गोपालदास और उसकी वफ़ादार कहानियाँ

"वो राजा बड़ा शक्तिशाली था । उसकी तलवार अंधेरे में भी सूरज की किरणों की तरह चमचमाती थी । एक बार युद्ध में उसने अकेले ही दुश्मन के सारे...

"वो राजा बड़ा शक्तिशाली था । उसकी तलवार अंधेरे में भी सूरज की किरणों की तरह चमचमाती थी । एक बार युद्ध में उसने अकेले ही दुश्मन के सारे सिपाही मार गिराए थे।" गोपालदास अपनी कल्पनाओं की दुनिया से शब्दों को पकड़ पकड़ कर बच्चों के सामने हाज़िर कर रहा था । गोपालदास की आँखें बंद और ज़ुबान चल रही होती, मानो जैसे वह उस दृश्य का आँखों देखा हाल बच्चों को सुना रहा हो । मुंह टेंढ़बा मास्टर साहेब की क्लाॅस के बाद बच्चे सबसे ज़्यादा शांत यहीं पाए जाते । गोपालदास इतनी सच्चाई के साथ अपनी सारी कहानियाँ बच्चों को सुनाता कि बच्चे उसकी कहानी का एक भी शब्द अनसुना ना करना चाहते । स्कूल के बाद एक घंटे उस बूढ़े पीपल के नीचे बच्चों की भीड़ बूढ़े गोपालदास की कहानियाँ सुनने के लिए इक्कट्ठी हो ही जाती । गोपालदास की आँखें अपनी काल्पनिक कहानियों को घूर रही होतीं और बच्चों की आँखें गोपाल दास को ।

आज पूरे तीन साल भर से यही खेल चल रहा है । कभी गोपालदास पंख लगे घोड़े की दास्तान सुनाता जिसने सूरज को अपनी पीठ पर बिठा कर पूरी दुनिया घुमाई थी, तो कभी उसकी कहानियों में वो परियाँ आ जाया करतीं जो बच्चों के सोने के बाद उनकी भूतों से रक्षा करती हैं । बच्चे भी उसकी कहानियों का खूब आनंद उठाते । कोई सवाल नहीं करता था । किसी ने सवाल कर लिया तो गोपालदास गुस्सा हो कर कह देता कि "अगर ऐसे ही टोकोगे तो मैं कहानियाँ नहीं सुनाऊंगा ।" इतना सुनते बच्चे एकदम शांत हो जाते ।
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इसी स्कूल में चपड़ासी हुआ करता था गोपालदास । बाल बच्चा कोई था नहीं और बीवी को छः साल पहले हैजे की बिमारी ने इतनी ज़ोर से जकड़ा कि उसे अपने साथ ही ले गई । पत्नी के जाते ही गोपालदास अकेला हो गया । उसका सहारा थे तो बस स्कूल के ये बच्चे । तीन साल पहले उसकी रिटायरमेंट का ऑर्डर भी आगया । रिटायरमेंट का नाम सुनते उसका मन बेचैन होगया था । वो सोचने लगा कि वो अब कैसे जिएगा अकेला । अब तो स्कूल भी नहीं होगा जहाँ वो बच्चों के हंसते मुस्कुराते चेहरे देख दिन का कुछ वक्त गुज़ार ले । एक दिन उसने सोचा कि क्यों ना वो बच्चों को स्कूल के बाद एक घंटा कहानियाँ सुनाया करे जिससे सारे बच्चे कम से कम एक घंटे तो उसके साथ रहेंगे ।

इसी तरह वो बच्चों को रोज़ कहानी सुनाता । इससे उसका एक घंटा कहानियाँ सुनाने में बीत जाता और बाकी का वक्त अगले दिन कौन सी कहानी सुनाए ये सोचने में । तीन साल में उसने एक भी दिन बिना नागा किए बच्चों को कहानियाँ सुनाई थीं । झूठी मन गढ़ंत कहानियाँ । मगर उसे मलाल नहीं था कि वो खुद से गढ़ी कहानियाँ सुनाता है क्योंकि उसे बस बच्चों के संतुष्ट चेहरे और उन चेहरों में अपना सुकून दिखता था ।

मगर अब मुसीबत यह आन खड़ी हुई थी कि उसके पास अब कहने को कहानियाँ बची नहीं थीं । उसने जितनी कहानियाँ अपनी दादी और माँ से सुनी या खुद से सोची थीं वो सब खत्म हो गई थीं । अब उसे डर सता रहा था कि बच्चे उसके पास नहीं आया करेंगे । उसने दुनिया देखी थी उसे पता था कि बच्चे भले ही भगवान का रूप हों मगर हैं तो इंसान हीं ना ! जब इन्हें कहानी नहीं सुनाऊं तो यह मेरे पास क्यों बैठेंगे । वो जानता था बड़ा हो या छोटा होते सब मतलबी ही हैं ।

जवानी निर्भीक होती है मतलबी होती है जोशीली होती है मगर बच्चपन और बुढ़ापा बच्चकाना होता है ज़िद्दी होता है छोटी छोटी बातों से डर जाने वाला होता है । टूटने का डर या तो छोटी सी डाली को होता है या सूख चुकी बूढ़ी डाली को । पक्क चुकी मोटी लहलहाती डालियों को कोई भय नहीं लगता, वो तूफानों में मदमस्त हो कर झूलती हैं । उन्हें पता है वो जब भी गिरेंगी पेड़ के साथ ही गिरेंगी । गोपालदास बूढ़ी डाली था उसे डर था कि बच्चों के मायूस चेहरे देख कर वो कहीं टूट ना जाए ।

 रविवार का दिन था । बच्चों के आने में दो घन्टों से ज़्यादा का समय बाकि था मगर गोपालदास आज पहले ही आ चुका था । आज उसके पास कोई कहानी नहीं बची थी । उसने अपनी ज़िंदगी में जितने दृश्य देखे उन सबको कल्पना के रंग से पोत कर बच्चों के सामने रख दिया था । अब वो और नहीं सोच पा रहा था । उलझा हुआ इंसान जितना सोचता है उतना उलझ जाता है । उलझन से निकलने का आसान तरीका है शांत हो कर हवा के साथ बहते जाना । मगर गोपालदास घिर चुका था, वहीं, उन्हीं उलझनों के बीच । बार बार यही बड़बड़ा रहा था "आज ये बच्चे भी मुझे छोड़ जाएंगे । आज मैं एक दम अकेला हो जाऊंगा । अब तो मेरे पास यादें भी नहीं बचीं, अब मैं किसके सहारे जीऊंगा ।" इन्हीं शब्दों के साथ वो अपनी पत्नी को याद करने लगा । उसने आँखें बंद कर ली थीं, ठीक वैसे ही जैसे वो रोज़ कर लेता था ।

जैसे जाल में फंसी मछली सामने की तरफ़ निहारती रहती है ठीक वैसे ही आँखें मुंदे हुए गोपालदास उलझनों के जाल में फंसा हुआ सामने खड़ी अपनी पत्नी को निहार रहा था । आँखों में एक नई कहानी की उम्मीद लिए हुए बच्चे आना शुरू हो गए थे । गोपालदास को पहले से वहाँ पा कर सब बच्चे बहुत खुश हो गए थे । उन्हें यकीन था आज गोपाल दादा उन्हें सबसे बेहतरीन कहानी सुनाएंगे इसीलिए वो पहले आगए हैं । सभी बच्चे आगए थे मगर गोपालदास अपनी उलझनों से निकल नहीं पाया था । उसकी आँखें बंद थीं अभी भी ।

अब बच्चों के बर्दाश्त की हद हो गई थी । उनमें से एक उठा उसने गोपालदास को हिलाते हुए कहा "गोपाल दादा हम सब आ गए कहानी सुनाओ ना । गोपाल दादा, गोपालदादा ।" बच्चे के हिलाते ही गोपालदास बेसुध सा गिर पड़ा । सभी बच्चे उन्हें उठाने में लग गए मगर वो इस बात से अंजान थे कि गोपाल दादा को तो उनकी पत्नी उलझनों के जाल से छुड़ा कर अपने साथ ले गई ।

गोपालदास जो बच्चों को रोज़ कहानी सुनाता था वो आज खुद एक कहानी बन कर रह गया । बच्चों की आँखों से गिरते आँसू उसकी कहानियाँ थीं जो उसे श्रद्धांजली भेंट कर रही थीं । उसकी कहानियों ने हमेशा उसका अकेलापन दूर किया और आज उसे इतने पवित्र आँसुओं के साथ विदाई भी दिलाई । बच्चों के आँसुओं के रूप में आज गोपालदास की कहानियों ने अपनी वफ़ादारी साबित कर दी थी ।

धीरज झा

Keywords : Hindi Story, Old Age, Hindi Kahanikar, Addiction

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गोपालदास और उसकी वफ़ादार कहानियाँ
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