शतरंज ने फियोना को सिखाया कि अगर तुम लड़ोगे नहीं तो मारे जाओगे और वो लड़ी भी और जीती भी

मे रा ये लेख जो मित्र पढ़ रहे होंगे उनसे बस इतना कहना चाहूँगा कि इस समय आप भले ही कितनी भी बुरी परिस्थिति में क्यों ना फंसे हों लेकिन कम स...

मेरा ये लेख जो मित्र पढ़ रहे होंगे उनसे बस इतना कहना चाहूँगा कि इस समय आप भले ही कितनी भी बुरी परिस्थिति में क्यों ना फंसे हों लेकिन कम से कम आपके सर पर छत और बदन पर पूरे कपड़े ज़रूर होंगे. अगर इसके बाद भी आप अपनी परेशानियों भरे जीवन से निराश हैं तो आपको ये लेख ज़रूर पढना चाहिए. यकीन मानिए ये पढ़ने के बाद आपके पास जो भी थोडा बहुत बचा है वो आपको बहुत ज़्यादा लगने लगेगा और आप इतने के लिए भगवन का शुक्रिया अदा करते हुए उनसे बस ज़िन्दगी में आगे बढ़ते रहने की दुआ के सिवा और कुछ भी नहीं मांगेंगे.

उसका जन्म कब हुआ इसका पता उसकी माँ को भी नहीं है, बच्चे पैदा होना इस जगह पर बोझ से ज़्यादा और कुछ माना नहीं जाता. फिर भी उसकी माँ के हिसाब से शायद वो 1996 में पैदा हुई थी. ये बच्ची किसी बीमारी के कारण दो बार लगभग मरते मरते बच गयी, बीमारी कौन सी थी इसका पता नहीं लग सका क्योंकि चिकित्सा की कोई खास व्यवस्था थी नहीं, लेकिन शायद वो मलेरिया ही था. शायद इसलिए वो दो बार मरते मरते बच गयी क्योंकि उसे अपना और जहाँ वो जन्मी थी उस जगह का नाम उसे इतिहास के पन्नों पर स्वर्ण अक्षरों में लिखना था.

फियोना मुटेसी, युगांडा की एक छोटी सी बस्ती काटवे में जन्मी वो अफ्रीकन लड़की जिसे 10 साल की उम्र तक कुछ भी लिखना पढ़ना नहीं आता था. परिवार में एक माँ एक बड़ी बहन और दो छोटे भाई थे. जो सब एक ऐसे घर में रहते थे जो घर के नाम पर टीन के टूटे छप्पर से ढाका हुआ बिना खिड़की का छोटा सा कमरा था. कमरे में एक बिछौना जिस पर पूरा परिवार सोता था. बच्ची ने अपने पिता को जब देखा था उसके विषय में उसे बस इतना ही याद जब वो तीन साल की थी तब अपने पिता को देखने उनके गाँव गयी थी उसके पिता बहुत बीमार थे और एक सप्ताह में उनकी मृत्यु हो गयी, उसके बाद वो दो तीन सप्ताह वहां रहे और इसी बीच उसकी बड़ी बहन की भी मृत्यु हो गयी.

बच्चपन में ही पिता का साया सर से उठ गया, अकेली माँ ने सभी बच्चों को उस जगह पर पाला पोसा जहाँ चोरी चकारी, लूट मार लोगों की आय का एक स्रोत है. मगर ऐसी ये अकेली माँ नहीं थी, यहाँ 40% बच्चे ऐसे ही थे जिनके सर से या तो पिता का साया उठ चुका कोटा है या फिर पता ही नहीं होता कि पिता कौन हैं. इस बच्ची की माँ सहित सरे भाई बहन मजदूरी करते थे सारा दिन तब जा कर दो वक्त का खाना नसीब होता था. मगर इस नर्क से भी बद्दतर हालत तो तब हुई जब इन्हें अपना ये टूटा हुआ घर भी किराया ना भर पाने की वजह से खाली करना पड़ा.

मगर ऐसे तो बहुत से गरीब हैं जो इस तरह की ज़िन्दगी जी रहे हैं और आगे भी जीते रहेंगे, फिर भला इस बच्ची में ऐसा क्या खास था जिसके लिए मैं इतना सब लिख रहा हूँ. हाँ सच में इस अफ्रिकन लड़की में तब तक कुछ भी खास नहीं था जब तक ये युगांडा मिशनरी के लिए काम कर रहे रॉबर्ट कटेंडे से नहीं मिली थी. फियोना का भाई एक कप दलीया खाने के लालच में रॉबर्ट कटेंडे के उस छोटे से स्कूल में जाया करता था जहाँ वो बस्ती के बच्चों को शतरंज खेलना सिखाता था. एक दिन फियोना भी अपने भाई का पीछा करते हुए रॉबर्ट के पास पहुँच गयी. और बाक़ी बच्चों को शतरंज खेलता देख उसकी भी इच्छा हुई कि वो ये खेल सीखे.

असल में उस दिन फियोना की किस्मत उसे वहां ज़बरदस्ती खीँच कर ले गयी थी. उसे शतरंज से ये सीखना था कि आखिर ज़िन्दगी की चालों को समझते हुए परेशानियों को मात दी कैसे जाती है. रॉबर्ट को कुछ दिनों में ही उसकी शतरंज की चालों को आसानी से समझ लेने के इस बेहतरीन हुनर का पता चल गया. फिर क्या था ज़मीन पर रेंगती फियोना के लिए रॉबर्ट एक पंख बन गया. रॉबर्ट उसके लिए रास्ते बनाता रहा, फियोना उड़ानें भरती रही. इस बीच भी ऐसी ऐसी मुश्किलें आयीं जिसमें कोई भी इंसान हार मान ले, लेकिन फियोना ने शतरंज की चालों से सिर्फ एक खेल ही नहीं सीखा था बल्कि उसने परेशानियों से तब तक लड़ते रहना सिखा था जब तक आखरी दम बचा है.

और फियोना की इसी हिम्मत ने उसे काम्पाला की आठ सबसे पिछड़ी और गन्दी बस्तियों में से एक काटवे से उठा कर उस स्तर पर पहुंचा दिया जहाँ से उसने तीन बार युगांडा जूनियर महिला चेम्पियनशिप का ख़िताब जीता तथा चेस ओलम्पियार्ड में पहली बार युगांडा से किसी महिला खिलाड़ी के इस मुकाम तक पहुँचने का रिकार्ड बनाया. इन्हीं सफलताओं के कारण क्वीन ऑफ काटवे के नाम से एक किताब भी प्रकाशित हुई तथा मीरा नायर ने इसी नाम से एक फिल्म भी बनाई.

मैं इस लेख में बहुत कम बयाँ कर पाया हूँ और जितना भी बयाँ किया है सब फियोना के बारे में ही. लेकिन जब आप इस बच्ची पर बनी फिल्म क्वीन ऑफ काटवे देखेंगे तब आपको सिर्फ फियोना की हिम्मत और सफलताएं ही नहीं दिखेंगी बल्कि उसके साथ साथ उस बस्ती में रह रहे लोगों का दर्द दिखेगा, फियोना की माँ के बलिदान दिखेंगे कि कैसे उसने अपनी बच्ची के लिए अपनी माँ की आखरी निशानी उसकी दी हुई एक ड्रेस बेच दी. आपको दिखेगा रॉबर्ट कटेंडे का उन बस्ती के बच्चों और फियोना के लिए किया गया त्याग. आप देखेंगे कि कैसे कटेंडे ने एक ऐसी नौकरी का प्रस्ताव ठुकरा दिया जिससे उसका और उसके परिवार का भविष्य संवर सकता था और वो भी सिर्फ इस लिए कि अगर वो चला जाता तो शायद फियोना वो वहां कभी ना पहुँच पाती जहाँ पहुँचने के लिए उसका जन्म हुआ था. कटेंडे ने फियोना और बस्ती के बच्चों को शिक्षा दिलाई, उन्हें सकूल भेजा. उसी की वजह से फियोना ग्रेजुएट हो पाई.

इसी फिल्म में एक जगह बस्ती के बच्चे जब अमीर बच्चों के विरुद्ध प्रतियोगिता लड़ने जाते हैं और इतना अच्छा माहौल देख कर डरने लगते हैं तब कटेंडे उन्हें समझाते हुए एक कहानी सुनाता है, कहानी कुछ इस तरह है कि एक बार एक कुत्ता एक बिल्ली को देखता है और उसके पीछे भागने लगता है. बिल्ली भी उससे बचने के लिए भागने लगती है. बहुत देर तक यही सिलसिला चलता है और अंत में कुत्ता थक जाता है. कुत्ते से जब हार मान लेने की वजह पूछी जाती है तो कुत्ता कहता है कि “उसका जीतना स्वाभाविक था, मैं अपने भोजन के लिए उसके पीछे भाग रहा था, वो नहीं भी मिली तो मैं कहीं और से भोजन का जुगाड़ कर लूँगा मगर वो बिल्ली अपनी जान बचाने के लिए भाग रही थी, पकड़ी जाती तो आज उसका आखरी दिन होता. भोजन ना मिलने से ज़्यादा डरावना है जान चले जाना और यही डर हम सबको हिम्मत भी देता है आखिर तक लड़ने की.” काटेंडे बच्चों को समझाते हुए कहता है कि “आज भी वैसा ही है, उन अमीर बच्चों के लिए ये बस एक खेल है, आज ना भी जीतें तो कोई फरक नहीं पड़ेगा उन्हें मगर तुम सब उस बिल्ली की तरह हो ये तुम्हारी ज़िन्दगी है. तुम्हें यहाँ खेलना भी है और जीतना भी है जिससे तुम अपनी ज़िन्दगी सुधार सको.”

इतनी सफलताओं में फियोना के लिए सबसे बड़ी सफलता थी जब उसने अपनी माँ को एक नया घर दिलाने का वादा पूरा किया.  फियोना ख़ास है क्योंकि वो उन चंद लोगों में से एक है जो अपनी हिम्मत के कारण दूसरों की प्रेरणा बन जाते हैं. तो सोचिए कम से कम आप उस हाल में तो बिलकुल नहीं जहाँ से फियोना का सफ़र शुरू हुआ था. जब 14 साल की उम्र में एक बच्ची अपने भाग्य का लिखा पलट सकती है तो फिर हम सब क्यों नहीं ?

धीरज झा

Keywords : Hindi Article, Queen Of Katwe, Phiona Mutesi, Inspirational, Chess, Slam Area  

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क़िस्सों का कोना : शतरंज ने फियोना को सिखाया कि अगर तुम लड़ोगे नहीं तो मारे जाओगे और वो लड़ी भी और जीती भी
शतरंज ने फियोना को सिखाया कि अगर तुम लड़ोगे नहीं तो मारे जाओगे और वो लड़ी भी और जीती भी
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