बाऊ जी क्यों आए थे ?

"सु बह सुबह दिमाग खराब कर दिया, छुट्टी की ऐसी तैसी हो गयी ।" इसी भनभनाहट के साथ विलोम ने मेन गेट से घर में प्रवेश किया था । आज ...

"सुबह सुबह दिमाग खराब कर दिया, छुट्टी की ऐसी तैसी हो गयी ।" इसी भनभनाहट के साथ विलोम ने मेन गेट से घर में प्रवेश किया था । आज छुट्टी थी मगर बाॅस के एक काम से सुबह सुबह ही अपनी उस प्यारी नींद जो सिर्फ छुट्टी के दिन नसीब होती है को अलविदा कह कर बाहर जाना पड़ा था विलोम को । बस उसी कारण झल्लाया हुआ था ।

"माँ, कहाँ हो ?" घर में घुसते ही विलोम ने ज़ोर से आवाज़ लगाई ।

"भईया माँ और पापा बाहर गये हैं, बोल कर गये हैं थोड़ी देर में आएंगे । आपका नाश्ता तैयार कर दिया है आप खा लेना, मैं श्रुति के यहाँ जा रही हूँ ।" नीलू सारी बात बता कर चली गयी । इधर विलोम कपड़े बदलने अपने कमरे में चला गया । कुछसदेर बाद किसी ने दरवाज़ा खटखटाया । सुबह मजबूरी में नींद को अलविदा कहना पड़ा था इसीलिए अभी फिर से सोने की कोशिश कर रहा था विलोम मगर दरवाज़े पर हुई दस्तक ने फिर से उसे जगा दिया । वो समझ गया कि आज मनचाही नींद नसीब ना हो पाएगी । थोड़े से मायूस चेहर के साथ विलोम ने दरवाज़ा खोला ।

"अरे बाऊ जी आप ?" विलोम ने आश्चर्य के साथ पूछा ।

"क्यों भई मेरे आने पर मनाही है क्या ?" सामने खड़े लगभग अस्सी पचासी साल के बुज़ुर्ग ने थोड़े मज़ाकिआ लहज़े में अपनी बात कहते हुए घर के बहुत परिचित व्यक्ति की तरह घर में प्रवेश किया ।

"अरे नहीं बाऊ जी, मेरा मतलब था कल ही सुना था आप बहुत बीमार हैं और आज आपको ऐसे अकेले देख कर बहुत आश्चर्य हुआ इसीलिए पूछ लिया । बाक़ी हम तो आपके बच्चों के बच्चे हैं और ये आपका अपना घर ।" विलोम ने खुले दिल से बाऊ जी का स्वागत करते हुए उनके पैर छूए ।

"हाँ बेटा, घर तो मेरा अपना ही है । तेरे पिता के जन्म से पहले का है ये घर, तेरे दादा के साथ मेरा बच्चपन भी यहीं बीता है । कभी लगा ही नहीं कि हम दोनों अलग अलग घर के बच्चे हैं । हमेशा एक साथ ही रहना, कभी वो मेरे घर तो कभी मैं यहाँ इस घर में । सच में सच्चा साथी था तेरा दादा । वो क्या गया मुझे अकेला कर गया । मगर कोई ना अब उससे जा कर मिलूंगा ।बहुत सी बातें करनी हैं उससे ।" अपनी कांपती मगर भारी आवाज़ में बाऊ जी ने अपनी पुरानी यादों का पिटारा खोल दिया और भावुक हो गये ।

"अरे बाऊ जी अभी आपको कहीं नहीं जाना, अभी तो हम सबने आपसे बहुत कुछ सीखना है । अच्छा ये बताईए अब आप ठीक तो हैं ना ? कोई दिक्कत तो नहीं ।" उनके मुंह से मरने की बात सुन कर विलोम ने बात बदलने की कोशिश की ।

"बेटा दिक्कत तो बहुत सी हैं, दिक्कतों का क्या है इतनी लंबी ज़िंदगी जी लीं मगर ये खत्म होने का नाम ही नही लेतीं । बड़ी उम्मीद से बच्चों को पढ़ाया लिखाया । सोचा मेरे बुढ़ापे तक सब अच्छे से सेट हो जाएंगे तो हँसता मुस्कुराता परिवार देख कर चैन से मरूंगा । बच्चे सेट भी हुए, बेटी अच्छे घर चली गयी, दोनों बेटे सरकारी नौकर हो गये । अच्छा खासा भरा पूरा परिवार है । मगर खुशियाँ कहीं नहीं हैं बेटा, बड़ी बहू मीना और छोटी मनू दोनों एक दूसरे को देखना तक नहीं चाहतीं । मेरी अगर थोड़ी बहुत सेवा होती है तो बस इसलिए कि कहीं घर और गाँव की ज़मीन उनके हाथ से ना चली जाए । अरे भला खुश रहने के लिए चाहिए ही क्या सिर्फ आपस में हँस कर बोलना ही तो होता है, मगर इनसे इतना भी नहीं हो पाता । बढ़ती उम्र के साथ मैं जैसे इन पर बोझ सा हो गया हूँ, सबको पता है बाप बूढ़ा और बीमार हुआ है तो उसकी देखभाल हमारी ही ज़िम्मेदारी है क्योंकि बच्चपन से ले कर पैरों पर खड़े होने तक हम इनकी ज़िम्मेदारी थे जिससे इन्सोंने कभी मुंह नहीं मोड़ा तो भला आज हम क्यों इनके प्रति अपने दायित्व से मुंह मोड़ें । मगर नहीं बेटा ऐसा नहीं इनके लिए मैं एक बंदिश हो गया हूँ । अपने आखरी दिनों में कौन बाप अपने बच्चों को इसलिए लड़ता देखेगा कि पिछली बार मैं डाॅक्टर के पास ले गया था इस बार तुम ले कर जाओ । ऐसी ज़िंदगी से मौत ज़्यादा बेहतर है । बड़ा बेटा महेश तो पहले कभी कभी देखने भी आता था मगर कुछ सालों से तो बस खास मौकों पर ही आता है । हाँ जबसे बीमार हुआ हूँ तब से खानापूर्ति के लिए आ जाता है, दो चार बार डाॅक्टर के पास भी ले गया ।" विलोम ने बाऊ जी से उनकी सेहत के बारे में पूछा था मगर बाऊ जी की बातों से लग रहा था जैसे वो अपने बुढ़ापे की दिक्कतों का हाल सुनाने ही आए हों । ये वो दर्द था जो शायद बुढ़ापे में अधिकतर लोगों को झेलना पड़ता है । विलोम कुछ बोल ना पाया बस बाऊ जी के पास जा कर बैठ गया और प्यार से उनका कंधा सहलाने लगा ।

"मेरे सामने सब ऐसा दिखाते हैं जैसे सब ठीक है, किसी को कोई दिक्कत नहीं मगर मैं उनके झगड़ों को सुनता हूँ जो हमेशा मुझे ले कर होते हैं । वे सब कर भी रहे हैं, जैसे तैसे मेरी देख रेख भी हो रही है मगर अपने प्रति वो स्नेह वो सम्मान नहीं दिखता जो पहले हुआ करता था । ऐसा लगता है कि जैसे सब इसी इंतज़ार में बैठे हैं कि कब मैं मरूं और उनके सर का ये बोझ हल्का हो । मैने अपने अंतिम दिनों में ऐसी स्थिति की कल्पना कभी नहीं की थी बेटा । मैं सबको खुश देख कर जाना चाहता था मगर....।" इससे अधिक वो कुछ बोल ना पाए । विलोम ने उन्हें दिलासा दिया ।

"नहीं बाऊ जी अंकल आंटी सब आपसे प्यार करते हैं । चिंता उनके चेहरे पर दिखती है ।"

"बेटा चिंता मेरी नहीं चिंता डाॅक्टर के बढ़ रहे बिल की है । अब एक लड़ाई तब भी होगी जब मेरे मरने के बाद मेरी अंतिम क्रिया के कार्यक्रम के खर्चे की बात चलेगी । ऐसा नहीं कि इनके पास पैसे नहीं बस ये एक दूसरे का मुंह देखते हैं, बाप के लिए भी एक दूसरे से भेदभाव करते हैं कि उसने नहीं किया तो मैं क्यों करूं । खैर ये सब छोड़ । घर आया हूँ तो क्या एक कप चाय भी ना पिलाएगा ।" बाऊ जी को शायद ये लगने लगा था कि वो कुछ ज़्यादा ही बोल गये । उन्हें जितना कहना था वे कह चुके थे इसीलिए उन्होंने बात बदलने के लिए चाय की फरमाईश की ।

"हाँ हाँ क्यों नहीं बाऊ जी । आज अपने हाथ की चाय पिलाता हूँ ।" विलोम उठ कर रसोई में जाने लगा तभी बाऊ जी ने उसे फिर से रोका ।

"तू जब पैदा हुआ था ना तभी लगा जैसे मेरा कोई बहुत अपना आया है । मेरे अपने पोते पोतियाँ जितना मुझसे जुड़े नहीं उससे ज़्यादा तेरा लगाव रहा है मुझसे । सबसे मिल लिया था एक तू ही नहीं आया था तो सोचा मैं ही मिल आऊं तुझ से ।" बाऊ जी इतना कह कर मुस्कुरा दिए ।

"बाऊ जी मैं आज आने ही वाला था । नई नौकरी है।काम का प्रेशर ज़्यादा है बस इसीलिए टाईम....।"

"बेटा मेरा आशीर्वाद है कि तू खूब तरक्की करे मगर एक बात याद रखना कभी अपने परिवार के आगे इस टाईम को ना आने देना । बड़ी ताक़त होती है परिवार में, जिसका परिवार खुश है ना वो ही सबसे ज़्यादा धनवान है आज के दौर में । चल अब जल्दी से चाय ले आ ।" बाऊ जी ने विलोम की बात काटते हुए अपनी बात कही ।

"जी बाऊ जी ।" विलोम भी मुस्कुरा कर किचन में चला गया । बहुत दिनों बाद किचन में कुछ बनाने घुसा था विलोम इसीलिए सारा सामान ढूंढते हुए उसे कुछ समय लग गया ।

थोड़ी देर में वो चाय बना कर ले आया मगर बाऊ जी अब वहाँ नहीं थे । विलोम को लगा शायद चले गये, लेकिन उसने देखा कि दरवाज़ा अभी भी बंद ही था । वो यही सब सोच ही रहा था कि दरवाज़े की घंटी बजी । विलोम ने दरवाज़ा खोला तो सामने उसके माँ पापा थे ।

"आज सुबह सुबह किधर निकल गये थे आप दोनों ।" विलोम ने उनके अंदर आते ही सवाल पूछा ।

"वो रघुनाथ चाचा जी का स्वर्गवास हो गया वहीं गये थे । आज सुबह अचानक ही महेश का फोन आया, तू सोया था तो हमने सोचा हम चले जाते।हैं हमारे आने के बाद तू और छोटी चले जाना ।" विलोम पापा की बात सुनते ही जैसे बर्फ सा ठंडा हो गया ।

"क्या ? रघुनाथ चाचा मतलब बाऊ जी ?" विलोम ने आश्चर्य से पूछा ।

"हाँ बेटा और कौन रघुनाथ चाचचा हैं मेरे । तू तो ऐसे कह रहा जैसे उन्हें जानता नहीं । अभी जब वो बिमार थे तब हम गये थे तो कह भी रहे थे कि सब आए मगर विलोम नहीं आया, लगता है मुझे भूल गया ।" विलोम को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ये हो क्या रहा है । शायद वो कोई सपना तो नहीं देख रहा मगर नहीं ये सब तो सच है । अभी अभी बाऊ जी आए थे वही बाऊ जी जिनकी आज सुबह ही स्वर्गवास हुआ ।

"कोई आया था क्या ?" माँ के अचानक पूछे इस सवाल से विलोम बुरी तरह चौंक गया ।

"न न नहीं तो, कोई नहीं आया था ।"

"तो ये दो कप चाय क्यों ।"

"अ आप दोनों के लिए ही बनाई थी पी लो । मैं सोने जा रहा हूँ ।" इतना कह कर विलोम घबरा कर अपने कमरे की ओर भाग गया और माँ पापा उसके इस तरह के व्यवहार को हैरानी से देखते रहे ।

धीरज झा

Keywords : Hindi Story, Old Age, Father's Life, Pain, Bhudhape Ka Dard 

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