और चाँद मुस्कुरा दिया

  दि नकर बाबा आज कुछ ज्यादा ही थक गए थे, इसीलिए आराम फरमाने के लिए धरती की गोद में सरकते चले जा रहे थे । संध्या ने अपनी गुलाबी चुनरी...



  दिनकर बाबा आज कुछ ज्यादा ही थक गए थे, इसीलिए आराम फरमाने के लिए धरती की गोद में सरकते चले जा रहे थे । संध्या ने अपनी गुलाबी चुनरी को चारों ओर फैला दिया था । दिन भर काम से थके लोग भी अब थोड़े आराम की चाह में अपने अपने घरों को जा रहे थे । हर किसी के झोले में कुछ ना कुछ ज़रूर था । किसी ने 400 की देहाड़ी में से 20 रुपए की खुशियाँ खरीद ली थीं अपने बच्चों के लिए तो कोई स्वार्थी अपनी थकान का बहाना बना कर ठेके की तरफ घर का कलेश खरीदने निकल पड़ा था, किसी ने बूढे पिता के लिए आज बुखार के तीसरे दिन कोई एक ज़रुरत मार कर दवाइयां ले ली थीं तो किसी ने राशन का सामान खरीद लिया था ।

मगर इन्हीं जैसों में से एक हरिराम आज फिर अपने झोले में सिर्फ मायूसी बटोरे जा रहा था । आज चौथे दिन भी मज़दूर यूनियन की हड़ताल ना टूटी थी । गेहूं ख़ुशी से पिस रहा था, क्योंकि वो जनता था कि आंटा बन कर महंगे दाम में बिक जायेगा मगर हरिराम जैसे घुन तो बेकार में ही पीसे जा रहे थे । मगर करते भी क्या आखिर थे तो घुन ही ना । वही ठेके का काम, वही रोज़ की देहाड़ी । मगर चार दिन से ये देहाड़ी भी बंद थी । पिछला राशन दो दिन तो भूखे पेट की आग को थोड़ा शांत कर गया मगर बाक़ी के दो दिन पहाड़ लग रहे थे । रोज़ इस आस में घर से जाता कि आज हड़ताल टूटेगी, आज कोई काम मिल जायेगा मगर रोज़ निराशा के सिवा और कुछ हाथ नही लगता था ।

“नुनुआ की माँ ।” अपने क्वाटर के बाहार छोटे से बरामदे में बिछी टाट पर बैठते हुए हरिराम ने थके हुए स्वर में अपनी पत्नी को पुकारा ।

“आज भी नहीं टूटा ना हड़ताल ?” अन्दर से लोटा में पानी लिए संतोषी आई ।

“कैसे जान जाती हो बिना कहे ही सब बात ?” हरिराम ने लोटा पकड़ते हुए कुछ पल को मायूसी चेहरे से उतार कर उसकी जगह मुस्कराहट सजाते हुए कहा ।

“दस बरस हो गया है जी, अब तो आपके बुलाने से ही समझ आ जाता है कि बात खुसी का है कि तकलीफ का ।” पास पड़े गत्ते के टुकड़े को हाथ पंखा बना कर हरिराम को हवा देते हुए संतोषी बोली ।

“रहने दो अब गरम नहीं लगता है, मौसम ठंढाने लगा है ।” मौसम में ठण्ड की आहट महसूस होते ही गरीब का कलेजा एक पल के लिए धक से रह जाता है ये सोच कर कि ठण्ड आ रही है, पता नहीं कैसे समय कटेगा । 

“नहीं तो अभी कहाँ ठंढा आया है, छठ बाद ठंढा पड़ता है । देखिए आपको पसेना आ रहा है ।” संतोषी ने मन में ठान ही लिया था कि दिसंबर के अंत से पहले वो मानेगी ही नहीं कि ठण्ड पड़ने लगी है । अगर वो ना मानती तो हरिराम को इस तंग हाली में ओढना बिछौना का चिंता भी खाने लगता और वो ऐसा कभी नहीं चाहती थी ।

“आज भी हड़ताल नहीं टूटा । बड़का सब अपना काम अच्छा से चला ही रहा है मगर हम जैसा गरीब सब को सौ रुपैया रोज बढ़ने के नाम पर ई पांच पांच दिन भूखे मार रहा है । 

“अरे आप बेकार का चिंता करते हैं जी, हम मंगला के इहाँ से आंटा ले आये हैं । उसको कोटा में से गहूम मिल जाता है ना तो उसके पास आंटा था । बिहान तक काम चल जायेगा । आप देखिएगा बिहान हड़तालो टूट जाएगा । फिर सब ठीक हो जायेगा ।” हमेशा ही संतोषी की बोली हरिराम के शरीर का सारा थकान निचोड़ लेती है । उसको अपना मन शांत करने के लिए बस संतोषी को एक तक ताकते भर की ज़रुरत ही होती है ।

हरिराम ने अपनी सारी चिंता को किनारे रख कर संतोषी की ओर देखते हुए बड़े शरारती लहज़े में कहा “तुम बोलती बहुते अच्छा हो नुनुआ की माँ ।”

“आपका भी नहीं बुझाता, अभिये केतना टेंसन में थे आ अभिये कईसे बोल रहे हैं ।” संतोषी शर्मा गयी थी ।

हरिराम कुछ और भी कहता मगर तब तक नुनुआ आगया था । फिर संतोषी खाना बनाने चली गयी । रात के समय नुनुआ को खिला कर संतोषी ने हरिराम के लिए खाना परोसा । रोटी और नमक और सूखी मिर्च की चटनी हरिराम के आगे परोस दी संतोषी ने ।

“दाल हम नुनुआ को खिला दिए, आज भर खा लीजिए कल सब ठीक हो जायेगा ।” संतोषी कितनी आशावादी है ये सोच कर हरिराम गहरे से मुस्कुरा दिया ।

“कल क्या होगा वो छोड़ो, आओ पहले खाना खा लें ।”

“अरे आप खाइए ना, हम बर्तन मांज कर खा लेंगे ।” संतोषी ने हरिराम की बात को टालते हुए कहा ।

“बचा होगा तब ना खाओगी, हम जानते हैं इतना ही रोटी बनाई हो और बांकी का कल के लिए बचा ली हो । अब चुप चाप खा लो ।” संतोषी अपनी चोरी पकडे जाने पर झेंप गयी । दोनों ने साथ साथ खाना खा लिया । पेट भले ही दोनों का ना भरा हो मगर खाने में प्यार की मात्र इतनी थी कि दोनों का मन ज़रूर भर गया । कल कुछ अच्छा होगा इस उम्मीद के साथ दोनों एक दुसरे की तरफ़ देख कर मुस्कुराते हुए सपनों की दुनिया घूमने निकल पड़े ।

अगले दिन सुबह के चार बजे 

बर्तनों की आवाज़ से हरिराम की नींद खुल गयी । उसने बिस्तर पर देखा तो संतोषी नहीं थी । “अभी तो दिन भी नहीं चढ़ा फिर संतोषी काहे उठ गयी” यही सोच कर हरिराम भी बिस्तर से उठ गया । बाहर जा कर देखा तो संतोषी के हाथ में गुड़ का एक टुकड़ा था जिसके साथ वो पानी पी रही थी ।

“कहे थे थोडा और खा लो हमारी रोटी में से बात नहीं मानी, अब देखो खाली गुड़ का डिब्बा झाड़ कर खा रही हो ।” हरिराम ने संतोषी से मजाक करते हुए कहा ।

“नहीं भूख थोड़े ना लगा है । ऊ आज पानी नहीं ना पीना है इसी लिए अभी पानी पी रहे थे । भोरे भोरे खली पानी नहीं घोंटा रहा था तो गुड़ वाला डिब्बा झाड़ लिए ।” अपनी बात बताते हुए संतोषी के चेहरे पर पांच साल की बच्ची जैसी मासूमियत झलक रही थी ।

“कहे आज पानी कहे नहीं पीओगी ?” 

“ऊ आज, करवाचौथ का पबनी है ना इसीलिए ।” संतोषी व्रत की बात बताते हुए शर्मा गयी ।

“अरे ई सब कबसे करने लगी तुम । चार दिन से तो पबनीये कर रही हो तब इसका क्या जरूरत है बताओ । वैसे भी तुम हमारे साथ हो ना हमको कुछो नहीं होगा । ई सब बड़ा लोग का बात है पगली ।” हरिराम ने संतोषी को समझाते हुए कहा ।

“नहीं जी ऐसा नहीं बोलिए, ई सब अपना संतुस्टी का बात होता है । जब तक हम नहीं जानते थे हम नहीं किए लेकिन अब सब औरत लोग करती है तो हमको भी करना है । सब अपना पति से प्रेम करती है तो रखती है, तो सोचो हम तो आपसे बहुते जादा.....” इस से आगे संतोषी शर्मा गयी के चुप हो गयी ।

“हम जानते हैं तुम हमसे बहुत प्रेम करती हो मगर.....”आगे कुछ बोलने से पहले संतोषी ने अपनी ऊँगली हरिराम के होंठों पर रख दी । हरिराम बेचारा पत्नी की जिद के आगे मुस्कुराने के सिवा और कुछ नहीं कर पाया ।

आज हड़ताल टूट जाएगी इस आस में हरिराम काम पर जाने के लिए निकलने लगा तो संतोषी ने उसे टोका “अरे दू ठो रोटी खा लीजिए तब जईयेगा ।”

“अरे नहीं रात का मिरचाई वाला चटनी गर्मी कर दिया है, पेट ठीक नहीं है । क्या पता आज भी हड़ताल नहीं टूटा तो रात में फिर वही खाना होगा इसी लिए अभी नहीं खायेंगे । हड़ताल नहीं टूटा तो आज जल्दी घर आजाएंगे ।” इतना कहते हुए हरिराम ने अपने कदम तेज़ कर लिए ।

“हाँ आज कईसे भी कर के जल्दी आइयेगा ।” संतोषी की बात पर मुस्कुराते हुए हरिराम आगे बढ़ गया ।

शाम घिर आई थी, हरिराम अभी तक घर नहीं लौटा था । संतोषी को पूरी उम्मीद थी कि आज पक्का हड़ताल टूट गयी होगी । संतोषी को ना जाने क्यों आज बहुत घबराहट हो रही थी । हरिराम भी अभी तक लौटा नहीं था, जबकि वो इतनी देर नहीं करता था । संतोषी की बेचैनी बढती जा रही थी । 

इतने में हरिराम सामने से आता दिखा । संतोषी ने सोच लिया था कि आज वो हरिराम को टोकेगी नहीं, क्योंकि उसने उसकी बात नहीं मानी । मगर जब हरिराम पास आया तो उसके सर पर बंधी पट्टी देख संतोषी अपना सारा गुस्सा भूल गयी ।

“हे भगबान, ई क्या हो गया जी ।” संतोषी ने हैरानी में पूछा ।

“अरे कुछो नहीं जरा सा चोट है ।”

“जरा सा चोट है ई ? इतना बड़ा पट्टी बंधा है आ कहते हैं जरा सा चोट है । आप ठीक हैं ना ।” संतोषी की बेचैनी बढती जा रही थी ।

“हाँ हाँ एक दम ठीक हैं, ई लो इसमें मिठाई है और रासन है ।” हरिराम ने ख़ुशी से थैला संतोषी की ओर बढ़ाते हुए कहा ।

“अरे आग लगे मिठाई आ रासन में, आप ई बताइए ई सब कैसे होगया । ई चोट कैसे लगा ।” हरिराम अपनी पीड़ा भरी कराहटों को छुपाने की कोशिश तो कर रहा था मगर वो संतोषी से छुप ना पायीं ।

“बताते हैं जरा साँस लेने दो । दिन में जब गए काम के लिए तो पता चला हड़ताल नहीं टूटा है । हम बहुत मायूस हो कर लौट ही रहे थे कि एक ठो सेठ जी मिल गए । उनको मजदूर नहीं मिल रहा था । हमको बोले कि हजार रुपईया देंगे देहाड़ी का । सीमेंट लोड करना ट्रक में । काम भरी था मगर पईसा अच्छा था इसीलिए हम हाँ बोल दिए । सारा काम हो गया लेकिन अंत में देह में बहुत कमजोरी बुझाने लगा और हम सीमेंट के बोरी लिए गिर गए । सर हमारा एक ठो पत्थर से जा टकराया, ऊ तो तुम्हारा ही पुन परताप था जो बाख गए नहीं तो कहीं सीमेंट का बोरा हमारे सर पर गिरता तो समझो बचते नहीं । सेठ जी अच्छा आदमी थे अपने से इलाज करा दिए आ इहाँ तक छोड़ भी गए ।” हरिराम बोलता रहा संतोषी आंसू बहती रही ।

“आपको कहे थे कुछो खा लीजिए, इहाँ नहीं तो बहार ही खा लेते मगर आप हमारा सुनते कहाँ हैं ।” संतोषी अब बच्चों की तरह रोने लगी ।

“तुम भी हमारा कहाँ सुनती हो, हम बोले थे मत करो पबनी लेकिन नहीं सुनी । अब तुम भूखी रही तो हम कईसे खा लेते । सेठ जी के यहाँ नास्ता मिला था हम ही नहीं किये । हाँ एक ठो गलती हो गया दबाई खाना था तब पानी पीना पड़ा । देखना कहीं हमारा पबनी टूटने से तुम मत मार जाना ।” हरिराम की आखरी बात पर संतोषी रोते हुए भी हँस पड़ी । उसकी आँखों में हरिराम के प्रति पहले से कहीं ज्यादा स्नेह उमड़ आया ।

“आप नहीं सुधरिएगा कब्बो । और हम नहीं मरने वाले इतना जल्दी जान लीजिए । अब जल्दी चलिए चंदरमा देख के कुछो खा लिया जाए ।

“हाँ चलो, सब आज का पबनी ख़तम करेगा आ हम लोग तीन दिन से सह रहा पबनी समाप्त करेंगे ।” हरिराम की बात पर दोनों खिलखिला कर हँस पड़े । उधर नुनुआ सब बातों से अंजान झोले में से मिठाई निकल कर उसे अमृत जान गपागप खाने लगे । उसे खाता देख दोनों की जैसे तीन दिन से जल रही भूख की आग अचानक से शांत हो गयी । सब चाँद को देख अपना व्रत तोड़ में लगे हुए थे और चाँद इन दोनों के प्रेम को देख कर अपने चेहरे पर सुकून भरी मुस्कराहट सजाए बैठा था ।


धीरज झा  

Web Title: Hindi Story, Love Story, Karwachuth, Fasting, Meaning of Real Life

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