पंजाब में हो रही हिन्दू नेताओं की हत्याएं भी गौरी लंकेश की हत्या के सामान ही चिंता का विषय है

अ भी कुछ दिनों पहले ही गौरी लंकेश पर एक लेख लिखा था. असल में लेख गौरी लंकेश पर नहीं बल्कि देश में हो रही हत्याओं और हत्यारों के बढ़ रहे हौ...

भी कुछ दिनों पहले ही गौरी लंकेश पर एक लेख लिखा था. असल में लेख गौरी लंकेश पर नहीं बल्कि देश में हो रही हत्याओं और हत्यारों के बढ़ रहे हौंसलों को ले कर था. परन्तु उसे गौरी लंकेश से जोड़ कर मुझे काफ़ी लोगों के विरोध का सामना करना पड़ा. मैं नहीं जनता था उस दिन से पहले कि गौरी लंकेश कौन हैं, मैंने बस ये पढ़ा कि तीन हथियारबंद लोगों ने गौरी लंकेश नाम की पत्रकार को गोली मार दी जिससे उनकी मौके पर ही मृत्यु हो गयी.

मेरे लिए हर हत्या चिंता का विषय बन जाती है ये सोच कर कि क्या किसी की जान इतनी सस्ती हो चुकी है. फिर चाहे वो किसी की हत्या हो. आप अगर हत्या का समर्थन कर रहे हैं तो फिर आपको किसी भी हत्या की निंदा करने का अधिकार नहीं. फिर भले ही वो आपके पक्ष में से ही किसी की क्यों ना हो. गौरी लंकेश की हत्या को सही ठहरा दिया गया. लोग दो गुटों में बंट गए, किसी ने समर्थन किया तो कईयों ने विरोध. जैसे ये देश में हो रही हत्याओं का विरोध ना हो कर किसी खास की हत्या का विरोध हो.

कल अमृतसर में हिन्दू सुरक्षा सेना के अध्यक्ष विपिन शर्मा की दो हथियारबंद लोगों ने बीच सड़क पर गोली मार कर हत्या कर दी. हत्यारों की निडरता और बढे हुए हौंसले का अनुमान आप इस बात से लगा सकते हैं कि बीच सड़क में एक के बाद एक 12 गोलियां विपिन शर्मा के शरीर में दागी गयीं. ये कोई नयी बात नहीं थी, पंजाब में दो हफ़्तों के भीतर किसी हिन्दू नेता की ये दूसरी हत्या है, अभी 17 अक्तूबर को लुधियाना में आर एस एस के नेता रविन्द्र गोसाईं की भी इसी तरह हत्या कर दी गयी.

बात जिससे हमें डरना चाहिए वो ये नहीं कि किसी वामपंथी या किसी हिन्दू नेता की हत्या हुई, डरने की बात ये है कि देश में एक के बाद एक लगातार हत्याएं होती जा रही हैं, और इन हत्याओं को आप केवल हत्याएं ना समझें ये संकेत हैं उस घोर संकट का जो देश पर छाने वाला है. इन्हीं आम दिनों की तरह वो भी एक आम दिन ही था, सब कुछ अपने हिसाब से रोज़ की तरह चल रहा था. लोग अपने अपने काम में व्यस्त होने जा रहे थे. मौसम रोज़ की तरह ही साफ़ था और फिर अचानक से खबर आई कि भारत की सबसे सशक्त महिला को उसके ही अंगरक्षकों ने गोली मार दी.

हत्या की खबर पूरे देश में आग की तरह फ़ैल गयी और जगह जगह से हत्या के विरोध में अवाज़ें उठने लगीं. शायद ये हत्या आम हत्या बन कर रह जाती, अंगरक्षकों ने इंदिरा गाँधी जी को गोलियां मारीं और बाक़ी के अंगरक्षकों ने उन दोनो को से छलनी कर दिया. शायद ये हत्या सिर्फ हत्या ही बन कर रह जाती लेकिन अंगरक्षकों के नाम और उनकी वेशभूषा ने इस हत्या को सिखों के नरसंहार की वजह बना दिया. अंगरक्षक इंस्पेक्टर सतवंत सिंह और कांस्टेबल बलवंत सिंह का नाम इस हत्या के साथ जुड़ते ही पंजाब से दिल्ली तक सिखों के विरुद्ध क़त्ल ए आम मचा दिया गया. जो सिख जहाँ मिला उसे वहां ही खत्म कर दिया गया. सिख नौजवानों को आतंकवादी कह कर मारा जाने लगा, पंजाब में हिन्दुओं को मारा जाने लगा. वो दौर इतना भयावह था कि लोग घरों से निकलते हुए भी डरते थे. पिता जी तब नए नए पंजाब में आये थे, वे बताते थे कि “एक बार हमारे बाज़ार में दोपहर के समय बीच बाज़ार एक हिन्दू दुकानदार की हत्या कर दी गयी, हम लोग शाम चढ़ते ही घरों के दरवाज़े अच्छे से बंद कर लिया करते थे. चारो तरफ डर का माहौल था.” 

ये सब हुआ एक हत्या के के कारण, आज फिर से वैसी ही हत्याओं को अंजाम दिया जा रहा है. पंजाब में हुई हत्याओं के में ज़्यादातर सिख बंदूकधारियों की पहचान ही की गयी है, लेकिन मुख्य बात ये है कि इसका सिखों से कोई संबंध नहीं. किसी भी हत्यारे का संबंध किसी भी समुदाय से नहीं होता. लोग तो खुद ही ऐसी घटनाओं से बुरी तरह सहम जाते हैं तो वो भला किसी की हत्या क्या करेंगे. जो पहले हुआ वो सब भी राजनीति थी जो अब हो रहा है वो भी राजनीति है. हत्या भले ही विपक्षी की ही क्यों न हुई हो, आपको डर लग्न चाहिए हत्या से. क्योंकि हत्यारा किसी का सगा नहीं है, कौन जाने कल को किसी के सामने कोई लाल झंडा लेकर तिलक लगा कर पगड़ी या जालीदार टोपी पहन कर आये और उसकी हत्या कर के चला जाए. षडयंत्र है, इसे पहचानिए और इसके विरुद्ध आवाज़ उठिए. वरना आने पीढ़ियों को सड़कों से कचरा नहीं लाशें साफ़ करनी पड़ेंगी.

धीरज झा

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क़िस्सों का कोना : पंजाब में हो रही हिन्दू नेताओं की हत्याएं भी गौरी लंकेश की हत्या के सामान ही चिंता का विषय है
पंजाब में हो रही हिन्दू नेताओं की हत्याएं भी गौरी लंकेश की हत्या के सामान ही चिंता का विषय है
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