंकि उनके साथ शक्ति सदैव जुड़ी हुई हैं । पुरुष की शक्ति का आधार है स्त्री, कोई भले इस बात से असहमत हो परन्तु जो इस ब्रह्माण्ड के रचयीता, रक्षक, और पालक हैं उन्होंने ये तब ही प्रमाणित कर दिया जब उमा को शंकर ने, लक्ष्मी को नारायण ने, सीता को राम ने, राधा को श्याम ने, अपने से पहले स्थान दिया । ये साबित करने की आवश्यकता ही नहीं कि स्त्री की महानता क्या है । यह पहले ही पूर्णप्रमाणित है ।
परन्तु सबहे दुःखद यही है कि हम  कन्याओं या महिलाओं को सिर्फ इन्हीं नौ दिनों के लिए देवी का दर्जा दे पाते हैं । जो कन्याएं माता का स्वरूप मान कर इन  दिनों पूजी जाती हैं वही कन्याएं इन नवरात्रों के बाद मनचलों की भद्दी टिप्पणियों से खुद को घिरा हुआ पाती हैं । इन नवरात्रों में भले ही लोग घर घर जा कर कन्याएं बुलाएं, उनके पैर धोएं, उन्हें माता का रूप मानें मगर इन्हीं में से कई उसी माता को गर्भ में ही मृत्यु का ग्रास बनाने से नहीं चूकते । आपको शायद मेरे सवाल चुभेंगे मगर यही सत्य है । हमने परंपराएं तो अपना लीं मगर सिद्धांतों से भटक गये हैं ।


आप आज़मा कर देख सकते हैं कि नवरात्रों में  माता का स्वरूप मान कर जिन कन्याओं के आप पैर पूजते हैं, अगले ही दिन से उनका उनका पीछा किया जाने लगता है । उन्हें स्कूल काॅलेज से आते जाते तंग किया जाता है । माता की भक्ति में लीन हो कर जिस शराब का नौ दिनों तक त्याग करते हैं नवरात्रों के बाद लोग उसी शराब को पी कर घर की महिलाओं पर ज़ुल्म ढाते हैं । जो लोग खुद को माता का भक्त मानते हुए ऐसा करते हैं क्या माता उन्हें कभी माफ़ कर सकेंगी ?
भैरव राक्षस प्रवृति का था फिर भी अंत तक उसने माता के साथ दुरव्यवहार नहीं किया फलस्वरूप माता ने उसे सदैव अपने साथ पूजे जाने का वरदान दिया । बहुत से लोग नवरात्रों में माता की भक्ति के लिए दिल खोल कर खर्च करते हैं मगर अपने घर में पड़ी माँ को दुत्तकारते हैं । इस तरह माँ आपसे कभी प्रसन्न नहीं होंगी इसके विपरीत आप माँ के अपराधी बन जाएंगे ।
पूजा और श्रद्धा के साथ साथ अपने मन में सदाचरण और स्त्रियों के लिए मन में सम्मान का भाव बनाए रखना ही हमारी माता के प्रति सच्ची भक्ति है ।  केवल घर की बहन बेटियाँ ही नहीं अपितु सबकी बहन बेटियों को माता का स्वरूप मानी जानीं चाहिए । सभी स्त्रियों के प्रति आदर का भाव होना चाहिए । स्मरण रहे एक पुरुष जब तक स्त्री को अपने से ऊपर का दर्जा नहीं दे दे तब तक वो पूर्ण पुरुष नहीं कहला सकता और वो स्त्री जो पुरुष के समर्पण को ना समझ सके वो कभी पूर्ण स्त्री नहीं कहला सकती ।
आप सभी को नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं । माँ दुर्गा आपके सभी कष्टों को दूर करें ।
धीरज झा

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