खेल नियती का (सच्ची कहानी)

बा त तकरीबन साठ साल पुरानी होगी भारत को आज़ाद हुए महज़ कुछ साल ही हुए थे, अर्थव्यवस्था पूरी तरह से अपाहिज थी जिस कारण बेरोज़गारी अपने चरम...

बात तकरीबन साठ साल पुरानी होगी भारत को आज़ाद हुए महज़ कुछ साल ही हुए थे, अर्थव्यवस्था पूरी तरह से अपाहिज थी जिस कारण बेरोज़गारी अपने चरम पर थी । उसी दौर की बात है पूर्वी बिहार के एक छोटे से गाँव में दो दोस्त रहते थे । एक थे रमसरन झा और एक नारायण सिंह । दोनों की दोस्ती कहने कहाने वाली थी । उस कच्चे मकानों के दौर में अगर कुछ पक्का था तो इन दोनो की दोस्ती । होती भी कैसे ना दोनों के हालात एक समान थे । दोनों बेरोज़गार थे । दोनों के माँ बाप नहीं थे । रामसरन अपने बड़े भाई के घर बोझ समान थे तो नारायण सिंह अपने मामा के घर । बस सारा दिन गाँव की गलियों में धूल फांकते और रात को दो रोटी के साथ भर पेट गालियाँ सुन कर सो जाते ।

देश में चल रही बेरोज़गारी का सबसे ज़्यादा असर इन दोनों पर ही हुआ था । दोनों खेत में बैठे मैदान फिरने का आनंद ले रहे थे । असल में इंसान ने इस बात को बड़ा हीन माना है मगर यह एक बदबूदार सच है कि कामयाबी के साढ़े अस्सी प्रतिशत आईडिया हगते हुए ही आते हैं । तब तन भले ही गंदगी निकाल रहा हो मगर दिमाग साफ और शांत होता है और फिर आता है इतिहास लिख देने वाला आईडिया । बस रामसरन के दिमाग में भी एक झनझनाता आईडिया आया ।

"सुन ना नारयना एक ठो बात सूझा है ।"

"अरे कान बंद कर के नही हग रहे यार बोलो तुम हमको सुन रहा है ।" नरैना जोर लगाते हुए बोला

"अरे नरैना भाई गाँव में कुछो नही मिलने वाला, हम कहते हैं सहर चला चाए । उहाँ चाहे मजदूरी करेंगे मगर बात गारी तो नही सुनना पड़ेगा ना । का कहते हो ?"

"सोच तो हम भी इहे रहे थे । लेकिन उहाँ रहेंगे कहाँ ?"

"दुर महराज रे खाता को देता राम कोनो न कोनो रस्ता निकल जाएगा ।"

"चलिए त आज रात में ही निकला जाए । सब खोजता रह जाएगा ।"

तय हुए मुताबिक दोनो रात को घर से निकल पड़े बिना किसी को बताए । किसी तरह से दोनों शहर पहुंचे । ना जेब में कुछ ज्यादा पैसे थे ना रहने को जगह । दोनों पागलों की तरह भटकने लगे । भटकते भटकते दोनों एक ग्राऊंड में पहुंचे । वहाँ बहुत भीड़ थी । पास जा कर पता चला वहाँ सेना की भर्ती चल रही थी । उस वक्त सेना में जाना मतलब वापिस लौट कर कभी ना आना होता था । पाकिस्तान से जंग चल रही थी ऐसे में कोई अपनी जान जोखिम में नहीं डालना चाहता था । ये दोनों वहाँ पहुंचे  तो वहाँ खड़ा एक सिपाही भीड़ को देखते हुए चिल्ला रहा था "जिस जिस को सेना में भर्ती होना है आगे आओ, वक्त है देश के लिए कुछ कर दिखाने का ।" उसकी बात सुन कर इतनी बड़ी भीड़ में से एक दो देशभक्त ही आगे आ रहे थे । नरायन के दिमाग में पता नहीं क्या सूझा उसने रामसरन को आगे की तरफ़ धक्का दे दिया और खुद भीड़ से निकल कर भाग गया । जो थोड़े बहुत पैसे थे वो नरायन के पास ही थे अब उन पैसों का लालच कहिए या नियती का खेल जो नरायन से ऐसा करवा गई । 

इसके बाद क्या हुआ किसी को नहीं पता । साल दर साल बीत गए । नरायन कहाँ गुम हो गया पता नहीं, रामसरन जिया या मरा पता नहीं । तीस साल बाद रामसरन के उसी गाँव में सन्नाटे को चीरती हुई पाँच सात गाड़ियाँ रामसरन के दरवाजे पर पहुँचीं । रामसरन का बड़ा भाई खाट पर लेटा था । तब गाँव में दुपहिया गाड़ी किस्मत से किसी दिन दिखती थी ये तो चरपहिया गाड़ी थी । उसे देख कर तो रामसरन के बड़े भाई के पसीने छूट गए, वो तुरंत उठ खड़ा हुआ । तभी आगे वाली गाड़ी में से एक आदमी निकला जो कद काठी और अपनी मूँछों से कोई बड़ा अफ्सर लग रहा था । उसके ही साथ चार पाँच बंदूकधारी भी निकले । उस आदमी ने जाते ही रामसरन के बड़े भाई के पैर छूए । रामसरन का बड़ा भाई हक्का बक्का हो गया कि ये कौन है जो गाड़ी से उतर कर मेरे पैर छू रहा ।

"पहचाने नहीं भईया । हम रामसरन ।" इतना सुनते ही उसके बड़े भाई ने रोते हुए उसे गले लगा लिया।

"कहाँ चला गया था बबूआ । क्या बड़े भाई की बातों का इतना बुरा लग गया ता कि उसे छोड़ कर चला गया । नरैना जब लौट कर आया तो बोला की रामसरन रेल में कट कर मर गया । हम सब तुम्हारा सब कर्म कर दिए ये सोच कर कि तुम अब नहीं हो ।" दोस्ती के साथ ऐसा विश्वासघात सुन कर रामसरन को थोड़ा सा बुरा लगा मगर वो संभल गया ।

उसके बाद उसने बताया कि कैसे वो फौज में फर्ती हुआ वहीं पढ़ाई की, कैसे देश के लिए लड़ाईयाँ लड़ीं और आज तरक्की पा कर कैसे फौज का बड़ा अफ्सर बन गया है । वहीं उसने शादी भी कर ली अब दो बच्चे भी हैं जो शहर में पढ़ते हैं । अब वो रिटायर होने वाला है इसलिए मन बना कर आया था कि यहीं गाँव में घर बनाएगा । ये सब सुन कर उसके बड़े भाई ने उसे कहा कि उसकी जमीन है वो उस पर अपना मनचाहा घर बना सकता है ये उसी का हक़ है । मकान का काम शुरू हो गया और कुछ ही दिनों में मकान बन कर तैयार भी हो गया । इन सबके बीच में रामसरन के मन में एक बेचैनी सी रही जो नारायण को लेकर थी वो उसे मिलना चाहता था । जब तक उससे मिल ना लेता तब तक रामसरन का मन शांत ना होता । उसने गाँव में भी पता किया मगर सबका एक ही जवाब था कि पता नहीं कहाँ है बस कभी कभार गाँव में भटकता दिख जाता है । उसकी झोंपड़ी भी अब टूट गई, अकेला है, ना जाने कहाँ रहता है क्या करता है ।

ये सब सुन कर रामसरन और बेचैन हो जाता । एक दिन इसी तरह सोचता हुआ रामसरन अपने नए मकान के बाहर टहल रहा था कि सामने से एक आदमी को आते देखा जिसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी कपड़े फटे और बेहद मैरे कुचैले हो गए थे । रामसरन ने उसे ग़ौर से देखा और उसकी दोस्ती वाली आँखों ने उसे पहचान लिया । हाँ ये वही है नारायण ही तो है । रामसरन उसकी और बढ़ा उधर नारायण भी समझ गया कि रामसरन उसे पहचान गया है इसलिए नारायण भागने लगा मगर रामसरन ने भाग कर उसे पकड़ते हुए कहा "रे नरैना कहाँ भाग रहा है रे । कब से ढ़ूंढ रहे हैं तुमको और तुम हो कि ससुर मुँह छुपा कर भाग रहे हो ।"

"जईसा तुम्हारे साथ किए उस हिसाब से तो मर जाना चाहिए हमको ।" नरायण रोते हुए बोले ।

"दुरबुर चुप्पो, लोर चुआने का आदत तुम्हारा नहीं गया ना । अब सुनो जो तुमने किया वो असल में तुमने किया नहीं नियती ने तुम से करवाया है । अगर तुम वैसा ना करते तो शायद आज हम भी तुम्हारे साथ इसी हालत में होते । तुमने क्या सोच कर किया नहीं जानते मगर हमारे लिए वो सबसे अच्छा हुआ और इसके लिए हम तुम्हारे आभारी हैं । और तुम्हारे लिए कुछ कर के ये कर्ज़ चुकाना चाहते हैं । "

ये सब सुन कर नारायण बुरी तरह रो पड़ा । उसने बताया कि "जब नारायण शहर से लौटा तो सब पूछने लगे कि  रामसरन कहाँ है ? मैं कैसे कहता कि तुम्हे मरने के लिए छोड़ आया इसलिए सबसे कह दिया कि तुम रेल में कट गए । उसके बाद मामा घर से निकाल दिए तब से भीख माँग कर पेट पाल रहे हैं । जो किए उसका सजा मिल गया ।"

"कोई सजा नहीं मिलेगा और अब से तुम भीख नहीं माँगोगे ये मकान जितना मेरा है उतना तुम्हारा भी । जब तक हम नहीं आजाते तुम यहीं रहो और हमारे आजाने के बाद सब मिल कर साथ में ही रहेंगे ।" पहले नारायण ने मना किया मगर रामसरन नहीं माना तो नारायण को ही मानना पड़ा । नारायण के खाने की व्यवस्था भी रामसरन ने कर दी और उसे कुछ पैसे भी दिए । नारायण ने रामसरन को दिल से दुआएं दीं ।

दोस्तों नियती सब कुछ पहले से तय कर के रखती है आपको बस उसके बताए रास्ते पर चलना होता है । आपको बुरा लगे या अच्छा सच लगे या झूठ जैसा भी हो आपको चलते रहना है । अगर कहीं आप गलत रास्ते पर कदम बढाने वाले हैं तो कोई आएगा और आपको बाँह पकड़ कर फिर सही रास्ते पर ले आएगा । वो इस बात से अंजान होगा की वो आपका भला कर रहा है और आप भी उसे गलत ही समझते रहेंगे । आप अपने अतीत पर एक नज़र डालिए आपको बहुत से उदाहरण मिल जाएंगे ।

धीरज झा

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क़िस्सों का कोना : खेल नियती का (सच्ची कहानी)
खेल नियती का (सच्ची कहानी)
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