"होईहि सोई जो राम रचि राखा" एक कहानी बच्चपन वाली

पि ता जी सारा दिन घर नहीं थे और "जब चले गए थानेदार तो भईया अब डर काहे का" फिर क्या, फिर स्कूल से आते ही दे मस्ती पर मस्ती, नए र...

पिता जी सारा दिन घर नहीं थे और "जब चले गए थानेदार तो भईया अब डर काहे का" फिर क्या, फिर स्कूल से आते ही दे मस्ती पर मस्ती, नए रंगीन टी वी का कान मरोड़ना और बचे खुचे टाईम में छोटे भाई के साथ मलयुद्ध का  खतरनाक अभ्यास । ऐसे लग रहा था जैसे कल से तो अब स्कूल जाना ही नहीं, ऐसे ही मस्ती मारते हुए ज़िंदगी निकल जाएगी ।

मगर जब रात आई और सारा दिन मस्ती जैसा कठिन काम कर के थक चुका गोपी ने चैन की नींद लेने के लिए आँखें मूंदी ही थीं कि उसके दिमाग में राक्षसी "लंकनी" के मधुर स्वरों के एक आवाज़ गूंजी "  "कल जो जो मेरे टेस्ट में फेल हुआ उन सबकी खैंर नहीं...ख़ैर नहीं... ख़ैर नहीं... ख़ैर नहीं ।" ये "ख़ैर नहीं" शब्द जब चौथी बार गूंजा तो एकाएक ही सारे कमरे में बेचैनी पसर गई । उसे याद आगया कि ये तो अंग्रेजी वाली मैडम की आवाज़ है जिन्होंने कल के लिए टैस्ट दिया था । मगर गोपी तो बच्चपन से ही इंकलाबी था उसे अंग्रेजी से उतनी ही चिढ़ थी जितनी आज़ादी के दीवानों को अंग्रेज़ों से । मगर इंग्लिश वाली मैडम के कोमल होथों के स्पर्ष का डर उसकी सारी इंकलाबगिरी निकाल देता था । आज़ादी से पहले की बात होती तो गोपी अंग्रेज़ों के डंडे खा लेता मगर मैडम के हाथ की मार को सोचते अचानक से उसे अपनी नानी माँ बहुत शिद्दत से याद आने लगती थी ।

"वो सोचने लगा कि अब एक ही उपाए है कि किसी तरह कल स्कूल ना जाया जाए । मगर ये संभव नहीं है पिता जी घर लौट आए हैं । ना होते तो माँ को उसकी ममता का वास्ता दे कर सिर दर्द के बहाने से भी काम चल जाता मगर पिता जी तो ऐसे हैं कि मरता भी रहूँगा तो कहेंगे आखरी साँस ह्कूल में ही लेना ।" खैर उसने ठान लिया था की कल वो स्कूल किसी हाल में नहीं जाएगा हाँ बस पिता जी घसीट कर ना ले जाएं ।

सुबह माँ गोपी को उठाने गई तो देखा गोपी बिस्तर पर नहीं है । गोपी की स्कूल ना जाने की योजना से अंजान माँ खुश हो गई ये सोच कर कि आज उसका आलसी लाल अपने आप ही उठ गया है । इतने में आधे घंटे से शौचालय की बदबू और गर्मी में तपस्या कर के गोपी कमरे में आया । उसने
अपना मुंह हारे हुए जुआरी की तरह पहले ही बना लिया था । माँ के कुछ पूछने से पहले ही बोला

"पाँचवीं बार पेट झर गया है । रात भर सोया भी नहीं ।" माँ की ममता भला इस धूर्त के छल को कैसे पहचान पाती इसीलिए भगवान को पंद्रह बीस बार याद कर के उसे आराम करने की हिदायत दे दी । गोपी अपनी आधी जीत पर मन ही मन खुश हो गया था ।
जैसे ही उसने देखा पिता जी पूजा पर से उठ गए हैं वो फिर से शौचालय में जा घुसा । इस बार उसे ज़्यादा तपस्या की ज़रूरत थी । बेचारे का दम घुट रहा था मगर अब करे भी तो क्या करे ! वैसे भी ये तपस्या अंग्रेजी वाली मैडम के मार से कम ही कष्ट दायक थी ।

"कहाँ है लाट साहेब ? आज स्कूल नहीं जाना क्या उसे जो अभी तक सोया है ?" अखबार के पन्नें पलटते हुए पिता जी ने माँ से पूछा । पिता जी का भी कमाल है, अखबार के पन्ने चिल्ला चिल्ला कर देश दुनियाँ की बदहाली का हाल बयान कर रहे हैं और ये हैं कि उसे अनसुना कर के मासूम के पीछे पड़े हैं ।

"नहीं जाएगा आज वो स्कूल ।" माँ विपक्ष के वकील की तरह तेवर दिखाती हुई सामने मेज पर चाय का कप रखते हुए बोली ।

"क्यों भई आज क्या खास है जो लाट साहब स्कूल नहीं जाएंगे ?" बिना अखबार से नज़रें हटाए पिता जी ने सवाल किया ।

"पेट नहीं सही उसका । छठी बार गया है लैट्रींग, बेचारे का मुंह सूख गया है ।" गोपी का झूठा दर्द माँ के चेहरे पर झलका हुआ एक दम सच जैसा लग रहा था ।

"जानवरों जैसे जो मन वो ठूंसेगा तो यही होगा ।" पयखाने में कैद गोपी सोच रहा था कि आखिर पिता लोग इतने निर्दयी क्यों होते हैं ।

"आपको तो कभी बेचारे का दर्द दिखता ही नहीं । चाय पीजिए ठंडा हो रहा है और हाँ वो नहीं जाएगा स्कूल और आप उसे कुछ नहीं कहेंगे ।"

पिता जी बस मुस्कुराए ये सोच कर कि ससुरा बहानेबाज जीत गया । पिता की एक खास बात ये होती है कि वो पिता होते हैं जो हम सोचते।हैं वो उन्होंने अपने बच्चपन में अनुभव कर लिया होता है इसलिए वो सब जानते हैं ।

गोपी अपने चेहरे पर झूठी पीड़ा लिया, बुरी तरह पसीने से भीगा हुआ बाहर निकला । माँ ने आते ही गोद में बिठाया, पल्लू से सर पोंछा उस मक्कार की बलाएं जी और पिता की जासूसी भरी नज़रों से बचा कर उसे कमरे में ले जा कर लिटा दिया । दिन बीतने के साथ साथ उसकी झूठ मूठ का खराब पेट ठीक होने लगा । पिता जी के ऑफिस जाते ही गोपी बिल्कुल ठीक हो गया । इधर ममतामयी माँ  इस बेईमान की बेईमानी से अंजान ये समझ रही थीं कि सब उसकी प्रार्थना का असर है ।
तीनो टाईम खिचड़ी और दलिया खाने की सज़ा को एक तरफ कर दिया जाए तो बाकि का सारा दिन मज़े में कटा गोपी का । रात हो गई थी, गोपी अपनी जीत पर फूले नहीं समा रहा था । वो सोचने लगा कि कल कैसे वो स्कूल जा कर अपने उन दोस्तों को अपनी अक्लमंदी का कारनामा सुनाएगा जिन्होंने आज अंग्रेजी वाली मैडम का प्रचंड रूप झेला होगा । यही सब सोचते सोचते गोपी सो गया ।

अपनी रोज़ की आदत से मजबूर आज भी गोपी देर से उठा । रात इतने चैन से नींद के गले लगा था कि नींद ने छोड़ा ही नहीं जल्दी । माँ ने भी सोचा बच्चे को कमज़ोरी होगी तो सोने दो । जब उठा तो देखा कि स्कूल जाने में बस आधा घंटा बचा है । जल्दी जल्दी तैयार हो कर स्कूल के लिए भागा । माँ ने रोका भी कि आज मत जा कमज़ोरी होगी मगर गोपी को तो अपने लुटे पिटे दोस्तों को देखना था और उन पर हंसना था ।

 स्कूल पहुंचा तो प्रार्थना ख़त्म होने वाली थी । पी टी मास्टर से लेट आने के लिए दो छड़ियाँ भी खाईं मगर आज ये छड़िया मामुली लग रही थीं । उसने तो बड़ी जीत हासिल की थी इस छोटी सी मार से भला उसे क्या फर्क पड़ता । जल्दी से क्लास में पहुंचा क्योंकि पहली घंटी अंग्रेजी वाली मैडम की ही थी । सुमित की बगल में बैठते हुए गोपी मंद मंद मुस्कुराया मगर सुमित ने ध्यान ही नहीं दिया । उसका चेहरा एक दम सहमा हुआ था ।

"क्या हुआ यार, कल की मार से अभी तक दर्द हो रहा है क्या ?" गोपी ने व्यंगात्मक लहज़े में सुमित की तरफ कुटिल मुस्कान उछालते हुए कहा ।"

"कल क्यों मार पड़ती भला, कल तो पूरी मस्ती की हमने । दो तीन मैडम आई नहीं थीं । मगर आज तो शामत पक्का है । तू तो कल आया नहीं, घर पर रह कर पूरी तैयारी की होगी टेस्ट की ना ?" सुमित का इतना बोलना था कि गोपी को चक्कर आने शुरू हो गए । सारा प्लाॅन चौपट हो गया ।

मैडम क्लाॅस में आ चुकी थीं । गोपी मैडम को एक एक टक देखे जा रहा था । उसे मैडम की जगह पर यमदूत बैठा हुआ दिख रहा था । ठीक वैसा ही जैसा पिता जी ने एक बार बताया था । इसी के साथ पिता जी द्वारा गुनगुनाया जाने वाला दोहा उसके कानों में गुंजने लगा जिसका मतलब कुछसदिन पहले ही पिता जी ने समझाया था  "होईहि सोई जो राम रचि राखा"

धीरज झा

Keywords : Hindi Story, Funny Story, Children's Drama, Bachchpan

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