दो कांपती अवाज़ें (भाग – 3)

ह री ने कब फ़्लैट का दरवाज़ा खोला और कब वो दिवाकर के कमरे तक आगया इसकी दिवाकर को कोई सुध नहीं थी. शायद वो अपनी सारी मायूसी अकेले में निचोड़ ...

री ने कब फ़्लैट का दरवाज़ा खोला और कब वो दिवाकर के कमरे तक आगया इसकी दिवाकर को कोई सुध नहीं थी. शायद वो अपनी सारी मायूसी अकेले में निचोड़ देना चाहता था जिससे उसके पास सिर्फ और सिर्फ हिम्मत बचे. वो किसी के सामने खुद को कमज़ोर नहीं दिखाना चाहता था क्योंकि उसे पता था उसकी कमजोरी का सिर्फ मजाक ही उदय जायेगा. उसने सोचा था हरी हमेशा की तरह ऑफिस से शाम के बाद ही लौटेगा मगर शायद उसका अंतर्मन चाहता था कि हरी अभी उसके साथ हो और इसीलिए ही उसके अंतर्मन की आवाज़ हरी ने सुन ली थी. तभी तो बिना कारण ही वो दोपहर में ही आगया था. फ़्लैट का लॉक खुला देख उसे अंदाज़ा तो हो ही गया था कि अन्दर का माहौल उदासी की धुंध से घिरा हुआ होगा जिसमे आंसुओं की हल्की बूंदाबांदी भी हो रही होगी. मगर अन्दर तो पूरा तूफ़ान मचा हुआ था. एक दम शांत तूफान जिसकी आहट तक किसी के कानों तक नहीं पहुँच पा रही थी मगर दिवाकर का सब कुछ उदा कर ले जा रही थी.

“हे दिवु, भाई, यार देख ऐसा नहीं करते तूने मुझे वादा किया था कि तू हिम्मत से काम लेगा. देख भाई मैं हूँ ना यार तू ऐसे क्यों रोता है यार.” दिवाकर को चुप करते हुए हरी खुद ही भावुक हो गया था.

इंसान सच में कितना अजीब होता है ना, जिससे मोह नहीं उसका गला तक काट देता है बिना कुछ सोचे और जिससे मोह जुड़ जाए उसके लिए वो खुद का स्वभाव भी सामने वाले के मन मुताबिक बदल लेता है. जैसे कि हरी को ही देख लीजिए, ये ऐसा इंसान है जो मुर्दे को भी अपनी उटपटांग बातें सुना कर हंसने पर मजबूर कर दे, जिसे शायद खुद भी नहीं याद होगा कि आज से पहले वो कब उदास हुआ था या अपने साथ रहते हुए किसे रोने दिया था. वही हरी आज दिवाकर के लिए रो रहा है क्योंकि वो जनता है कि अगर उसका दोस्त किसी के लिए इतना दुखी है तो वो उसके लिए क्या मायने रखता होगा.

“कुछ बतायेगा कि हुआ क्या है ? भाभी ने कुछ कहा क्या ? कोई गड़बड़ हुई ?” क्या हुआ क्या होने वाला था ये सब हरी जनता था मगर उसे बस दिवाकर के बोलने पर मजबूर करना है, उसे चुप देख कर हरी का मन घबरा रहा है वह चाहता है कि दिवाकर भले उसे गैलियन ही क्यों ना दे मगर बोल दे. लेकिन दिवाकर खामोश है अब उसकी सिसकियों कि आवाज़ भी नहीं आ रही थी. हरी धीरे से अपनी एक ऊँगली दिवाकर की नाक तक ले गया. जब तक दिवाकर की साँस उसकी ऊँगली से टकराई नहीं उतने पलों तक उसका दिल तेज़ी से धडकता रहा. हालाँकि वो ऐसा करने पर खुद शर्मिंदा होगया और कितना भी रोकने पर उसकी हंसी छूट गयी. मगर उसे संतोष इस बात का था कि दिवाकर ठीक है बस एक बच्चे की तरह रोते रोते सो गया है.

तीन घंटे बीत गए, अब जा कर दिवाकर के शरीर में हलचल दिखी. इतनी देर तक हरी वहीं उसके सिरहाने की तरफ पड़ी कुर्सी पर बैठा उसे देखता रहा. बहुत पुराना याराना था दोनों का. एक दूसरे के हर रंग से वाकिफ़ थे दोनों. हरी जनता था कि दिवाकर इतनी जल्दी मायूस होने वालों में से नहीं है और अगर वो मायूस है तो बात सच में बहुत बड़ी है. इसी लिए हरी कुछ ज़्यादा ही परेशान था. लेकिन दिवाकर के जागने के साथ ही उसकी परेशानी भी थोड़ी कम हो गयी थी.

“तू ठीक है ना ?”

“हाँ, तुझे क्या लगा मर गया ?”

“पागल है क्या ऐसा क्यों बोल रहा है ?”

“अच्छा तो नाक के पास ऊँगली ले जाने कर क्या चेक कर रहा था ?” दिवाकर की बात सुन कर हरी थोड़ा झेंप गया.

“अच्छा उठ जा मैं कुछ नाश्ता बनाता हूँ. ससुर भूख लगी है.” दिवाकर के सवाल को नज़रंदाज़ करते हुए हरी किचेन की तरफ बढ़ गया. दिवाकर भी चुप हो गया. वो पूछना चाहता था कि आज इतनी जल्दी कैसे आगया हरी और उसने अभी तक खाना क्यों नहीं खाया मगर उसकी इतना बोने की हिम्मत ही नहीं हुई.

आज का दिन भी हर बात को यादों वाली पोटली में बंद कर के रात की ओर बढ़ चला था मगर दिवाकर अभी भी वहीं खड़ा था जहाँ से उसने सुनैना को आखरी बार अलविदा कहा था. आगे किस्मत क्या खेल दिखाती है ये तो वक़्त ही बताएगा. हम बस दुआ कर सकते हैं कि जो भी हो वो दोनों के लिए अच्छा हो.

क्रमशः

धीरज झा

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