संझिया घाट और अंतिम संस्कार

"ऐ सुबोध हमको गाँव ले चलो, तुम्हारा बड़ा अहसान मानेंगे । इस बार हमको छठ पूजा देखने का बड़ा मन है ।" महंगे डाईनिंग टेबल पर नाश्ते ...

"ऐ सुबोध हमको गाँव ले चलो, तुम्हारा बड़ा अहसान मानेंगे । इस बार हमको छठ पूजा देखने का बड़ा मन है ।" महंगे डाईनिंग टेबल पर नाश्ते की प्लेट को अपनी बेबस नज़रों से देखते हुए मधुसूदन जी ने कांपती आवाज़ में वही रटी रटाई बात अपने बेटे सुबोध से कही ।

समय बहुत बलवान है, देखते ही देखते रौब को कब मिन्नतों के सहारे जीने पर मजबूर करदे इसका पता ही नहीं लगता । राजा से रंक वाला उदाहरण तो सौ में से एक आध ही देखने को मिलता है मगर एक पिता का उदाहरण समय की निर्दयीता का सबसे प्रबल उदाहरण है । किसी समय जिस पिता का दबदबा पूरे परिवार पर कायम होता है वही पिता समय बदलते ही व्यस्त बेटे के सामने अपनी एक बात दोहराते हुए भी डरता है ।

"क्या पिता जी आप भी गाँव की रट लगाए रहते हैं । क्या कमी है आपको यहाँ पर । गाँव के गरीब भूखे लोग शहर देखने को तरस जाते हैं और मैं आपको विदेश तक ले आया । लेकिन आप तो यहाँ भी संतुष्ट नही हैं । देखिए पिता जी, काम का इतना ज़्यादा प्रैशर है कि मेरे पास घर के कई महत्वपूर्ण काम सम्पन्न करने तक का समय नहीं है तो भला आपको गाँव घुमाने का समय भला कहाँ से निकालूं । इसलिए गाँव की रट लगाना बंद करिए । मैं चलता हूँ, आपकी बहू रात की शिफ्ट पूरी कर के आती ही होगी वो तब तक आप विशू का ख़्याल रखना ।" सुबोध अपनी बात पूर कर के पिता की प्रतिक्रिया का इंतज़ार किए बिना ऑफिस के लिए निकल पड़ा ।

मधुसूदन जी कातर नयनों से जाते हुए बेटे को निहारते रहे । धीरे धीरे आँखों के आगे आँसुओं की परत जम गयी और बेटा आँखों से ओझल हो गया । तभी यादों का एक तेज़ झोंका बहा और उन्हें उड़ा कर आज से कई वर्षों पहले के उस दौर में ले खया जब संयुक्त परिवार से ले कर गाँव की चौपाल तक उनका दबदबा हुआ करता था । सुबोध लाख शैतान था मगर अपने पिता जी के आने की आहट पाते ही गऊ जैसे शांत और मासूम बन कर एक कोने में बैठ जाया करता था । मधूसूदन जी ऊपर से बहुत सख़्त थे मगर उन्होंने कभी बेटे की कोई ख़वाहिश नहीं मारी । किसी भी बात के लिए पहले मना कर देते मगर फिर बाद में सुबोध की माँ द्वारा स्वकृति भी दे देते । बड़ा सम्मान था उनका पूरे गाँव भर में । भरा पूरा परिवार था, ज़मीन जायदाद भी अच्छी थी । मगर फिर उनकी किस्मत को ऐसा ग्रहण लगा कि कुछ एक सालों में ही सब बिखर गया । धर्मपत्नी का अकस्मात देहांत, भाईयों के बीच बटवारा और अपने फैसले खुद लेने की काबलियत का अहसास होते ही सुबोध का देश छोड़ देने का फैसला लेना इन सब घटनाओं ने मधुसूदन जी को तोड़ कर रख दिया ।

अब गाँव काटने को दौड़ता था । चौपाल की बैठकों में जाना बंद कर दिया था, अकेले सारा दिन कमरे में बंद रहने लगे थे । यह खबर जब सुबोध तक पहुंची तो सबकी नज़रों में एक अच्छा बेटा कहलवाने की लालसा में उसने पिता जी को अपने साथ विदेश ले जाने का फैसला कर लिया । मधूसूदन जी कुछ कहने की हालत में नहीं थे इसीलिए चुप चाप बेटे के साथ चल दिये । दूसरी तरफ पूरे गाँव में सुबोध सर्वण पुत्र कहला गया । मगर जब मधुसूदन जी विदेश आ गये तब उन्हें अहसास हुआ कि गाँव के मुकाबले ये नई जगह उनके लिए किसी मीठी जेल से कम नहीं है । यहाँ जो कुछ है सब दिखावा है । किसी ग़ैर की बात तो दूर यहाँ तो अपनों को अपनों से कोई मतलब नहीं । गाँव में जिस मधुसूदन की बात पंचों की बात से ऊपर हुआ करती थी उसकी यहाँ कोई बात सुनने वाला तक नहीं । मधुसूदन जी को पता था उनका अंत समय निकट आ रहा है और वो अपनी आखरी सांस अपनी मिट्टी की गंध लेते हुए छोड़ना चाहते हैं । उन्हें जीवन से अंतिम विदा लेने से पहले एक बार गाँव की छठ पूजा देखनी है, अपनी संस्कृति को जीना है । मगर उनकी अभागी किस्मत को इतना भी मंज़ूर नहीं था ।

"दादू वाय आर यू वीपिंग ?" यादों के भंवर में फंसे मधूसूधन जी ने अपने गालों पर नन्हें हाथों का स्पर्श महसूस किया तो झट से अपने ध्यान से बाहर आ गये ।

"कुछ नहीं बेटा, ऐसे ही आँख में कुछो पड़ गया था ना इसलिए आँसू आ गये ।" पोते को गोद में उठाते हुए मधूसूदन जी ने बात बदल दी ।

इतनी देर में नैंसी अपनी शिफ्ट पूरी कर के घर आ चुकी थी । अपनी मम्मी को देखते ही विशू भाग के उससे लिपट गया । नैंसी अपने ससुर की भावनाओं को महसूस तो कर सकती थी मगर उनका उनके गाँव के प्रति लगाव क्यों इतना अधिक है इसका अहसास उसे नहीं था । होता भी कैसे उसने तो कभी अपना देश देखा ही नहीं था । फिर भी वो सुबोध से ज़्यादा मधुसूदन जी को समझती थी, लेकिन यहाँ की व्यस्त ज़िंदगी के आगे उसके भी घुटने टिक गये थे इसलिए वह भी उनकी कोई मदद नहीं कर सकती थी ।

"पिता जी खाना लगा दूँ ?"

"नहीं बहू मुझे भूख नहीं है । मैं ज़रा सोने जा रहा हूँ ।" मधूसूदन जी इतना कह कर अपने कमरे में चले गये ।

मन उचाट सा हो गया था । आज गाँव के साथ साथ वो सभी चेहरे याद आ रहे थे जिनसे उनका लगाव रहा था । सबसे ज़्यादा आज उन्हें अपनी पत्नी की याद आ रही थी । उन्हीं के कारण तो वो यहाँ फंसे थे । एक वो ना असमय उन्हें छोड़ कर गयी होतीं तो वो अपने अकेलेपन से भागते हुए इस जेल में कभी ना आते । यही सब सोचते सोचते एक लंबी सांस खींच कर मधूसूदन जी गहरी नींद में सो गये । आज वर्षों बाद ऐसी नींद आई थी उन्हें । मन भले असंतुष्ट हो मगर चेहरे पर संतोष नज़र आ रहा था । नींद इतनी गहरी थी कि दोपहर चलते चलते रात की दहलीज पर आ पहुंची थी मगर मधुसूदन जी अभी भी गहरी नींद में थे ।

"पिता जी ने आज भी खाना नहीं खाया ।" नैंसी की बात में थोड़ी चिंता झलक रही थी ।

"अरे उनका रोज़ का है । अब इतने काम के बोझ के नीचे दबा हूँ, इस बीच उन्हें गाँव की सैर कैसे करवा लाऊं । बाक़ी ये उम्र ही ऐसी है । कुछ देर में अपने आप सही हो जाएंगे ।" सुबोध ने लैपटाॅप पर नज़रें गड़ाए हुए बात ऐसे हवा में उड़ा दी जैसे ये सब बेफिज़ूल हो ।

"पता नहीं मेरा मन घबरा रहा है आज, वो दोपहर के बाद अपने कमरे से भी नहीं निकले । शाम को विशू के साथ वाॅक पर भी नहीं गये ।"

"तुम बेकार में घबराती हो । अच्छा मैं देख कर आता हूँ ।" नैंसी के बार बार कहने पर सुबोध अनमने मन से पिता जी के कमरे तक गया ।

उसने दरवाज़ा खटखटाने की कोशिश की तो पाया कि दरवाज़ा पहले से ही खुला है । अंदर गया तो देखा पिता जी चैन से सो रहे हैं । मगर दिक्कत ये थी कि यह चैन जितना होना चाहिए उससे कहीं ज़्यादा ही पसरा हुआ था उनके चेहरे पर । सुबोध ने जैसे ही उनका पीला पड़ चुका चेहरा देखा तो एकदम से उनकी तरफ दौड़ कर उनकी नब्ज़ टटोलने लगा । मधुसूदन जी हमेशा के लिए लंबी नींद सो चुके थे । उनकी आखरी सांस शायद कुछ घंटे पहले ही अपने वतन की मिट्टी की सुगंध खोजने निकल पड़ी थी । सुबोध ने नैंसी को बुलाया । देखते ही देखते जान पहचान वाले कुछ लोग भी जुट गये । हर किसी के चेहरे पर झूठी संवेदनाओं का मुखौटा चढ़ा हुआ था ।

सबने सलाह दी कि कल संस्कार कर देते हैं क्योंकि कल छुट्टी है । सुबोध को इन सब बातों के बीच अपने चाचा की एक बात याद आगयी, जब वो पिता जी को अपने साथ ला रहा था तब उन्होंने कहा था कि "अपने व्यस्त जीवन में से कुछ समय निकाल कर भाई साहब को यहाँ लाते रहना । ऐसा ना हो कि इनकी अर्थी को हम कंधा भी ना दे पाएं ।" तब सुबोध ने भी खुद को होनहार बेटा साबित करने के लिए कह दिया था कि "नहीं चाचा जी ऐसा नहीं होगा । पिता जी को अभी बहुत दिन जीना है और अगर भगवान ना करे ऐसा कुछ हुआ भी तो इनकी देह गाँव के पंच त्वों में विलीन होगी ।"
सुबोध खुद को बुरा नहीं कहलवाना चाहता था । उसने फैसला कर लिया कि अब पिता जी का संस्कार गाँव में ही होगा । मधुसूदन जी का शव अपने संस्कार के इंतज़ार में ऐसी वाले बाॅक्स में बंद हो गया । सायद वहाँ पड़ा पड़ा उनका शव भी अपनी बदकिस्मती पर रो रहा था कि मरने के बाद भी कैद ही होना पड़ा । सप्ताह भर की कागज़ी कार्यवाही के बाद सुबोध को शव सहित भारत आने का वीज़ा मिल गया । गाँव में मधुसूदन जी की मृत्यु की खबर आग की तरह फैल गयी । आज भी वे अपने गाँव में पुराने नहीं हुए थे ।

सुबोध जब शव के साथ गाँव पहुंचा तो देखा कि उससे ज़्यादा वहाँ के लोग उसके पिता के लिए आँसू बहा रहे हैं । अगले दिन ही मधुसूदन जी का दाह संस्कार था । बिना किसी न्यौता पिहानी के पूरा गाँव उनके अंतिम दर्शन को उमड़ पड़ा था । संयोग से आज छठ का संझिया घाट भी था । एक घाट पर मधुसूदन जी का शव संसारिक जीवन को अंतिम विदा कहने वाला था तो दूसरे घाट पर परंपरा अपने पूरे रंग में थी । सुबोध के पास समय नहीं था मगर मधुसूदन जी की भी ज़िद्द थी इस बार छठ देखने की । एक तरफ छठी घाट की ओर डाला सब ले जाया जा रहा था एक तरफ उनकी अर्थी को लोग घाट पर ले जा रहे थे ।

सूरुज बाबा को अर्घ पड़ने के साथ ही मधुसूदन जी का शव भी अग्नि को समर्पित हो गया । आग की लपटों के साथ साथ उठ रहे धुएं की ओट में से मधुसूदन जी मुस्कुरा रहे थे । उन्होंने अपने दोनों हाथ सूरुज बाबा की ओर कर के उन्हें प्रणाम किया और अंतिम विदाई ली । इधर वहाँ मौजूद सभी लोगों में ये चर्चा शुरू हो गयी थी कि "बेटा हो तो सुबोध जैसा, सात समंदर पार से अपने गाँव आगया पिता का अंतिम संस्कार करने ।"

धीरज झा

Keywords : Hindi Story, Old Age, Father's Love, Chhath Puja, Mother Land

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