न्याय

"अ रे बबितिया के माय, तुम काहे चिन्ता करत हो । जब तक हमारे देह में प्रान आ हमारे माथा पर भागनराएन बाबू के हाथ है तब तक हम लोग को चिं...

"अरे बबितिया के माय, तुम काहे चिन्ता करत हो । जब तक हमारे देह में प्रान आ हमारे माथा पर भागनराएन बाबू के हाथ है तब तक हम लोग को चिंता करे के कौनो जरूरत नहीं है ।" अपने हौंसले के तौलिये से कुसुम के माथे पर छाया चिन्ता का पसीना पोंछने की कोशिश कर रहा था भुनेसर ।

"पता नहीं काहे हमारा जी मिचला रहा है, लगता है जईसे कौनो बिपदा आने वाला है । औकात हमारा है नहीं आ सपना हमनी के बड़का बड़का हो गया है । कहते हैं आपसे कि बच्चा सबको ई गाँव के इस्कूल में दल दीजिए मगर आप हैं कि सुनते ही नहीं । इतना बड़ा सपना सब मत देखिए  डर लगता है कहीं सपना से लदा पेड़ गिर गया नऽ तो हम लोग उसी के नीचे पिस जाएंगे ।" भुनेसर जितना उसकी चिंता मिटाने की कोशिश कर रहा था, कुसुम के माथे पर उतनी ही चिंता की लकीरें गहरा रही थीं ।

"चुप रहो, साला मनहूस जनाना । जब मुंह खोलेगा तब अपसब्दे बोलेगा । का गुनाह किये जो बबितिया  का बिआह अच्छा घर में करने का और मुन्नमा को अच्छा पढ़ाई पढ़ाने का सपना देख लिए तो । कौन बाप मतारी अपना बाल बच्चा सब के लिए सपना नहीं देखता । ऊपर से मालिक हमको पूरा बिस्बास दिलाए हैं कि ऊ हमारा हर संभव मदद करेंगे । तुम बस अपना जुबान बंद आ मन सांत रखो ।" भुनेसर का गुस्सा मिनट में आसमान पर आ सैकेंड में नीचे आता था । कुसुमिया इस बात को जानती थी मगर आज वो भी अपने आप में नहीं थी इसीलिए भुनेसर की झल्लाहट पर भनभनाते हुए वहाँ से निकल गयी । हालाँकि भुनेसर को अपने गुस्से पर अफ़सोस हुआ मगर वो जानता था अभी उसके कितना भी समझाने पर कुसुम नहीं मानेगी ।

गाँव की औरतों को यह बात अच्छे से पता होती है कि उनके लाख रूठने के बाद भी सारा काम उन्हें ही करना है इसीलिए वह अपना काम निपटाने के साथ साथ बड़बड़ा कर मन हल्का कर लेती हैं । कुसुम भी मन हल्का करने के लिए बर्तन भांड़ा उठा कर भनभनाते हुए नदी की ओर उन्हें मांजने निकल गयी । इधर खेत में कड़ी मेहनत के कारण थका हुआ भुनेसर भी कुछ देर के लिए दिमाग और शरीर की थकान मिटाने के लिए थोड़ी देर आराम करने का सोच कर लेट गया ।

शाम घिर आई थी और इधर सूरज बाबा भी अपनी मजदूरी करने के बाद अपने बिस्तर में सरक रहे थे । कुसुम बर्तन का टोकरा उठाए हुए घर पहुंची तो देखा भुनेसर अपनी एक टांग के साथ आधा शरीर खटिए से नीचे लटकाये सो रहा है । कुसुम का मन हुआ कि उसे वैसे सोया देख खिलखिला कर हंस दे मगर फिर उसे याद आया वो तो नाराज़ है और बस यही सोच कर उसने अपनी हँसी को एक दबी मुस्कुराहट में बदल दिया । कुसुम को आँगन शांत सा लग रहा था, जबकि इस वक्त तक तो बच्चे हुड़दंग मचाए होते थे ।

बच्चों का सोच कर वो अपनी मुस्कुराहट भूल गयी और अपनी सामने वाले फूस के घर की तरफ बढ़ी । अंदर देखा तो मुन्नमा दरवाजे की तरफ पीठ कर के चादर में लिपटा लेटा हुआ था । कुसुम ने इस बात पर ग़ौर नहीं किया कि वो सोया है या नहीं क्योंकि उसका मन बेचैन हो उठा था यह देख कर कि बबिता वहाँ नज़र नहीं आ रही थी । उसने मन को यह कह कर समझाया कि शायद वो पड़ोस की नुतनिया के घर गयी होगी मगर जब ललही शाम ने स्याह अंधेरे की चादर ओढ़नी शुरू की तो कुसुम का मन बेचैन सा होने लगा । वो पहले नुतनिया के यहाँ गयी मगर वहाँ मालूम चला कि आज तो ट्यूश्न के बाद उसने बबितिया को देखा ही नहीं ।

कुसुम मन में घबराहट को दबाये घर की तरफ आ रही थी तभी उसने बैलाघर से किसी के सिसकने की आवाज़ सुनी । हाथ में लालटेन लिए धड़कते मन के साथ जब बैलाघर में घुसी तो देखा बैल की नादी के पीछे कोई छुपा है । कुसुमिया का दिल और ज़ोर से धड़कने लगा । वो अपने हवाई चप्पल की फटर फटर को दबाने की कोशिश करते हुए धीरे धीरे आगे बढ़ी । डर तो उसे बहुत लग रहा था मगर फिर भी अपनी सारी हिम्मत जुटा कर उसने अपना शरीर पीछे खींच कर अपना लालटेन वाला हाथ आगे बढ़ाया । लालटेन की रौशनी में सूखा खून चमक पड़ा और इसी चमक के साथ दो दबी हुई चीखें उठीं ।

एक कुसुमिया की और दूसरी वो जो नादी के पीछे छुप कर बैठी थी । ये बबिता थी । मुँह से पर नोचने के कारण बन पड़ी खरोंचों से खून बहते बहते सूख गया था । बाल बिखरे पड़े थे । बारह साल की बबितिया कपड़े का गट्ठर बनी वहीं कोने में दुबकी हुई थी । कुसुम ने खुद को संभाला और हिम्मत जुटा कर बबिता की तरफ बढ़ी । वो बच्ची इस तरह से सहम गयी थी कि उसे अपनी माँ की पहचान भी ना हुई यहाँ तक कि उससे खुल कर चिल्लाया भी ना गया ।

कुसुम ने लालटेन को नादी पर रख दिया और बबिता को ज़ोर से सीने से लगा लिया । बबिता ऐसे हो गयी थी मानों जैसे लाश हो,सहमी साँसों और घुटी सिस्कियों के सिवा और कोई प्रतिक्रिया नहीं । कुसुम ने अपनी थरथराती नज़रों और कांपते मन के साथ किसी अनहोनी की आशंका में उसके ऊपर से नीचे तक ग़ौर से देखा और नीचे आते आते तक उसकी थरथराती निगाहें जम गयीं । हाथ अपने आप मुँह पर चले गये ताक़ी चीख़ को दबा सके और इसी के साथ ही वह ज़मीन पर गिर पड़ी ।

बबिता की फ्राक के नीचे से खून की कई सूखी रेखाएं खिंचती चली आई थीं उसकी टाँगों तक । कुसुम ने किसी तरह खुद को संभाला और वहाँ पड़े फटे बोरों को जोड़ कर बनी पटिया में बबिता को ढक कर अपने कंधों से सहारा देती हुई घर ले आई । इस अनहोनी से बेखबर भुनेसर अभी भी सो रहा था, मुन्नमा भी अभी तक उसी तरह दरवाजे की तरफ पीठ कर के सोया हुआ था । लेकिन कुसुम को अभी बबिता को छोड़ और किसी की फ़िक्र नहीं थी । कुसुम अभी तक खुद को किसी तरह समेटे थी, उसे पता था कि अगर वो टूटी तो पूरा गाँव जान जाएगा कि आज उसके घर की इज्ज़त कोई लूट ले गया और ये ना वो बर्दाश्त कर पायेगी ना भुनेसर । इसीलिए उसने अंधेरे का सहारा ले कर चुपचाप बबिता को कमरे में ले जा कर बिठा दिया । बबिता बेखबर थी इस बात से कि उसके साथ हुआ क्या है उसे बस दर्द और भयावह डर महसूस हो रहा था । कुसुम उसे बिस्तर पर लिटा दिया और खुद को किसी तरह समेटे हुए भुनेसर के सिरहाने बैठ उसे हिलाने लगी ।

"ऊंह ।" कुसुम के हिलाते ही भुनेसर आँख मलते हुए उठा ।

"अरे ससुर रात हो गया ये तो । तुम उठाई भी नहीं । हमको मालिक यहाँ जाना था ।" कुसुम के कानों में बबिता की सिसकियाँ भरी हुई थीं इसीलिए भुनेसर की कोई बात उस तक नहीं पहुंच रही थी । उसका पूरा शरीर पसीने से भीग गया था,  उसकी आँखें बस आँसुओं को रोकने की कोशिश कर रही थीं ।

"ऐ बबितिया के माय, तुम अभी तक हमरा से नाराज हो । अरे महराज माफी मांगते हैं तुमसे । अब से नहीं होगा ।" भुनेसर सोच रहा था कि वह दोपहर वाली बात से नाराज़ है इसीलिए कुसुम को अपने अंदाज में मनाये जा रहा था । जितना वो उसे मना रहा था कुसुम उतना ही टूटती जा रही थी और आखिर में वो अपनी चीख़ को दबाती हुई भुनेसर की बाहों में बिखर गयी ।

"ऐ कुसुम, का हुआ रे ? एतना छोटा बात पर तुम ऐसी नहीं रोती । का हुआ हमको बताओ । ऐ हमारा मन कांप रहा है ।" कुसुम की सिसकियाँ अब रुकने का नाम नहीं ले रही थीं । उसने हिम्मत बाँध कर सामने वाली मड़ई की तरफ इशारा किया । उसका इशारा पा कर भुनेसर बेचैन से मन के साथ मड़ई की तरफ भागा और सामने जो उसने देखा वह कोई भी पिता सपने में भी नहीं देखना चाहेगा । खून के अनेक सूखे धब्बों में सनी, बबिता डरी सहमी सी बिस्तर के एक कोने में दुबकी पड़ी थी । भुनेसर वहीं माथे पर हाथ रख कर रोने लगा । कुसुम भुनेसर की रोने की आवाज़ सुन कर दौड़ती हुई आई और उसके मुँह पर हाथ रख दिया ।

"रोवो मत मुन्नमा के बाबू, कौनो सुन लेगा ।" अपनी सिसकियों को दबाते हुए कुसुम ने अपने पति को ना रोने की सलाह दी ।

"ई सब कईसे हो गया बबितिया के माय ? अभी सबेरे तो इस्कूल गयी थी तो ठीक ठाक थी फिर अभी कईसे ई हो गया ।" ज़मीन पर बैठे हुए भुनेसर ने अपना सर घुटनों के बीच छुपा कर बड़े पीड़ा भरे शब्दों में कुसुम से पूछा ।

"कब हुआ, कईसे हुआ ई सब जानने का समय नहीं, वो देखो उसका खून नहीं रुक रहा है और बाहर ले गये तो सब पूछेगा । ई सोचो बिटिया का इलाज कईसे कराएं ।“ कुसुम के चेहरे पर समाज और और बेटी दोनों की फ़िक्र बराबर मात्रा में झलक रही थी । ये समाज का डर भी तो बेटी को ले कर ही था कि कहीं लोगों के बीच उसके साथ हुए दुष्कर्म की बात फैली तो उसकी शादी कहीं ना हो पायेगी । लोग उल्टा उसे ही बुरा भला कह कर ताने देंगे ।

कुसुम किसी तरह खुद को और भुनेसर को शांत करने में लगी थी मगर भुनेसर अब शांत होने वाला नहीं था वो अपने आंसू पोंछता हुआ उठा और उस छोटे से कमरे के बाहर जाते हुए बोला “तुम गरम पानी से इसका घाव और खून पोछो हम मालिक से मिल कर आते हैं वही हैं जो हमरी बच्ची को न्याय दिला सकते हैं ।” उसके आवाज़ में अभी भी कंपकपाहट बनी हुई थी । कुसुम ने उसे एक बार रोकने की कोशिश की मगर फिर जहाँ से उठी थी वहीं घुटनों में सर दे कर रोने लगी ।


भुनेसर अपने मन में गुस्सा, डर, दुःख सबको एक साथ समेटे तेज क़दमों के साथ भागनारायण बाबू के दुआर की तरफ़ बढ़ता चला जा रहा था । भागनारायण बाबू पूरे जिले में अपनी अच्छी पहचान रखते थे । अपनी श्रीमती के देहांत के बाद जब वो बहुत हद तक अकेलेपन के शिकार होगये थे तब भुनेसर ने ही उन्हें मानसिक बल दिया और एक अच्छे सेवक होने का कर्म निभाया । इसी कारण उनका भुनेसर से बहुत लगाव था । भुनेसर को पूर्ण विश्वास था की मालिक उसकी सहायता जरूर करेंगे ।

अपने दुःख से भरी हुए पैरों से दस मिनट पैदल रास्ता नापने के बाद भुनेसर भागनारायण बाबू के दुआर पर पहुँच गया था । मगर यहाँ पहुँचते ही उसने जो देखा वो एक दिन में उसके जीवन का दूसरा बड़ा झटका था । दुआर पर आधे गाँव की भीड़ उमड़ी पड़ी थी और भागनारायण बाबू अपने इकलौते बेटे के शव से लिपटे बुरी तरह रो रहे थे । इतना वो शायद अपनी पत्नी के देहांत पर भी नहीं रोये थे । शायद ये बेटे के जाने के साथ साथ वंश का आखरी वारिस ख़त्म हो जाने का दुःख भी था । भागनारायण बाबू भले ही अपने बेटे के स्वभाव और उसके रहन सहन से दुखी रहते थे मगर जो भी था आखिर था तो वो उनका एकलौता बेटा ही ना ।


भुनेसर से अपने मालिक का दुःख देखा नहीं जा रहा था, उसका मन हो रहा था कि अभी उनके पास जाये और उन्हें अपने कंधे का सहारा दे कर उनका अध दुःख बाँट ले । मगर आज भागनारायण बाबू से भुनेसर नहीं बल्कि एक पिता मिलने आया था, जिसकी बेटी पर ऐसी विपदा आन पड़ी थी जो मौत से भी कहीं ज़्यादा भयानक है । यही सोच कर भुनेसर ने ना चाहते हुए भी अपने कदमों को मोड़ लिया । वापिस आते हुए उसने उड़ते उड़ते गाँव वालों की ये बात सुनी की मालिक का बेटा नदी के पास बालू वाले टीले के पास मृत पाया गया था । भुनेसर ने बात तो सुनी मगर गौर ना किया और बिना इधर उधर झांके सीधा घर की तरफ बढ़ता रहा ।


घर पहुँच कर उसे लगा जैसे वो किसी गलत घर में आगया है क्योंकि जब भी वो बहार से आता तो बबितिया और मुन्नमा आंगन में ही धमाचौकड़ी मचाये रहते थे तब तक जब तक वो सो ना जाते मगर आज आँगन एक दम सुनसान पड़ा हुआ था । भुनेसर उस फूस वाले कमरे की तरफ बाधा जहाँ कुसुम बच्चों के साथ बैठी थी ।

भुनेसर कमरे में आया तो देखा कि कुसुम ने बबिता के घाव पोंछ दिए हैं गर्म पानी से, खून शायद रुक गया है इसी लिए उसने उसे कम्बल में लपेट कर सुलाया है मगर कम्बल के बावजूद भी बबिता कांप रही है बुरी तरह, डर उसके अंग अंग में समा चुका था । मुन्नमा कमरे में नहीं था माँ से आंख बचा कर ना जाने कहाँ चला गया था । सरे कमरे में नज़र दौड़ाने के बाद भुनेसर ने लंबी  साँस ले कर बोलना शुरू किया “गजब होगया कु......।” मगर भुनेसर कुसुम को कुछ बताता इससे पहले ही बाहर एक साथ हो रही कई पैरों की चहलकदमी ने उसकी ज़ुबान को वहीं थम जाने का इशारा किया । भुनेसर घबराये मन से बहार की ओर मुड़ा ।

बाहर गाँव के लोगों के साथ भागनारायण बाबू का मुनीम और थानेदार साहब खड़े थे । इन सब को देखते ही भुनेसर कुछ ज्यादा ही घबरा गया । मगर फिर खुद को सम्भालते हुए मुनीम के मुखातिब हो कर बोला “अरे मुनीम जी, आप यहाँ कईसे ? और ई थानेदार साहेब को ले कर कहाँ घूम रहे हैं ?”

“अच्छा तो तुमको नहीं पता कि हम थानेदार साहेब को ले कर कहे घूम रहे हैं और कितना बड़ा दुर्घटना घट गया है, ई सब का तुमको कौनो खबर नहीं है ?” मुनीम की आँखों में हद से ज़्यादा क्रोध झलक रहा था ।

भुनेसर की घबराहट अब उसके माथे पर पसीने की बूंदें बन कर छलक आई थीं, वो बस इस बात से घबरा रहा था कि मुनीम उससे ये ना कहे कि मालिक पर इतना बड़ा दुःख आन पड़ा है मगर तुमको कोई खबर नहीं । लेकिन एक तरफ़ वो थानेदार को देख कर डर रहा था कि कहीं उसने उसकी बेटी को इस हाल में देख लिया तो वो कहीं मुंह दिखने के काबिल नहीं रहेगी । भुनेसर गरीब था शायद इसीलिए उसे बच्ची को न्याय मिले इससे ज्यादा उसकी बदनामी ना हो इसकी फ़िक्र थी ।

“न न, हमको कक्या मालूम क्या हुआ.....” भुनेसर हकलाते हुए अपनी बात पूरी करता इससे पहले ही मुनीम ने आगे बढ़ कर उसका गला दबोच लिया ।

“साला छोटे मालिक को खा गया और बोलता है कुछो जानते ही नहीं । क्या मालिक तुमको इतना मानते थे तब भी तुम उनका बंस मिटा दिया । क्या मिला तुमको ?” थानेदार की परवाह किये बिना मुनीम ने पूरी ताक़त से उसका गला दबा दिया था ।

“ऐ ऐ, छोड़ो इसको । कानून है इन सबके के लिए । समझते हैं तुम सब दुखी हो मगर कानून के दायरा से बहार गए तो तुम सबको जेल में दल देंगे । सूरतराम गिरफ्तार करो इसे ।” मुनीम को धमकाते हुए थानेदार ने सिपाही को हुकुम दिया कि वो भुनेसर को गिरफ्तार करे । मगर इधर भुनेसर को समझ ही नहीं आरहा था कि आखिर उसे गिरफ्तार क्यों किया जा रहा है । उसने तो छोटे मालिक को कई दिनों से देखा भी नहीं फिर उनका खून कैसे कर सकता है ।

“साहब हम नहीं कुछो किये, हमतो छोटे मालिक से मिले भी नहीं केतना दिन से । आज तो हमारे सर पर खुदे बहुत बड़ा बिपदा आ गिरा है, हम तो खुदे दुखी हैं ।”

“तुम्हारा आधार कार्ड मिला है जहाँ खून हुआ वहां से । उसका कोई पैर थोड़े ना होता है, बाक़ी बात पुलिस एस्टेसन में करेंगे । चलो ।”

“मालिक एक बार हमारा बात सुन लीजिए उसके बाद जहाँ कहेंगे वहां चलेंगे ।” भुनेसर के अन्दर से एक बाप करुणा से भरी पुकार के साथ चीख़ पड़ा । थानेदार भले ही सख्त था मगर था तो इंसान ही । उसने उसकी चीख़ में भांप लिया कि हो ना हो कुछ गड़बड़ है । उसने सिपाहियों को उसे छोड़ देने का इशारा किया और खुद उसके पास पहुँच गया ।

“बोलो क्या बात है ?” थानेदार की बात का जवाब देने की बजाए भुनेसर चुपचाप अपने कमरे की तरफ मुड़ा और बोझिल क़दमों के साथ थानेदार को लिए उस कमरे में जा घुसा जहाँ बबिता को छुपाया था उन्होंने । थानेदार ने बबिता के पास गया और इधर भुनेसर अपनी बेबसी पर वहीँ बैठ कर रोने लगा । बबिता थानेदार को पात आता देख चिल्ला पड़ी । उसके डर को भांपते ही थानेदार को ये समझने में देर ना लगी कि बच्ची के साथ हुआ क्या है । वो पास खाड़ी कुसुम की ओर मुड़ा ।

“कब हुआ ये ?”

“पता नहीं साहेब, शाम घिर जाने तक जब ये नहीं लौटी टूसन से तब हम इसको ढूंढे मगर कहीं ना मिली फिर अचानक से बिला ग़म में से आवाज आया तो वह देखे तो पाए कि ये बुरी हालत में.....।” इससे आगे कुसुम से कुछ बोला नहीं गया ।

“कुछ अंदाजा है कौन हो सकता है ?”

“अंदाजा होता तो हम पर झूठा खून का नहीं सही में खून करने का आरोप लगा होता साहेब ।” ये बोलते हुए भुनेसर की बेबस सांसों में प्रतिशोध की गर्मी महसूस होने लगी थी । थानेदार के सामने ऐसी बात करना भी एक तरह का अपराध है मगर थानेदार इस समय भुनेसर को नहीं एक पिता को देख रहा था ।

“देखो भुनेसर, तुम्हारी बच्ची की हालत देख कर मैं काफ़ी हद तक समझ गया हूँ कि तुम ऐसा नहीं कर सकते, मुझे तुमसे पूरी सहानुभूति है लेकिन मेरे हाथ भी कानून के नियमों से बंधे हैं । तुम्हारे खिलाफ़ सबूत मिले हैं इसी लिए तुम्हे ठाणे तो जाना ही होगा मगर मैं तुमसे वदा करता हूँ कि तुम्हारी बेटी को पूरा न्याय दिलवाऊंगा और तुम्हारे केस की अच्छे से छान बीन करूँगा ।” इसी के साथ थानेदार भुनेसर को अपने साथ ले जाते हुए दो सिपाहियों को जल्दी से बच्ची को अस्पताल ले जाने की जिम्मेदारी सौंप गए ।

भागनारायण बाबू किसी तरह की प्रतिक्रिया देने की हालत में नहीं थे, जीती जागती मूर्ति बन गए थे बस । मुनीम अपने मालिक के प्रति अपनी ईमानदारी साबित करने में पूरे जी जान से जुटा हुआ था । वो मन ही मन भुनेसर को अपराधी मान चूका था उसे तो बस उसके लिए कड़ी से कड़ी सज़ा का इंतजार था । मगर इधर थानेदार ने भी ठान लिया था कि वो भुनेसर और उसकी बच्ची को इंसाफ दिला कर मानेगा । थानेदार ने अपना पूरा दम लगा कर मामले की तहकिकात शुरू कर दी । और कुछ ही दिनों में नतीजा उसके सामने था । उसने जान लिया था कि भुनेसर बेगुनाह है मगर उसे ये भी पता था कि गुनेह्गर कौन है ये जान कर उसे बहुत दुःख होगा शायद वह ये सह भी ना पाए ।

आज अदालत में भुनेसर पर लगे इल्ज़ाम का फैसला था । मुनीम सहित गाँव के सभी मुख्य लोग अदालत पहुचे हुए थे । भागनारायण बाबू भी मुनीम के कितना समझाने पर साथ आये थे । जब भुनेसर अदालत में लाया जा रहा था तब कोर्टरूम से ठीक पहले भागनारायण बाबू खड़े थे । उन्हें देखते ही भुनेसर का सर उनके सम्मान में झुक गया । भागनारायण बाबू उसके थोडा पास आकर बोले “सब कहता है तुम ही बब्बन को मरे हो, मगर हम तुमको जितना जानते है तुम तो कभी शराब परर कर हमारे सामने नहीं खड़े हुए क्योंकि तुम शर्मिंदा हो जाते हो, मगर आज काहे दो तुम्हारी आँख में हमको वो शर्मिंदगी दिख नहीं रहा । महादेव से प्रार्थना करेंगे कि तुम्हारे हाथों हमारे बेटे के साथ साथ हमारे विश्वास का भी खून ना हुआ हो ।” भुनेसर की ऑंखें भर आयीं ।

उसे कोर्ट में पेश किया गया । सबूतों और गवाहों का दौर शुरू हुआ । गौरिया हजाम ने गवाही दी कि उसी ने सबसे पहले छोटे मालिक की लाश देखि और पुलिस को बुलाया । पुलिस को वहां से भुनेसर का आधार कार्ड मिला । चूंकि भुनेसर के हाथों बब्बन का खून होते किसी ने अपनी आँखों से देखा नहीं था इसी लिए एक दम से फैसला नहीं किया जा सकता था । मगर भुनेसर की तरफ से कोई गवाह ना होने की वजह से उसका अपराध साबित होता नज़र आरहा था । इसी के साथ मुनीम ने भी चार पांच आदमियों के साथ ये गवाही दे दी की खून करने के बाद भुनेसर भागनारायण बाबू के दुआर पर आया मगर लोगों की भीड़ देख कर वहां से भाग गया । अदालत में ये साबित होता जा रहा था कि हो न हो बब्बन का खून भुनेसर ने ही किया है ।

मगर अभी नियति का एक खेल बांकी था । थानेदार ने भुनेसर के सरकारी वकील के कान में कुछ कहा और वकील साहब ने न्यायाधीश से एक गवाह को पेश करने की अनुमति मांगी । न्यायाधीश की अनुमति मिलते अगले ही पल भुनेसर का बेटा मुन्नमा कोर्टरूम में लाया गया । मुन्नमा अब कटघरे में खड़ा था ।

“जज साहब कहते हैं बच्चे भगवन का रूप होते हैं, उनकी आवाज़ भगवान की आवाज़ होती है । आज इस केस का फैसला भी भगवन की आवाज़ से ही होगा । बेटा तुम डरों मत तुम्हें कुछ नहीं होगा बस जज साहब को सब सही सही बता दो ।” वकील साहब ने मुन्नमा को प्यार से समझाते हुए कहा ।

पहले तो मुन्नमा इ दम से डर गया मगर फिर उसने अपनी सारी हिम्मत जूटा कर बोलना शुरू किया “उस दिन हम और दीदी इस्कूल से आरहे थे । हम दीदी को बोले हमको छीया (पौटी) करना है । इसी लिए हमलोग नदी के रास्ते आने लगे । दीदी बालू के टीला के पास खड़ा हो गयी और हम आगे नदी किनारे उतर गए । थोड़ी देर बाद जब हम आये तो देखे कि दीदी नहीं थी वहां, हम दीदी को इधर उधर खोजे पर वो मिली नहीं । थोड़ी देर में हम दीदी का चीख़ सुने और जिधर से आवाज़ आरहा था उधर भागते हुए गए । वहां हमने देखा कि बब्बन भईया दीदी को जमीन पर लिटा कर मार रहे हैं और दीदी चिल्ला रही है । दीदी को बहुत दर्द हो रहा था । हमको लगा कि वो दीदी को मार देगा इसीलिए हम वहां पड़ा एक पत्थर उठा के बब्बन भईया के सर पर मार दिए, दीदी से उठा नहीं जा रहा था वो रो रही थी । बब्बन भईया के सर से खून बहने लगा तब भी वो उठ के हमको पकड़ने के लिए भागे और थोड़ी दूर भागने पर ही वो गिर पड़े और उनका सर बड़े वाले पत्थर से टकरा गया । फिर वो वहीं सो गए । और हम दिदिया को उठा के घर लाए । दिदिया जा कर बैलाघर में छुप गयी और हम डर के मारे सोने का नाटक करने लगे । हमको लगा बब्बन भईया घर आकर हम दोनों को फिर से मरेंगे ।” इतना कह कर मुन्नमा चुप होगया । पूरी अदालत में सन्नाटा पसर गया था । भुनेसर मुन्नमा को घूर रहा था मगर उसके घूरने में एक अभिमान था ।

“जज साहब मुन्ना ने अपनी साडी बात आपको बता दी । अब बात रही भुनेसर के आधार कार्ड की तो आप मुन्ना के क्लास मास्टर से पूछ सकते हैं कि बच्चों के रीएडमीशन के लिए सबके पिता को अधारकार्ड के साथ बुलाया गया था । भुनेसर अपना आधार कार्ड स्कूल में ही ही भूल आया था इसी लिए मुन्ना के मास्टर जी ने उसका कार्ड मुन्ना को दे दिया और वहां हुई घटना के दौरान वो कार्ड मुन्ना की जेब से गिर गया । केस अब पानी की तरह साफ़ है जज साहब । भुनेसर खुद अपनी मासूम बच्ची के साथ हुए ज़ुल्म के लिए परेशान है । और 13 वर्ष के मुन्ना ने जो किया वो अपनी बहन और अपनी जान बचने के लिए किया । बब्बन की मौत भी मुन्ना द्वारा मरे गए पत्थर से नहीं हुई ये बात रिपोर्ट में साफ़ तौर पर दर्ज है । मेरी अदालत से विनती है कि वो भुनेसर और उसकी बेटी को पूरा पूरा न्याय दे ।”

वकील साहब की बात रखने के बाद जज साहब ने अपना फैसला सुनते हुए भुनेसर को बाईज्ज़त बरी कर दिया तथा यह कह कर कि ‘मुन्ना ने जो किया वो अपनी बहन और अपनी रक्षा के लिए किया’ उस पर भी किसी प्रकार का दोष नहीं लगाया गया । साथ ही साथ बब्बन के पिता होने के नाते भागनारायण बाबू को बबिता के सरे इलाज का खर्चा उठाने का आदेश दिया ।

“हमको माफ़ कर दीजिये मालिक ।” भुनेसर ने रोते हुए भागनारायण से कहा ।

“अरे अरे भुनेसर ये क्या कर रहे हो । शर्मिंदा तो मैं हूँ जो मेरे घर एक दरिंदा पैदा हुआ था जिसकी वजह से तुम्हारे घर की इज्ज़त पर आंच आयी । आज अगर वो जिंदा होता तो उसे मैं मार देता । मुझे यकीन था कि मेरा भुनेसर चाह कर भी मेरा अहित नहीं सोच सकता । मैं अपने बेटे के पाप का प्रायश्चित करना चाहता हूँ भुनेसर । ये समाज अब बबिता को यहाँ चैन से जीने नहीं देगा । मैं तुम्हारे दोनों बच्चों को शहर में पढ़ा लिखा कर इतना बड़ा बना देना चाहता हूँ कि जहाँ तक इस घटिया सोच के लोगों की नज़र और आवाज़ दोनों ही न पहुँच पाए ।” भुनेसर और भागनारायण दोनों की आँखों में आंसू थे ।
पन्द्रह साल बाद भाग्नारायण बाबू द्वारा अस्पताल का उद्घाटन हुआ जिला की महिला कलक्टर बबिता कुमारी के हाथों और अस्पताल के मुख्य डॉक्टर के रूप में डाक्टर महिंद्र कुमार उर्फ़ मुन्नमा ने अपना कार्यभार संभाला । 

धीरज झा

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